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सत्ता बदलती है, पर व्यवस्था वही रहती है!

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन को देखे। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?वह अभी भी वादा है। … आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम।

श्रीलंका में 2022 का आर्थिक संकट केवल महंगाई या विदेशी मुद्रा की कमी का संकट नहीं था। वह उस शासन व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे के टूटने का क्षण था। महंगाई लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई थी। श्रीलंकाई मुद्रा का मूल्य करीब आधा रह गया था। आम आदमी के लिए ईंधन, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना कठिन हो गया था।

इसी संकट से अरगलया आंदोलन पैदा हुआ। सिंहली भाषा में अरगलया का अर्थ है संघर्ष। मगर आंदोलन केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को हटाने के लिए नहीं था। उसका नारा था, व्यवस्था बदलो। पुराने चेहरों और पुरानी राजनीति से मुक्ति पाओ। सड़क पर जनता उतरी। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आंदोलन जीत गया। मगर उसके बाद क्या हुआ?

राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार उसी पुरानी संसद के पास था जिसके राजनीतिक ढांचे के खिलाफ जनता उठी थी। संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। वे श्रीलंका की उसी पुरानी राजनीति के अनुभवी नेता थे जिसे आंदोलनकारियों ने अस्वीकार किया था। जनता ने राष्ट्रपति को हटाया था। मगर नए राष्ट्रपति का चुनाव पुरानी व्यवस्था ने किया।

यही जनक्रांति का पहला विरोधाभास है। सड़क सत्ता को खाली करा सकती है। मगर खाली हुई सत्ता पर अधिकार किसका होगा, यह उस समय मौजूद संगठित राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।

श्रीलंका में आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को चुनावी रास्ता मिलने में दो वर्ष लग गए। सितंबर 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। वे नेशनल पीपुल्स पावर के नेता थे। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। पांच वर्ष बाद वे लगभग 42 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति बने। उसके बाद उनकी पार्टी को संसद में दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत मिला।

तब जाकर आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को एक राजनीतिक माध्यम मिला।

मगर यहां भी विरोधाभास समाप्त नहीं हुआ। जिस आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के खिलाफ जनता में असंतोष था, नई सरकार ने उसी आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखा।

तो आंदोलन ने क्या बदला?

उसने पहले दौर में राष्ट्रपति को हटाया। दूसरे दौर में, दो वर्ष बाद, मतदाताओं ने सत्ता के नए दावेदार को चुना। मगर आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की निरंतरता बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन व्यर्थ था। बल्कि यह कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की गति अलग-अलग होती है।

जनता एक दिन में राष्ट्रपति को हटा सकती है। मगर राज्य की आर्थिक निर्भरताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और शासन की आदतों को एक दिन में नहीं बदल सकती।

अब बांग्लादेश को देखिए।

अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना की सत्ता समाप्त कर दी। वर्षों से जमा असंतोष, राजनीतिक दमन और चुनावी विश्वसनीयता के संकट के बीच छात्रों का आंदोलन देशव्यापी विद्रोह बन गया।

हसीना चली गईं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फिर संवैधानिक सुधारों का एक दस्तावेज तैयार हुआ जिसे जुलाई चार्टर कहा गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, दो सदनों वाली संसद और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे।

यानी बांग्लादेश में आंदोलन केवल प्रधानमंत्री को हटाकर नहीं रुका। उसने नई राजनीतिक व्यवस्था का खाका भी तैयार किया। फरवरी 2026 में चुनाव हुए। कार्नेगी के विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने इन्हें लगभग दो दशकों में बांग्लादेश का पहला विश्वसनीय चुनाव बताया।

परिणाम में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, यानी बीएनपी, ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी को केवल छह सीटें मिलीं।

