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अंग्रेजों, स्वदेशी गद्दारों से जूझने वाली रानी लक्ष्मीबाई

झांसी और कालपी के पतन के बाद महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और राव साहब के नेतृत्व में क्रांतिकारी ग्वालियर पहुंचे। उस समय ग्वालियर का किला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहां जो घटनाएं हुईं, वे भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और विवादित अध्यायों में गिनी जाती हैं।सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 1857 का स्वातंत्र्य समर में लिखा है कि यदि सिंधिया की सेना और संसाधन पूरी तरह क्रांतिकारियों के साथ आ जाते, तो संभव था कि भारत 1857 में ही स्वतंत्र हो जाता।

अशोक “प्रवृद्ध”

झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में है, जो एक ओर राष्ट्रगौरव की सर्वोच्च ऊंचाई दिखाती हैं, तो दूसरी ओर आंतरिक विश्वासघात की सबसे दर्दनाक तस्वीर भी सामने रखती हैं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की इस महानायिका को केवल ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत से ही नहीं, बल्कि स्वदेशी गद्दारों और अवसरवादी सामंतों की साजिशों से भी एक साथ लड़ना पड़ा था।

ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि झांसी के युद्ध में ब्रिटिश सेनापति जनरल ह्यूरोज की सेना महारानी के अभेद्य प्रतिरोध से हतोत्साहित हो चुकी थी। दुर्ग की प्राचीरों पर तैनात सैनिक अंग्रेजों पर काल बनकर टूट रहे थे। ऐसे निर्णायक समय में स्वार्थ और लालच के कारण विश्वासघात ने जन्म लिया। झांसी की सेना में एक विश्वस्त तोपची और द्वार रक्षक दूल्हाजू (दीवान दूल्हा जू) था। इतिहासकार वृंदावनलाल वर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक झांसी की रानी तथा समकालीन अभिलेखों के अनुसार दूल्हाजू ने अंग्रेजों से धन और भविष्य में जागीर पाने के लालच में गुप्त समझौता कर लिया था।

समझौते के अनुसार, जब ब्रिटिश सेना पराजय के करीब थी, तब 3 अप्रैल 1858 की रात दूल्हाजू ने दुर्ग का ओरछा फाटक चुपचाप अंग्रेजों के लिए खोल दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना किले के भीतर घुस आई। इस विश्वासघात ने लगभग सुनिश्चित विजय को संकट में बदल दिया। परिणामस्वरूप महारानी को दामोदर राव को पीठ पर बांधकर किले से बाहर निकलना पड़ा।

झांसी और कालपी के पतन के बाद महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और राव साहब के नेतृत्व में क्रांतिकारी ग्वालियर पहुंचे। उस समय ग्वालियर का किला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहां जो घटनाएं हुईं, वे भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और विवादित अध्यायों में गिनी जाती हैं।

ग्वालियर के महाराजा जयाजीराव सिंधिया और उनके प्रधानमंत्री सर दिनकर राव ने विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर ब्रिटिश सत्ता का साथ देने का निर्णय कर लिया था। विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 1857 का स्वातंत्र्य समर में लिखा है कि यदि सिंधिया की सेना और संसाधन पूरी तरह क्रांतिकारियों के साथ आ जाते, तो संभव था कि भारत 1857 में ही स्वतंत्र हो जाता।

इतिहासकारों के अनुसार 1 जून 1858 को जब महारानी और तात्या टोपे की सेना ग्वालियर पहुंची, तब सिंधिया की सेना के एक बड़े हिस्से, विशेषकर मुरार छावनी के सैनिकों ने महारानी का स्वागत किया और क्रांतिकारियों के साथ मिल गए। इस जनविद्रोह से घबराकर जयाजीराव सिंधिया आगरा जाकर अंग्रेजों की शरण में चले गए।

हालांकि ग्वालियर की सेना का बड़ा हिस्सा क्रांतिकारियों के साथ था, लेकिन प्रशासनिक तंत्र और कुछ प्रभावशाली सामंत गुप्त रूप से अंग्रेजों की मदद करते रहे। आगरा पहुंचने के बाद भी दिनकर राव के माध्यम से ब्रिटिश सेना को ग्वालियर के शस्त्रागार, किले की सुरक्षा व्यवस्था और सैन्य कमजोरियों की जानकारी लगातार भेजी जाती रही। जनरल ह्यूरोज ने अपनी सैन्य डायरी और ब्रिटिश सरकार को भेजी रिपोर्टों में स्वीकार किया था—

