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श्रावण में मंगला गौरी व्रत का महत्व

बगलामुखी

पौराणिक मान्यतानुसार भगवान शिव-पार्वती को श्रावण माह अति प्रिय है। श्रावण मास का प्रत्येक सोमवार भगवान शिव को समर्पित है, तो इसका अगला दिन मंगलवार शिवपत्नी सती अथवा पार्वती को। इसलिए श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिव पूजन किया जाता है तो इसके अगले दिन मंगलवार को मंगला गौरी व्रत के रूप में सती अथवा पार्वती का पूजन किया जाता है। श्रावण माह के मंगलवार को इस व्रत के आयोजन के कारण इसे मंगला गौरी भी कहा जाता है।

15 जुलाई – मंगल गौरी व्रत विशेष

विवाहित महिलाओं तथा कुंवारी कन्याओं के द्वारा क्रमशः अपने पति की भलाई, कल्याण, उज्ज्वल भविष्य, दीर्घायु और संतान सुख की प्राप्ति तथा कुंवारी कन्याओं द्वारा मनोवांच्छित वर प्राप्ति के लिए देवी गौरी का आशीर्वाद प्राप्ति के उद्देश्य से मंगला गौरी व्रत मनाए जाने की पौराणिक परिपाटी है। यह व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को मनाया जाता है। यह व्रत श्रावण के प्रथम मंगलवार से शुरू होता है, तथा श्रावण के हर मंगलवार को किया जाता है। इस वर्ष 2025 में सावन का महीना 10 जुलाई से आरम्भ हो चुका है और 9 अगस्त को समाप्त होगा। इस तरह 2025 में 15, 22 व 29 जुलाई तथा 5 अगस्त को मंगलवार का दिन पड़ने के कारण इन चारों दिवसों को अत्यंत भक्ति और समर्पण के साथ मंगला गौरी व्रत मनाया जाएगा। देवी पार्वती को समर्पित मंगला गौरी व्रत का धारण विशेष रूप से विवाहित महिलाएं और कुंवारी कन्याएं क्रमशः अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए और मनोवांछित वर प्राप्ति के उद्देश्य से करती हैं। इस दिन महिलाएं प्रातः स्नान आदि कर श्रृंगार कर माता गौरी की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं। शाम को चंद्रमा दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है।

अविवाहित कन्याएं भी अपने लिए उचित वर पाने की कामना के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। मान्यतानुसार माता पार्वती के द्वारा कठिन तपस्या करके और कई व्रत रहकर शिव को पाने की भांति ही कन्याएं कठिन जप- तप करके शिव जैसे वर की कामना कर सकती हैं। लौकिक विश्वास के अनुसार माता पार्वती की पूजा आराधना करने से कुंवारी कन्याओं को शिव समान वर की प्राप्ति होगी। गौरी पार्वती की इस व्रत के करने से कन्याओं की जल्दी शादी होती है। विवाह में आने वाली समस्त बाधाएं, सभी अवरोध समाप्त हो जाते हैं। और कन्याओं को शिव जैसे भोले, पत्निव्रता पति मिलते हैं। भारतीय परंपरा में शिव सबसे अच्छे पति माने जाते हैं, सभी कन्याएं इनके जैसा ही पति चाहती है। अनेक महिलाएं व कुंवारी कन्याएं इस व्रत को श्रावण मास में आरंभ कर सोलह अथवा बीस सप्ताहीय मंगलवार को अथवा पाँच वर्षों तक आने वाली सभी मंगलवार को मंगला गौरी व्रत का धारण करने के बाद उसका उद्यापन कर व्रत समाप्त करती हैं।

पौराणिक मान्यतानुसार भगवान शिव-पार्वती को श्रावण माह अति प्रिय है। श्रावण मास का प्रत्येक सोमवार भगवान शिव को समर्पित है, तो इसका अगला दिन मंगलवार शिवपत्नी सती अथवा पार्वती को। इसलिए श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिव पूजन किया जाता है तो इसके अगले दिन मंगलवार को मंगला गौरी व्रत के रूप में सती अथवा पार्वती का पूजन किया जाता है। श्रावण माह के मंगलवार को इस व्रत के आयोजन के कारण इसे मंगला गौरी भी कहा जाता है। गौरी पूजन में सुहाग के समान और 16-16 वस्तुओं का बहुत महत्व है। 16 अंक इस व्रत में मुख्य है। इसलिए इसे षोडश उमा व्रत भी कहा जाता है।

शिव समान वर प्रदात्री मंगला गौरी व्रत में गौरी पूजन किया जाता है। माता गौरा अर्थात माता पार्वती की कृपा प्राप्ति के लिए यह व्रत किया जाता है। इस व्रत का उल्लेख पद्म पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण, देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराण आदि पौराणिक और तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनके प्रेम व आशीर्वाद की प्राप्ति हेतु इस व्रत का पालन किया था। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धा एवं अत्यंत भक्ति के साथ इस व्रत को करने वाली विवाहित महिलाओं को अपने पति व परिवार की भलाई, खुशी और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह त्योहार प्रजनन और मातृत्व से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि मंगला गौरी व्रत को करने से महिलाओं को मां बनने का सुअवसर और एक स्वस्थ व सफल विवाहित जीवन भी प्राप्त हो सकता है।