जरा इस परिणाम का अर्थ समझिए।

जिन छात्रों ने आंदोलन खड़ा किया, जिनके संघर्ष से पुरानी सत्ता गिरी, जिनकी नैतिक शक्ति पर राजनीतिक परिवर्तन संभव हुआ, चुनाव में उन्हें केवल छह सीटें मिलीं। आंदोलन की नैतिक विजय और चुनावी राजनीति की शक्ति एक जैसी नहीं होती। जनता किसी आंदोलन का समर्थन कर सकती है, मगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप सकती है।

बांग्लादेश में यही हुआ।

फिर भी छात्रों के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव के दिन ही मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को भी लगभग दो-तिहाई समर्थन से मंजूरी दी। इसका अर्थ था कि मतदाता नई सरकार चाहते थे, मगर संवैधानिक सुधार भी चाहते थे।

अब असली परीक्षा शुरू हुई।

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी ने चुनाव से पहले ही जुलाई चार्टर के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विशेषकर ऊपरी सदन की संरचना और कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पर। सत्ता में आने के बाद उसने सर्वोच्च न्यायालय के लिए अलग सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि पहले उसका समर्थन किया था।

यानी जनता ने जिस सुधार दस्तावेज को मंजूरी दी, उसे लागू करने वाली सरकार के अपने राजनीतिक हित थे। वह कुछ प्रावधानों को बदलना या कमजोर करना चाहती थी।

बांग्लादेश आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां भारत का सूचना अधिकार आंदोलन 2004 में पहुंचा था। मसौदा तैयार है। जनसमर्थन मौजूद है। राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मगर कानून को अंतिम रूप देने और लागू करने का अधिकार उन लोगों के पास है जिनके लिए उसके कुछ प्रावधान असुविधाजनक हो सकते हैं।

आंदोलन के सामने अब प्रश्न है कि वह इस प्रक्रिया पर कितना दबाव बनाए रख सकता है। क्योंकि संविधान में सुधार लिख देना और सत्ता को उन सुधारों के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना दो अलग काम हैं।

बांग्लादेश के छात्रों ने प्रधानमंत्री को हटा दिया। मगर वे उस पुरानी राजनीति को समाप्त नहीं कर सके जिसने चुनाव जीतकर फिर सत्ता संभाल ली। सड़क पर जनविद्रोह का नेतृत्व करने वाले चुनाव में सत्ता के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन जाते।

तीसरा उदाहरण नेपाल का है।

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। रॉयटर्स के अनुसार दो दिनों की हिंसा में 76 लोग मारे गए। पहले ही दिन पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

सरकार गिर गई।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। संसद भंग हुई और 5 मार्च 2026 को चुनाव हुए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अधिकांश सीटें मिलीं। 27 मार्च को बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नेपाल ने तीनों पड़ोसी देशों में सबसे तेजी से सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय चुनाव में बदला।

श्रीलंका में लगभग 26 महीने लगे। बांग्लादेश में करीब अठारह महीने। नेपाल में लगभग छह महीने। मगर जवाबदेही की गति यहां भी धीमी रही। 28 मार्च को पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री ओली और उनके गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई उस जांच आयोग की सिफारिश पर हुई जिसने पहले दिन प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी रोकने में विफल रहने के लिए ओली को जिम्मेदार माना था।

8 सितंबर को अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के खिलाफ जांच जारी थी और औपचारिक आरोप तय नहीं हुए थे। हालांकि दूसरी रिपोर्टों में आपराधिक लापरवाही के आरोपों का उल्लेख था। यानी सरकार गिर गई। चुनाव हो गए। नया प्रधानमंत्री आ गया। मगर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया अभी चल रही थी।

सत्ता परिवर्तन की घड़ी तेज चलती है। न्याय की घड़ी धीमी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के इन तीन अनुभवों में कुछ समानताएं हैं। मगर इनके कारण और परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

पहली समानता यह कि सत्ता का खाली स्थान अधिक देर खाली नहीं रहता। उसे वही राजनीतिक शक्ति भरती है जो पहले से संगठित है या जल्दी संगठन खड़ा कर सकती है।

