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बिना इलाज मरने वाले दोगुना हुए

अधिकांश राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर दो के नीचे पहुंच गई है अर्थात हम अब जनसंख्या घटाने वाले स्वाभाविक दौर मे पहुंच गए हैं। खबर चौंकाने और डराने वाली है कि मृत्यु के वक्त डॉक्टरी या अस्पताल की सहायता नहीं पाने वाले लोगों की संख्या का अनुपात दो गुने से ज्यादा हो गया है। 2020 मे ऐसी मृत्यु वालों का अनुपात 18 फीसदी होता था तो 2024 में यह बढ़कर 45.5 फीसदी हो गया। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में यह अनुपात साठ फीसदी से भी ऊपर पहुंच गया है।

दस मई को सरकार के पत्र सूचना कार्यालय ने रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया द्वारा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम से कराए स्वास्थ्य, जनसंख्या और महत्वपूर्ण सांख्यिकी संबंधी नवीनतम रिपोर्ट जारी की तो जाहिर तौर पर उसमें उत्साहवर्द्धक सूचनाओं को प्रमुखता दी गई थी। एसआरएस के नाम से प्रसिद्ध यह सर्वेक्षण सरकारी तंत्र ही कराता है इसलिए इसके आंकड़ों की चर्चा करने में किसी किस्म की हिचक नहीं होती। इस बार के आंकड़े 2024 के सर्वेक्षण वाले थे और इसमें जनसंख्या वृद्धि दर कम होने, औसत मृत्यु दर गिरने, शिशु मृत्यु दर कम होने और प्रसव के समय होने वाली मौतों की कमी उत्साहजनक खबर थी तो उन्हें पर्याप्त प्रमुखता मिली भी।

अधिकांश राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर दो के नीचे पहुंच गई है अर्थात हम अब जनसंख्या घटाने वाले स्वाभाविक दौर मे पहुंच गए हैं। और राजनीतिक लाभ लेना वजह हो या सचमुच की चिंता तेलंगाना राज्य सरकार ने जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहन देने वाली योजना भी घोषित कर दी। लेकिन उसमें एक ऐसी बड़ी खबर या आंकड़े को छुपा लिया गया थास जिसके बारे में रजिस्ट्रार जनरल की तरफ से बाद में पूछने पर भी कोई सफाई नहीं आई। लेकिन प्रमुख अखबार ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के संवाददाता ने इस खबर पर काम किया, स्पष्टीकरण पूछा और कुछ छुपाकर ही खबर को प्रकाशित किया। छुपाकर इसलिए कि इसके पचासेक शब्द ही पहले पन्ने पर दबे हुए पड़े थे लेकिन अंदर के पन्ने पर ग्राफिक्स समेत विस्तार से खबर दी।

खबर चौंकाने और डराने वाली है कि मृत्यु के वक्त डॉक्टरी या अस्पताल की सहायता नहीं पाने वाले लोगों की संख्या का अनुपात दो गुने से ज्यादा हो गया है। 2020 मे ऐसी मृत्यु वालों का अनुपात 18 फीसदी होता था तो 2024 में यह बढ़कर 45.5 फीसदी हो गया। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में यह अनुपात साठ फीसदी से भी ऊपर पहुंच गया है। केरल में यह अनुपात 26.8 है जो पुराने राष्ट्रीय औसत 18 से काफी ऊपर है। एक फर्क शहरी और ग्रामीण का है जो क्रमश: 36.1 और 48.9 फीसदी का है, लेकिन अभी भी शहरी अनुपात भी काफी ऊंचा है और एसआरएस के पुराने आंकड़ों से काफी अधिक है। एसआरएस की रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट 2014 से लगातार दिख रही है और बढ़ती जा रही है। जब हमारे यहां दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना लागू है और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होने का दावा किया जा रहा है तब यह गिरावट ज्यादा चिंता का विषय है। और जब बाकी इन्डिकेटर अच्छे स्वास्थ्य की सूचना दे रहे हैं तो इसमें गिरावट की वजह क्या हो सकती है।