मंगला गौरी व्रत के संबंध में पौराणिक ग्रंथों में कई कथाएं प्राप्य है, जिनमें कतिपय फेरबदल और नामभेद के साथ प्रायः एक समान ही कथाओं का सार व वर्णन है। मंगला गौरी व्रत के संबंध में प्रचलित एक पौराणिक कथा के अनुसार अतिप्राचीन काल में एक समय कुरु नामक देश में श्रुतिकीर्ति नामक एक बहुत प्रसिद्ध सर्वगुण संपन्न, अति विद्वान राजा हुआ करता था,  जो अनेक कलाओं तथा विशेष रूप से धनुर्विद्या में अति निपुण था। लेकिन सम्पूर्ण सुखों के बाद भी राजा के कोई संतान न होने के कारण वह बहुत दुखी और परेशान था। संतान सुख से वर्जित राजा जप-तप, ध्यान, और अनुष्ठान कर देवी की भक्ति-भाव से तपस्या करने में लीन रहता था। राजा की तपस्या से देवी प्रसन्न हुई, और राजा से वर मांगने को कहा। तब राजा ने कहा- माता, मैं सर्वसुखों व धन-धान्य से समर्थ हूं। लेकिन संतान-सुख से मैं वंचित हूं। मुझे वंश चलाने के लिए वरदान के रूप में एक पुत्र चाहिए। इस पर देवी ने कहा- राजन, यह बहुत ही दुर्लभ वरदान है, परंतु मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर यह वरदान तो देती हूं, लेकिन तुम्हारा पुत्र सोलह वर्ष तक ही जीवित रहेगा। यह बात सुन कर राजा और उनकी पत्नी बहुत चिंतित हुए। लेकिन सभी बातों को जानते-समझते हुए भी राजा-रानी ने यह वरदान मांग लिया। माता के आशीर्वाद से समय पर रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया।

राजा ने उस बालक का नामकरण संस्कार कर उसका नाम चिरायु रखा। वर्ष बीतते गए और राजा को अपने पुत्र की अकाल मृत्यु की चिंता सताने लगी। तब किसी विद्वान के सलाह पर राजा ने सोलह वर्ष से पूर्व ही अपने पुत्र का विवाह एक ऐसी कन्या से करा दिया, जो मंगला गौरी व्रत का पालन किया करती थी। जिससे उस कन्या को भी व्रत के फलस्वरूप सर्वगुण सम्पन्न वर की प्राप्ति हुई। उस कन्या को सौभाग्यशाली व सदा सुहागन का वरदान प्राप्त था। जिससे विवाह के उपरान्त उसके पति अर्थात राजा के पुत्र चिरायु की अकाल मत्यु का दोष स्वत: ही समाप्त हो गया, और राजा का वह पुत्र अपने नाम के अनुसार चिरायु सिद्ध हुआ। इस प्रकार सम्पूर्ण श्रद्धा व भक्ति भाव से इस व्रत को करने वाली विवाहित स्त्रियों व कुंवारी कन्याओं की समस्त इच्छाएं पूर्ण होकर सर्वसुखों की प्राप्ति होती है।

मंगला गौरी व्रत की इस कथा से मिलती- जुलती, कतिपय फेरबदल व नामभेद के साथ एक अन्य कथा भी अत्यंत प्रचलित व प्रसिद्ध है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक नगर में धर्मपाल नामक एक व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी बहुत सुंदर थी। उसके पास धन की बहुतायत थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। जिसके कारण वे बहुत दुखी रहा करते थे। भगवान के आशीर्वाद से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। लेकिन उसकी आयु बहुत कम थी। उनके बेटे को एक श्राप मिला था कि वह सोलह वर्ष की आयु में ही सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। संयोगवश धर्मपाल के उस अल्पायु पुत्र की शादी 16 वर्ष से पहले ही एक ऐसी युवती से हो गई, जो पिछले पांच वर्षों से मंगला गौरी व्रत का पालन करती थी। जिसके प्रताप से उस युवती को माता गौरी का आशीर्वाद और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त था। जिसके कारण वह कभी भी विधवा नहीं बन सकती थी। इस प्रकार माता गौरी में उस युवती की आस्था के कारण धर्मपाल के पुत्र ने 100 साल की लंबी आयु प्राप्त की। आज भी महिलाएं अपने पति और बच्चों के लंबे व खुशहाल जीवन के लिए मंगला गौरी व्रत का पालन करती हैं और माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

पौराणिक व तांत्रिक ग्रंथों में इस व्रत को अत्यधिक महत्व दिया गया है, और इससे संबंधित अनेक मंत्र अंकित हैं, जिसका कम से कम 11,21,51,108 बार या अपनी श्रद्धा के अनुसार जप करना सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। माता गौरी की दिव्य कृपा पाने के लिए आवाहनीय कुछ प्रमुख मंत्र -ॐ श्री मंगला गौरी देव्यै नमः।, ॐ पार्वती पतये नमः।, ॐ गौरीशंकराय नमः। तो अत्यंत प्रसिद्ध, प्रचलित व नित्य जपनीय हो गए हैं। देवी गौरी की स्तुति, तृप्ति, आवाहन, प्रसन्नता और उनका आशीर्वाद पाने के लिए शाक्तों में यह मंत्र भी अत्यंत प्रसिद्ध है-

सर्वमंगला मंगलये, शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरणय त्र्यम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते।।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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