श्रीलंका में पुरानी राजनीतिक परंपरा वाली पार्टी ने आंदोलन की मांग को चुनावी रास्ता दिया। बांग्लादेश में स्थापित बीएनपी ने सत्ता हासिल की। नेपाल में अपेक्षाकृत नई पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई। तीनों में सड़क का आंदोलन स्वयं सरकार नहीं बना।

आंदोलन की स्थायी शक्ति इस बात में थी कि वह सत्ता में आने वालों को चुनने और उनसे जवाब मांगने की नागरिक क्षमता पैदा कर सके। दूसरी समानता यह कि किसी दस्तावेज को जनता की मंजूरी मिल जाना उसके लागू होने की गारंटी नहीं है।

बांग्लादेश में मतदाताओं ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया। मगर उसके बाद संघर्ष कानून के प्रावधानों, उनके कमजोर किए जाने और लागू होने की प्रक्रिया में पहुंच गया।

भारत में सूचना अधिकार आंदोलन को भी यही लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तीसरी समानता यह कि समझौता, न्याय और जवाबदेही की घड़ियां अलग-अलग चलती हैं।

सोशल मीडिया के सहारे लाखों लोग कुछ घंटों में जुट सकते हैं। सरकार को कुछ दिनों में गिराया जा सकता है। मगर समझौते के लिए ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो आंदोलन की ओर से निर्णय ले सकें। और न्याय के लिए संस्थाएं चाहिए जो अपने निर्णयों को लागू भी कर सकें।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे लंबा इंतजार अक्सर उन परिवारों को करना पड़ता है जिन्होंने आंदोलन में अपने लोगों को खोया होता है। मगर क्या इन तीनों देशों में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि उनके राज्य कमजोर थे? और क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय राज्य मजबूत है?

यह तुलना इतनी सरल नहीं है। इन घटनाओं को समझने के लिए चार बातों पर गौर करना होगा।

पहली है आर्थिक स्थिति। श्रीलंका में आर्थिक संकट असाधारण था। देश भुगतान संकट से जूझ रहा था। बांग्लादेश में भी विदेशी मुद्रा भंडार लगभग तीन महीने के आयात के बराबर रह गया था।

दूसरी है सुरक्षा बलों की भूमिका। बांग्लादेश में सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार किया। नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में पहले ही दिन कम से कम 19 लोग मारे गए।

तीसरी है सरकार की वैधता पर जनता का भरोसा। बांग्लादेश में जनवरी 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद शासन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। नेपाल में घातक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन के भीतर सरकार गिर गई।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रशासनिक मशीनरी की निरंतरता। यही वह पहलू है जिस पर तोकविल सबसे अधिक ध्यान देते। सरकारें गिर गईं। मगर उनके साथ प्रशासन समाप्त नहीं हुआ। बांग्लादेश के बारे में पालीवाल का निष्कर्ष है कि जिस क्रांति ने नई व्यवस्था स्थापित की, उसके बाद भी पुरानी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बना रहा। यही राज्य की वास्तविक शक्ति है। राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। मगर नौकरशाही, संस्थागत हित, प्रशासनिक नियम और शासन की परंपराएं बनी रह सकती हैं।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। मगर अंतर केवल इतना नहीं कि वहां कमजोर राज्य हैं और यहां मजबूत राज्य।

भारत में श्रीलंका जैसा दिवालियापन नहीं है। सुरक्षा बलों की निष्ठा डगमगाने का कोई संकेत नहीं है। न्यायालय, मंत्रालय और संघीय व्यवस्था काम कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के आंदोलन की मांग भी इन देशों के आंदोलनों से छोटी है। यहां सरकार गिराने की मांग नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है।

ऐसी परिस्थिति में सरकार के लिए किसी व्यक्ति का इस्तीफा स्वीकार करना, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया बदलने की अपेक्षा कहीं आसान हो सकता है। यहीं भारत के लिए तोकविल की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां खतरा सरकार के गिर जाने का नहीं, बल्कि आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर लेने का है। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है। समिति बना सकती है। इस्तीफा ले सकती है। नया कानून घोषित कर सकती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है। मगर जिस प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन हुआ था, वह जस की तस बनी रह सकती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बताते हैं कि सरकार गिर जाने के बाद क्या होता है।

