nayaindia Lok sabha election 2024 प्रश्नों की उमड़-घुमड़ का अंतर्व्यूह
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प्रश्नों की उमड़-घुमड़ का अंतर्व्यूह

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पिछले हफ़्ते मैंने टीवी बहसों में भाजपा के हर प्रवक्ता से पूछा कि 12 लाख मतदान केंद्रों में से हर एक पर 370 अतिरिक्त वोट का मतलब क्या होता है, इसका हिसाब जानते है?  क़रीब 44 करोड़ अतिरिक्त वोट। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुल मिला कर तक़रीबन 23 करोड़ वोट मिले थे।  उन में 44 करोड़ अतिरिक्त वोट जुड़ने का मतलब है कि 2024 में भाजपा के 67 करोड़ वोट। इसका अर्थ है कुल मतदान के 70 फ़ीसदी वोट भाजपा पाए। पिछले चुनाव में भाजपा को 37.7 प्रतिशत वोट मिले थे। तो क्या 2024 में उस के मतों में 32 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हो जाएगा?

यह तो तय है कि 2024 में नरेंद्र भाई मोदी अपनी भारतीय जनता पार्टी को 370 सीटों के आंकड़े पर नहीं पहुंचा पाएंगे। मगर इस से भी बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी अपनी कांग्रेस को किस आंकड़े तक पहुंचा पाएंगे? ज़मीनी हालात ऐसे लग रहे हैं कि इन गर्मियों में स्पष्ट बहुमत के 272 अंक तक पहुंचने में भाजपा के पसीने छूट जाएंगे। मगर क्या धरती पर वे अंकुर फूट रहे हैं, जो इंडिया समूह को स्पष्ट बहुमत के अंक तक पहुंचा दें?

मतदाताओं का बहुमत भले ही ‘मोशा-भाजपा’ के चंगुल से आज़ाद होने को छटपटा रहा हो, मगर क्या समूचे विपक्ष और ख़ासकर कांग्रेस की सांगठनिक तैयारियों में चुनाव-आरोहण की कोई ताब दिखाई दे रही है?

यह तो साफ़ है कि नरेंद्र भाई भीतर-ही-भीतर घबराए हुए हैं। पिछले दो-तीन महीनों से उन की देह-भाषा में विचलन है और वे छद्म साहस ओढ़े हुए दिखाई दे रहे हैं। उन के शब्द-प्रवाह में बिखराव है और इसलिए वे ‘मोदी की गारंटी’ की तलैया फांद कर ‘गारंटी-की-गारंटी’ जैसे बेमतलब के समंदरी-आख्यान गढ़ने में लगे हुए हैं।

चाहे जिस को अपने नाम पर चुनाव जिता लाने का क़रिश्मा गल कर बह जाने का अहसास उन्हें हो गया है, इसलिए कई मौजूदा सांसदों को इस बार उम्मीदवार बनाने की उन की हिम्मत नहीं पड़ रही है और कइयों को उम्मीदवार नहीं बनाने का हौसला भी वे नहीं जुटा पा रहे हैं। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने की घनघोर हसरत ने उन की वैचारिक प्रतिबद्धता को ऐसा स्खलित कर दिया है कि वे सब कुछ भूल कर चाहे जिस का आलिंगन करने को अधीर हो गए हैं।

चुनाव जीतने की व्याकुलता ने नरेंद्र भाई को इतना अस्थिर-चित्त कर दिया है कि वे अपनी पैदल-सेना पर बिना सोचे-समझे अजीबोग़रीब लक्ष्य लाद रहे हैं। देश भर के हर मतदान केंद्र पर इस बार भाजपा को 370 अतिरिक्त वोट दिलाने का उन का प्रयोजन कितना अव्यावहारिक है, या तो हड़बड़ाहट के दौर ने उन्हें यह सोचने ही नहीं दिया या फिर वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ देश की जनता को भी इतना मूढ़ समझ बैठे कि उन्हें लगा कि सब उन के इस उद्देश्य-आसव का पान आंख मूंद कर लेंगे। हर बूथ पर 370 अतिरिक्त वोट का जुमला नरेंद्र भाई के लिए रायसीना पर्वत के रेतीले हो जाने का सब से बड़ा सबूत है।

पिछले हफ़्ते मैं ने टीवी बहसों में भाजपा के हर प्रवक्ता से पूछा कि 12 लाख मतदान केंद्रों में से हर एक पर 370 अतिरिक्त वोट का मतलब होता है क़रीब 44 करोड़ अतिरिक्त वोट। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुल मिला कर तक़रीबन 23 करोड़ वोट मिले थे। उन में 44 करोड़ अतिरिक्त वोट जुड़ने का मतलब है कि 2024 में 67 करोड़ वोट। इस बार कुल 96 करोड़ मतदाता होंगे। उन में से 70 प्रतिशत वोट देने गए तो उन की तादाद होगी क़रीब 68 करोड़। तो क्या भाजपा को 68 में से 67 करोड़ वोट मिल जाएंगे?