सर्वेक्षण के आंकड़ों या उसकी रिपोर्ट में कारणों की चर्चा संभव नहीं है। लेकिन जब गिरावट इतनी बड़ी हो तो कारण देखने ही होंगे, जिससे निदान की दिशा में बढ़ा जा सके। डॉक्टर की मौजूदगी और अस्पताल में होने भर से मौत टल जाती यह नतीजा निकालना तो सही नहीं होगा लेकिन अंतिम समय में किसी तरह के जानकार मदद न मिलने से कितने ही लोगों का जीवन छोटा जरूर हो गया। यह हमारे लिए राष्ट्रीय शर्म की बात है। रिपोर्ट के अनुसार मृत्यु के समय डॉक्टर या अस्पताल के पास न जाने वालों या जिनके पास उस वक्त किसी मेडिकल प्रशिक्षित व्यक्ति के न होने वालों का अनुपात 2020 से ज्यादा तेजी से गिरा है। यह वक्त कोविड का है। लेकिन उसके बाद तो चीजें सुधरनी चाहिए थीं। आंकड़े बताते हैं कि तब तक 30  फीसदी मौतें सरकारी अस्पतालों और 19 फीसदी मौतें निजी अस्पतालों में हो रही थीं। इस बीच ‘क्वालीफायड प्रोफेशनल’ की मदद न मिल पाने वाली मौतों का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर अस्पतालों से बाहर इसी अनुपात में अप्रशिक्षित लोगों की आंखों के सामने दम तोड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इस तेज गिरावट के कारण न बताए गए हों पर इसे समझना जरूरी है। इसका रिश्ता स्वास्थ्य सुविधाओं के अचानक हुए किसी अभाव से तो हो नहीं सकता क्योंकि ऐसी कोई खबर नहीं आई यही। सुविधाएं तो बढ़ ही रही हैं और छोटे छोटे शहरों में पांच तारा अस्पताल खुले है। ये इतने ‘सस्ते’ बताए जाते हैं कि यहां दुनिया भर से मरीज भी आ रहे हैं। जैसा पहले कहा गया है, स्वास्थ्य बीमा योजना सिर्फ केंद्र सरकार नहीं चला रही है, राज्य सरकारें होड़ लगाकर बेहतर सुविधा देने का दावा कर रही हैं। इसमें दो तीन बातें हो सकती हैं, आंकड़ों में पहले या अब ज्यादा गड़बड़ होना। अगर आज की सरकार अधिकांश आंकड़े सही जुटवा लेती है तो सिर्फ मौत से जुड़ा यह एक आंकड़ा क्यों इतना गलत हो जाएगा। इस बीच न तो ‘क्वालीफायड प्रोफेशनल’ की परिभाषा बदली है न मौत की रिपोर्टिंग का तरीका। इसकी दूसरी वजह केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लाई जा रही योजनाओं का झूठा प्रचार हो सकता है। इन योजनाओं के चक्कर में पहले से चल रही व्यवस्था को दरकिनार कर दिया गया है। और अगर ये आंकड़े सही हैं तो इसका मतलब यह है कि पहले की व्यवस्थाएं दोषपूर्ण होंगी लेकिन आज वाली योजनाओं से बेहतर थीं। अगर दस करोड़ परिवार आयुष्मान कार्ड पाकर अपने सदस्यों के इलाज पर पांच लाख तक का खर्च करने की स्थिति में हैं तो इस आंकड़े का मतलब यह है कि योजना को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है। कार्ड बनाने और बीमा कंपनी को प्रीमियम देकर सरकार अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ले रही है।

पर एक और बात इससे भी ज्यादा सच है और उसके लिए आंकड़े लाने की जरूरत नहीं है, निजी अस्पतालों का इलाज आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है। उसमें स्वास्थ्य बीमा के छौंक से भी फर्क नहीं हो रहा है। और लोग अपने मरते प्रियजनों को अस्पताल ले जाकर अपना मकान, दुकान और धंधा बिकवाना नहीं चाहते। अक्सर मरने वाला भी खुद अपने ऊपर इतने खर्च की मनाही करता है क्योंकि परिवार का धन जोड़ने का उसका अनुभव इसकी इजाजत नहीं देता। उसे मौत का मुंह देखना अस्पताल और डॉक्टर का मुंह देखने की तुलना में सस्ता लगता है। आयुष्मान योजना 2018 में आई है और कोविड के दौर 2020 के बाद। कोविड के टीकों को भी लोग मौत की रफ्तार बढ़ाने की वजह बताते हैं लेकिन इस बारे में कोई वैज्ञानिक साक्ष्य अभी तक नहीं है। पर इस बीच बिना उचित देखरेख वाली मौतों की रफ्तार से ज्यादा तेजी से झूठ और अफवाहों का बाजार भी बढ़ा है। पर मौत का सच सबसे बड़ा है और वह बता रहा है कि एक स्तर हासिल करने के बाद हम बुरी तरह असफल होते जा रहे हैं।

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