भारत के अपने आंदोलन बताते हैं कि सरकार के बने रहने और आंदोलन की मांग स्वीकार कर लेने के बाद क्या होता है। और इसका सबसे ताजा उदाहरण स्वयं कॉकरोच जनता पार्टी का पिछला आंदोलन है। 25 जुलाई को जंतर मंतर पर पांच सप्ताह से अधिक चले आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया।

सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। संगठन ने कहा कि सरकार ने उसकी सभी मांगें स्वीकार कर ली हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, कुछ दिनों के भीतर इसकी लिखित गारंटी देना, नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और परीक्षा सुधार के पांच सूत्री मांगपत्र पर विचार करना शामिल था।

सीजेपी ने कहा कि वह सद्भावना के आधार पर आंदोलन वापस ले रही है। उसे भरोसा है कि तय शर्तें तय समयसीमा में पूरी होंगी। मंत्री का इस्तीफा हो गया। समझौता हो गया। आंदोलन समाप्त हो गया।

मगर दो दिन बाद, 27 जुलाई को संगठन लिखित गारंटी का इंतजार कर रहा था। उसने सरकार को मंगलवार तक का समय दिया। 25 अगस्त को सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की हैं। संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार से तीन बार एफआईआर की समेकित सूची मांग चुका था।

सीजेपी ने 5 सितंबर को फिर मार्च करने की घोषणा की। फिर 1 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दीं। सरकार ने अदालत को बताया कि वह तीन महीने के भीतर पूरे देश के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगी। इसके बाद सीजेपी ने अपना प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया।

जरा इस घटनाक्रम को देखिए। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?

वह अभी भी वादा है। दिसंबर की शुरुआत तक उसे तैयार करने की बात कही गई है। यानी आंदोलन की एक मांग पूरी हुई। दूसरी मांग के लिए नई समयसीमा मिल गई।

और यही पूरी कहानी का सार है।

सरकार के लिए घोषणा करना एक घटना है। नागरिक के लिए उस घोषणा का लागू होना एक लंबी प्रक्रिया। मंत्री के इस्तीफे की खबर तुरंत बनती है। कानून में सजा बढ़ाने की घोषणा सुर्खियां बनती है। अदालत का आदेश खबर बनता है।

मगर उसके बाद फाइल कहां पहुंची, किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस परिवार को कितना मुआवजा मिला और किस छात्र को कब राहत मिली, इसकी खबर कौन रखता है?

यह काम महीनों और अनेक दफ्तरों में बंट जाता है। सरकार को घोषणा करने का श्रेय मिल जाता है। मीडिया को एक बड़ी खबर मिल जाती है। जनता को लगता है कि मामला समाप्त हो गया। जबकि काम अधूरा रहता है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हर अधिकारी की नीयत खराब हो। समस्या व्यवस्था की बनावट में भी है। एक सार्वजनिक घोषणा कहानी को समाप्त कर सकती है, जबकि उसका वास्तविक काम अभी शुरू भी नहीं हुआ होता। फिर जब महीनों बाद वादा पूरा नहीं होता तो उसे पुराने समझौते की अधूरी जिम्मेदारी के बजाय एक नया विवाद मान लिया जाता है।

इस तरह सत्ता की जवाबदेही लगातार टुकड़ों में बंटती रहती है। सीजेपी ने समयसीमाएं तय करके, सरकार के वादों की निगरानी करके और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस सिलसिले को टूटने नहीं दिया।

मगर यह भी समझना होगा कि हर प्रदर्शनकारी ऐसा नहीं कर सकता। जिस नौजवान की परीक्षा सिर पर है, वह कितने महीने धरने पर बैठेगा? जिस मजदूर को रोज कमाना है, वह कितने दिन अदालत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएगा?

आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम। और नागरिक के लिए सबसे महंगी चीज वही है जो सरकार के पास सबसे अधिक है। (जारी)

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