मान लीजिए कि सौ प्रतिशत मतदान हो गया तो भी 67 करोड़ वोट पाने का मतलब होगा कुल मतदान के 70 फ़ीसदी वोट अपनी गठरी में बटोर ले जाना। पिछले चुनाव में भाजपा को 37.7 प्रतिशत वोट मिले थे। तो क्या 2024 में उस के मतों में 32 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हो जाएगा? जवाब में खिसियानी हंसी थी और यह थोथा तर्क कि क्या हम एक बड़ा लक्ष्य तय करने का अधिकार भी नहीं रखते हैं? अब चूंकि नरेंद्र भाई के मुंह से एक बात निकल गई है तो भाजपा का कोई प्रवक्ता आख़िर कैसे हड़बड़ी में हुई हिसाब की इस गड़बड़ी पर कोई टीका करे?

सो, अनुचर बिना अक़्ल लगाए नारे लगा रहे हैं कि अब की बार 370 पार, अब की बार 400 पार, अब की बार फिर मोदी सरकार। और-तो-और ख़ुद नरेंद्र भाई भी अपने मुंह से हर जगह यही उद्घोष करते घूम रहे हैं। दूसरों की आंखों में धूल झोंकने के चक्कर में ख़ुद की आंखों में भी धूल झोंकने के उपक्रम की इस बेचारगी पर मैं सहानुभूति-भाव से सराबोर होता जा रहा हूं। पराक्रम और सामर्थ्य के इस्पाती तारों से बुनी बाह्य अचकन के भीतर से झांकती फटी बनियान का कातर-विलाप आप को सुनाई दे रहा हो, न दे रहा हो, मेरे मन में तो यह आवाज़ गहरी हूक पैदा कर रही है।

सो, मैं तो पूरी तरह आश्वस्त होता जा रहा हूं कि 2024 में नरेंद्र भाई की हुकूमत उन की मुट्ठी से फिसल रही है। लेकिन बावजूद इस के मैं इस पर आश्वस्त नहीं हो पा रहा हूं कि इंडिया-समूह के पर्वतारोही दनदनाते हुए रायसीना पहाड़ी की तरफ़ कूच कर चुके हैं। वे तो पिछले छह महीनों से बस हौले-हौले रेंगते दिखाई दे रहे हैं।

ऐसे में अगर मतदाताओं के मन में परिवर्तन की कोई बलवती इच्छा सुलग भी रही हो तो क्या उसे अखिल भारतीय शक़्ल देना किसी राहुल गांधी, किसी शरद पवार, किसी लालू-तेजस्वी यादव, किसी अखिलेश यादव, किसी अरविंद केजरीवाल, आदि-आदि के लिए मुमकिन है? दक्षिण भारत, बंगाल, बिहार और पंजाब में बिखरे टापुओं पर अगर बदलाव का ध्वज फरफराने भी लगा तो क्या उस से नरेंद्र भाई इतने बेआबरू हो पाएंगे कि अपना झोला उठाएं और महफ़िल छोड़ कर चले जाएं?

चलिए, मान लिया कि भाजपा 2019 की अपनी 303 सीटों में 67 की बढ़ोतरी कर उसे 370 पर पहुंचाने की स्थिति में नहीं है, मगर क्या कांग्रेस अपने 52 के आंकड़े को बढ़ा कर तीन अंकों तक पहुंचने की कूवत रखती है? क्या राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी 5 से 25 या 15 पर पहुंच जाएगी? क्या समाजवादी पार्टी 5 से 20-25 पर पहुंच रही है? क्या राश्ट्रीय जनता दल को 25-30 सीटें मिल रही हैं? क्या तृणमूल कांग्रेस 22 के बजाय 32 सीटें अपने पल्लू में बांध कर ले जाएगी?

क्या आम आदमी पार्टी 15-20 का आंकड़ा छूती दिखाई दे रही है? क्या द्रमुक की सीटें 24 से बढ़ कर 34 होने वाली हैं? क्या वाम दल दो दर्जन सीटें अपनी मुट्ठी में कर लेंगे? अगर इन सवालों पर संशय अब भी बाकी है तो फिर, भारी मन से ही सही, यह स्वीकार कर लीजिए कि कोई चमत्कार ही नरेंद्र भाई के विदा गीत की धुन तैयार करेगा। इस दुंदुभि की स्वरलहरियों को संगीतबद्ध करना इंडिया-बैंड के वश की बात फ़िलहाल तो लगती नहीं।

बचपन में हमारी पढ़ी सारी कहानियां ज़िंदगी में सच हो जाएं, ऐसा कहां होता है? सो, खरगोश और कछुए की दौड़ में अंततः कछुए के जीत जाने का मासूम विश्वास अपनी छाती से लगाए मैं कब तक घूमता रहूं? घुड़दौड़ में सब से कमज़ोर घोड़ों पर, सिर्फ़ इसलिए कि वे तेज़तर्रार टंगड़ीबाज़ घोड़ों के बनिस्बत भले और शालीन हैं, मैं कब तक अपना सब-कुछ दांव पर लगा कर हारता रहूं? प्रश्नों की इस उमड़-घुमड़ के अंतर्व्यूह से गुजरते हुए कोई और क्या तय करता, मैं नहीं जानता।

मैं बस इतना जानता हूं कि हर बार, बार-बार, अनंतकाल तक हारते रहने के बावजूद मुझे तो दांव लगाते ही रहना है। कछुए के कभी न जीत पाने पर भी यह मासूम विश्वास अपनी छाती से लगाए घूमते ही रहना है कि खरगोश कभी तो रास्ते में झपकी ज़रूर लेगा। इस सिर्रीपन का भी अपना ही एक आनंद जो है।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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