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क्षमा बड़न को चाहिए….

पूरी प्रक्रिया में कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। परंतु विपक्ष ने सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध किया इसके पीछे एक कारण यह भी था कि विपक्षी पार्टियां लगभग सारे समय छात्रों के आंदोलन से दूर रही थीं। जब उनको लगा कि छात्रों के अंदर आक्रोश है तब तक देर हो गई थी। उसी की भरपाई करने के लिए विपक्षी पार्टियां ओवरटाइम कर रही हैं।

संत कवि रहीम ने लिखा है, ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात। का रहिमन हरि घटयो, जो भृगु मारी लात’। इसका अर्थ है कि क्षमा करना बड़े लोगों की शोभा है। उन्होंने अपने इस दोहे में एक प्राचीन हिंदू कथा का हवाला दिया है, जिसके मुताबिक भृगु ऋषि एक बार भगवान विष्णु से मिलने गए। उस समय भगवान विश्राम कर रहे थे। इससे नाराज भृगु ने उनकी छाती पर लात मार दिया। इसके बावजूद निद्रा से उठे भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि को प्रणाम किया और उनकी बात सुनी। कहते हैं कि इससे नाराज होकर मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आ गई थीं और उन्हें खोजते हुए विष्णु भगवान भी पृथ्वी पर आए। तिरूमाला की पहाड़ियों में उनको मां लक्ष्मी मिलीं। वहीं तिरुपति के रूप में भगवान विराजमान हैं, जो आज एक प्रसिद्ध तीर्थ है।

बहरहाल, रहीम का दोहा और यह प्रसंग बताने का उद्देश्य यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़प्पन दिखाया है। उन्होंने एक वीडियो जारी किया, जिसमें अपनी पीड़ा भी जाहिर की लेकिन साथ ही उनके और उनकी मां के लिए अपमानजनक शब्द कहने वाले छात्रों और युवाओं को ‘गुमराह बच्चे’ बताते हुए उनको माफ भी कर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि वे नहीं चाहते हैं कि बच्चों को परेशानी हो और उन्हें कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ें। इसलिए उन्होंने खुद भी बच्चों को माफ किया और समाज से भी अपील करते हुए कहा कि वे बच्चों के प्रति ऐसा ही सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाएं। प्रधानमंत्री ने एक अभिभावक के रूप में बच्चों के भविष्य की चिंता जताई और उन्हें सही राह दिखाने की आवश्यकता भी बताई।

प्रधानमंत्री के वीडियो का एक पहलू तो यह है, जिसमें वे एक अभिभावक के तौर पर बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए उनको माफ कर रहे हैं और सही रास्ते पर लाने की आवश्यकता बता रहे हैं, जबकि दूसरा पहलू एक संवेदनशील प्रधानमंत्री के तौर पर यह स्वीकार करने का है वे समाज में विद्यमान आक्रोश को समझ रहे हैं। यह साधारण बात नहीं है कि प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि समाज में आक्रोश है। प्रधानमंत्री ने यह सुनिश्चित किया कि इस आक्रोश की अभिव्यक्ति के तौर पर छात्रों और युवाओं ने जंतर मंतर पर जो कुछ कहा या किया इसके लिए उनको सजा न मिले, बल्कि उनको यह संदेश जाए कि सरकार ने उनके सरोकारों को समझा है। तभी प्रदर्शनकारी छात्रों से किए गए वादे के मुताबिक सरकार ने हर जगह मुकदमे वापस किए हैं। छात्रों पर दर्ज एफआईआर रद्द की गई है। प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के लोगों को भी यह संदेश दिया कि वे सोशल मीडिया में या समाज में सार्वजनिक जगहों पर बच्चों को सजा देने या परेशान करने वाला कोई काम नहीं करें। इस पहल से छात्रों व युवाओं का विश्वास बहाल होगा। ध्यान रहे भारतीय संस्कृति में क्षमा को बहुत महत्व दिया गया है। प्रधानमंत्री की ओर से छात्रों को क्षमा करने का भाव दिखाने के बाद नोएडा की एक छात्रा का वीडियो वायरल हुआ, जिसने जंतर मंतर पर प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द कहे थे। उस नाबालिग लड़की ने अपनी बातों पर अफसोस जताया। ग्लानि का भाव उसकी बातों से स्पष्ट झलक रहा था। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की पहल के बाद ऐसा भाव लाखों युवाओं के मन में आया होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले शुक्रवार की देर रात को जारी वीडियो में कहा हो कि वे समाज में विद्यमान आक्रोश को समझ रहे हैं। लेकिन असल में वे इसे पहले ही समझ गए थे और तभी नीतिगत पहल का ऐलान कर दिया था ताकि लोगों का आक्रोश समाप्त हो और व्यवस्था में विश्वास बहाल हो। उन्होंने इसकी शुरुआत गुरुवार, 23 जुलाई को ही कर दी थी, जिस दिन पेपर लीक रोकने के लिए कठोर सजा के प्रावधान वाला बिल लाने की घोषणा की थी। उसके तुरंत बाद ‘पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रीवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026’ को कैबिनेट ने मंजूरी दी। सोमवार को यह बिल लोकसभा में पेश किया गया। मंगलवार और बुधवार की चर्चा के बाद इसे लोकसभा ने मंजूरी दी और गुरुवार को राज्यसभा से बिल मंजूर हो गया। यह संयोग है कि गुरुवार की शाम को ही प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की।

