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प्रतिपक्ष को कोंचते रहने का क़ौमी-कर्तव्य

विपक्ष के लिए आगत के आसार सुनहरे हैं। मगर नियम और शर्तों के साथ। सब से पहली शर्त है एकजुटता। इस के लिए ज़रूरी है आपसी समरसता। अपना-तेरी की भावना से मुक्ति। तात्कालिक अहंकार को तिलांजलि। अगर कश्मीर से कन्याकुमारी और गुवाहाटी से गोवा तक सभी प्रतिपक्षी राजनीतिक हस्तियों और उन के चंगूमंगुओं ने एकीकृत बने रहने की इस नियमावली का पालन किया तो 2029 की गर्मियां आते-आते पूरे मुल्क़ के आसमान का रंग बदल चुका होगा।

पौने तीन साल बाद 2029 में लोकसभा के चुनाव तब जो होगा, सो, होगा। मगर तब तक क्या होगा? तब तक 24 नहीं तो 20 प्रदेशों में तो विधानसभा चुनाव होंगे ही। चार प्रदेशों – पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर – में अगले साल फरवरी-मार्च में चुनाव होने हैं। मई के महीने में उत्तरप्रदेश में चुनाव होंगे और 2027 का अंत आते-आते दिसंबर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव आ जाएंगे। 2028 के फरवरी-मार्च में मेघालय, नगालैंड, मिज़ोरम और त्रिपुरा में चुनाव होंगे। मई में कर्नाटक के चुनाव होंगे और साल के नवंबर आते-आते छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना के चुनाव आ जाएंगे।

2029 के मई-जून में लोकसभा चुनावों के साथ, अगर और किसी राज्य के चुनाव नहीं भी हुए तो, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओडिशा की विधानसभाओं के लिए तो मतदान होगा ही। वैसे उस बरस अक्टूबर में हरियाणा और जम्मू-कश्मीर तथा नवंबर में महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव कराने का वक़्त भी आ जाएगा और ‘एक देश, एक चुनाव’ का नारा बुलंद करते हुए इन तीन राज्यों और एक केंद्रशासित क्षेत्र के लिए मतदान भी लोकसभा चुनाव के साथ कराने का क़दम भी निर्वाचन आयोग उठा सकता है।

24 में से 13 प्रदेशों में अभी भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। 3 में उस के सहयोगी दलों की सरकारें हैं। यानी 2029 तक जिन 24 विधानसभाओं के लिए चुनाव होंगे, उन में से 16 पर भाजपा का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कब्जा है। बचे राज्यों में से 3 में कांग्रेस की सरकारें हैं और 2 में उस के सहयोगी दलों की। एक प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सरकार है। तो सारा दारोमदार इस पर है कि भाजपा 13 में से कितने प्रदेशों में वापसी करेगी और उस के सहयोगी दल कितने राज्यों में लौट कर आएंगे? कांग्रेस की गिनती कहां तक पहुंचेगी और उस के सहयोगी दलों की स्थिति क्या रहेगी?

क्या 2027 में पंजाब में आम आदमी पार्टी की जगह कांग्रेस की सरकार बन पाएगी? क्या उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मिल कर योगी आदित्यनाथ को पटखनी दे देंगे? क्या अपनी पतली हालत के कारण उत्तराखंड भाजपा की गोद से फिसल जाएगा? क्या गुजरात को भाजपा के चंगुल से खंीच कर बाहर लाने का करिश्मा राहुल गांधी दिखा पाएंगे? क्या गोवा और मणिपुर के तरल राजनीतिक समीकरण भाजपा के प्रभाव से मुक्त होंगे?

क्या 2028 में कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश को कांग्रेस दोबारा सहेज पाएगी? क्या मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी सरकारों की वापसी के आसार ठोस शक़्ल ले पाएंगे? क्या मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड और त्रिपुरा जैसे उत्तरपूर्वी राज्यों को भाजपाई रंग से बाहर निकालने की कूवत वहां के विपक्षी दलों में है?

क्या 2029 में जम्मू-कश्मीर और झारखंड की सरकारें इंडिया-समूह के पास ही बनी रहेंगी? क्या आंध्र प्रदेश से तेलुगु देशम की विदाई हो पाएगी? क्या महाराष्ट्र, हरियाणा और ओडिशा से भाजपा को निकाल बाहर करने की ताक़त विपक्षी दलों में आप को दिखाई दे रही है? क्या सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के मनोभाव बदलने के कोई आसार नज़र आ रहे हैं?