छात्रों, युवाओं और उनके अभिभावकों के सरोकारों को समझते हुए प्रधानमंत्री ने नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का गठन किया। यह कमेटी परीक्षा प्रणाली की कमियों को पहचान कर उसमें सुधार के सुझाव देगी। इस कमेटी में इसरो के पूर्व प्रमुख एस सोमनाथ और आईआईटी मद्रास के निदेशक वी कामकोटि भी शामिल हैं। दुर्भाग्य की बात है कि विपक्ष ने इसका समर्थन करने की बजाय इसका भी विरोध शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में आधार की ऑथोरिटी के प्रमुख रहे नंदन नीलेकणी को इस कमेटी का अध्यक्ष बनाया है लेकिन कांग्रेस की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा को लग रहा है कि नीलेकणी सिर्फ एक आईटी कंपनी के मालिक हैं।

सरकार की इस बड़ी पहल को कमतर बताने के मकसद से उन्होंने देश में आईटी क्रांति से जुड़े एक प्रतिष्ठित उद्यमी, सम्मानित समाजसेवी, विजनरी लीडर और आधार क्रांति के सूत्रधार नंदन नीलेकणी का तो अपमान किया ही अपनी ही सरकार के किए काम को भी कमतर बना दिया। इसी तरह उन्होंने वी कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कह कर मजाक उड़ाया। सबको पता है कि कामकोटि भारत सरकार के ‘शक्ति प्रोजेक्ट’ के प्रमुख रहे हैं, जिसके तहत सेमीकंडक्टर और एआई की आधारशिला को मजबूत किया गया था। प्रियंका गांधी वाड्रा ने जो कहा कि वह सिर्फ सरकार की पहल का विरोध नहीं है, बल्कि भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़े प्रतीकों का मजाक उड़ाने की मानसिकता को भी दिखाता है। पता नहीं कांग्रेस के लोगों को सनातन से जुड़े प्रतीकों से इतनी नफरत क्यों है? बाद में देश के दो सौ से ज्यादा शिक्षाविदों और कुलपतियों व पूर्व कुलपतियों ने एक खुला पत्र लिख कर प्रियंका गांधी वाड्रा की कही गई बात पर आपत्ति दर्ज कराई।

बहरहाल, पेपर लीक पर कठोर सजा के प्रावधान करने वाला बिल पास हो गया है। अब देश में कहीं भी पेपर लीक होने पर उसकी जांच विशेष जांच टीम यानी एसआईटी करेगी और दो महीने में जांच पूरी करेगी। इसके बाद तीन महीने के भीतर फास्ट ट्रैक कोर्ट में इसकी सुनवाई पूरी होगी। उसके बाद एक महीने का समय होगा हाई कोर्ट में अपील करने के लिए। हाई कोर्ट में भी इस मामले की सुनवाई तीन महीने में पूरी करने का प्रावधान है। इसका अर्थ है कि मामला दर्ज होने के नौ महीने के भीतर जांच और अभियोजन की प्रक्रिया पूरी करनी है। नए कानून के तहत 10 साल तक की कैद और 10 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा। यह कानून पेपर लीक रोकने में एक बड़े प्रतिरोध के तौर पर काम करेगा क्योंकि इसमें कठोर सजा का प्रावधान है और सजा सुनिश्चित करने का भी प्रावधान है। यह कानून छात्रों और युवाओं का भरोसा भी बहाल करेगा। अभी तक के कानून में पेपर लीक को सामान्य चीटिंग के अपराध की तरह देखा जाता था। उसमें सजा का प्रावधान कम था, जमानत की प्रक्रिया आसान थी, जांच की एजेंसी तय नहीं थी और न जांच व अभियोजन का समय निर्धारित था। अब यह सब बदल दिया गया है।

इस पूरी प्रक्रिया में कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। परंतु विपक्ष ने सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध किया इसके पीछे एक कारण यह भी था कि विपक्षी पार्टियां लगभग सारे समय छात्रों के आंदोलन से दूर रही थीं। जब उनको लगा कि छात्रों के अंदर आक्रोश है तब तक देर हो गई थी। उसी की भरपाई करने के लिए विपक्षी पार्टियां ओवरटाइम कर रही हैं। लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है। उलटे विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्यों में पेपर लीक और परीक्षा की गड़बड़ियों को लेकर आंदोलन तेज हो रहे हैं। पंजाब और झारखंड में छात्र आंदोलित हैं। राज्य सरकारें उनको भरोसा नहीं दिला पा रही हैं। तभी विपक्षी पार्टियों को केंद्र सरकार की सार्थक पहल का विरोध करने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। उनको समझना चाहिए कि छात्र यह सब भी देख रहे हैं। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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