इस में कहीं कोई दो राय नहीं हैं कि देश के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं; कि नरेंद्र भाई मोदी की केंद्र सरकार से और राज्यों में भाजपा की सरकारों के रवैए से लोगों में क्षोभ ख़ासे उफ़ान पर है; कि ख़ुद नरेंद्र भाई और उन के रबर-स्टांप मुख्यमंत्रियों की लोकप्रियता का ग्राफ तेज़ी से नीचे आ रहा है; कि भाजपा में भीतरी खंीचतान बढ़ती जा रही है; कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि नरेंद्र भाई का चेहरा 2029 का चुनाव जिताने की गारंटी अब नहीं रह गया है। मगर बावजूद इस सब के क्या 2029 के लोकसभा चुनावों के पहले होने वाले 20 या 24 विधानसभा चुनावों से कोई ऐसा परिदृश्य उभरता दिखाई दे रहा है, जो केंद्र में बदलाव की जाज़म बिछा दे?

स्थूल निग़ाहों से दिखाई देने वाला दृश्य गड्डमड्ड है। यह कहना मुश्क़िल है कि अगले पौने तीन साल में 20 में से 10-12 या 24 में से 15-16 प्रदेशों का छींका टूट कर भाजपा-गठबंधन के प्रतिस्पर्धी दलों की गोद में आ गिरेगा। मगर सूक्ष्म नज़र से देखें तो आप इस नतीज़े पर पहुंचेंगे कि भाजपा और उस के सहयोगी दल आज भी इस स्थिति में नहीं है कि 13 या 16 प्रदेशों की सरकारों को अपनी बाहों में समेट कर रख पाएं। फिर अगले पौने तीन बरस में तो गंगा से ले कर नर्मदा तक और रावी-तवी से ले कर साबरमती और कृष्णा-गोदावरी तक में इतना पानी बहेगा कि उन की धारों में कौन कहां डूबेगा-उबरेगा, कौन जाने? भाजपा का यौवन अब अपने उतार पर है। छल-प्रपंच के जिम में फली-फूली उस की मांसपेशियों का ढलाव अब दूर से दिखने लगा है।

इसलिए विपक्ष के लिए आगत के आसार सुनहरे हैं। मगर नियम और शर्तों के साथ। सब से पहली शर्त है एकजुटता। इस के लिए ज़रूरी है आपसी समरसता। अपना-तेरी की भावना से मुक्ति। तात्कालिक अहंकार को तिलांजलि। अगर कश्मीर से कन्याकुमारी और गुवाहाटी से गोवा तक सभी प्रतिपक्षी राजनीतिक हस्तियों और उन के चंगूमंगुओं ने एकीकृत बने रहने की इस नियमावली का पालन किया तो 2029 की गर्मियां आते-आते पूरे मुल्क़ के आसमान का रंग बदल चुका होगा। तब नरेंद्र भाई अपना झोला उठा कर जाते दिखाई देने लगेंगे। मगर अगर यह आचरण संहिता उद्दंड-मंडलियों के खेल की गेंद बन गई तो नरेंद्र भाई चौथी बार प्रधानमंत्री बन पाएं, न बन पाएं, भाजपा का भानुमति कुनबा चौथी बार भी रायसीना पहाड़ी पर आ विराजेगा।

इसलिए अब एक-एक दिन सिर्फ़ राहुल गांधी के लिए ही नहीं, अखिलेश यादव के लिए, शरद पवार के लिए, तेजस्वी यादव के लिए, ममता बनर्जी के लिए, सी. जोसेफ विजय के लिए, उद्धव ठाकरे के लिए, उमर फारूक के लिए, एम. ए. बेबी के लिए और डी. राजा के लिए भी यक-सी अहमियत लिए हुए है। अरविंद केजरीवाल और असदुद्दीन ओवैसी की चरम चंचल भंगिमाओं का दैनिक अध्ययन करते रहना भी मौजूदा प्रतिपक्ष के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता होगी। ‘सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी’ के मंत्र का निरंतर स्मरण आने वाले वक़्त का सब से प्राथमिक कर्मकांड नहीं बना तो एक दचका पूरी रफ़्तार की लय बिगाड़ने को काफी होगा।

तो आइए, प्रतिपक्ष को सन्मति देने की प्रभु से प्रार्थना करें। प्रतिपक्ष के कर्णधारों पर आने वाली संभावित बलाओं को दूर भगाने के लिए आप-हम भी झाड़-फूंक करें। आसपास के बेतालों को उन की पीठ पर सवार होने से रोकने के लिए हम सब भी अपनी-अपनी धूनी की बगल में अपना-अपनाप्रति चिमटा गाड़ें। क्योंकि आने वाले पौने तीन साल भाजपा की नाक में दम करने वाले भले ही हों, विपक्ष को भी पैर पसार कर आरामतलबी करने देने के नहीं हैं। हुकूमत के सामने मुट्ठी तान कर खड़े होना जिन का राष्ट्र-धर्म है, प्रतिपक्ष को कोंचते रहना भी उन्हीं का क़ौमी-कर्तव्य है।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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