“यदि सिंधिया हमारे प्रति निष्ठावान न रहते, तो हमारे पैर उखड़ चुके थे। उनकी निष्ठा ने मध्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के पुनरुद्धार में संजीवनी का कार्य किया।”

लोककथाओं और सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर कविता झांसी की रानी में भी सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताया गया है। लोकश्रुतियों में यह भी कहा जाता है कि ग्वालियर के अस्तबल से महारानी को जानबूझकर एक कमजोर या अप्रशिक्षित घोड़ा दिया गया था, जो अंतिम समय में नाले को पार नहीं कर सका। ऐतिहासिक ग्रंथों में इस बात पर मतभेद है कि घोड़ा जानबूझकर बदला गया था या वह नया और युद्धभूमि से अपरिचित था, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह घटना महारानी के लिए घातक सिद्ध हुई।

17-18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटाह-की-सराय में कैप्टन हीथकोट और जनरल ह्यूरोज की संयुक्त सेनाओं ने महारानी को घेर लिया। ब्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार पीर अली जैसे कुछ स्थानीय जमींदारों और मुखबिरों ने अंग्रेजों को महारानी की सटीक स्थिति तथा उनके पुरुष वेश की जानकारी दी थी। इसी कारण अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें लक्ष्य बनाकर भीषण हमला किया।

महारानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष केवल झांसी और ग्वालियर तक सीमित नहीं था। कुंच और कालपी के युद्ध मध्य भारत में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण सैन्य मोर्चों में थे। झांसी के पतन के बाद महारानी कालपी पहुंचीं, जहां तात्या टोपे और राव साहब की सेनाओं को एकत्र होना था। कालपी के मार्ग की सुरक्षा के लिए कुंच को पहली रक्षा पंक्ति बनाया गया।

कर्नल मालेसन की पुस्तक द इंडियन म्यूटिनी ऑफ 1857 तथा बुंदेलखंड के अभिलेखों के अनुसार बाणपुर के राजा मर्दन सिंह और शाहगढ़ के राजा बखत बली साधारण विद्रोही नहीं थे। उन्होंने झांसी के पतन से पहले ही मदनपुर दर्रे पर जनरल ह्यूरोज की सेना को रोकने के लिए भीषण संघर्ष किया था। पराजय के बाद भी उन्होंने अपनी बची हुई सेना और तोपखाने के साथ कुंच में महारानी का साथ दिया।

कुंच की लड़ाई में क्रांतिकारियों की हार का बड़ा कारण आपसी समन्वय की कमी और भीषण गर्मी थी। स्थानीय सैनिकों के साहस के बावजूद अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों और एनफील्ड राइफलों के सामने उनका पारंपरिक तोपखाना कमजोर पड़ गया। जब ह्यूरोज ने कुंच के पार्श्व से हमला किया, तो यह भ्रम फैल गया कि क्रांतिकारी चारों ओर से घिर चुके हैं। सेना बिखरने लगी। ऐसे समय में केवल महारानी लक्ष्मीबाई की अनुशासित टुकड़ी ही पीछे हटते हुए भी अंग्रेजों को रोकती रही।

कुंच की पराजय के बाद सभी क्रांतिकारी कालपी में एकत्र हुए। कालपी का किला सामरिक दृष्टि से बेहद मजबूत माना जाता था। यहां राजा मर्दन सिंह और राजा बखत बली ने महारानी के साथ मिलकर अंतिम सांस तक लड़ने की प्रतिज्ञा की।

सावरकर के अनुसार युद्ध से पहले महारानी ने सभी राजाओं और सरदारों को झकझोर दिया। उसके बाद बाणपुर और शाहगढ़ के राजाओं ने अपनी बची-खुची संपत्ति और सैनिक राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिए। कालपी में बांदा के नवाब अली बहादुर द्वितीय भी अपनी बड़ी सेना के साथ आ मिले, जिससे क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ गया।

22 मई 1858 को महारानी लक्ष्मीबाई, राजा मर्दन सिंह और राजा बखत बली के संयुक्त नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने ऐसा भीषण आक्रमण किया कि ब्रिटिश सेना डगमगाने लगी। जनरल ह्यूरोज स्वयं संकट में पड़ गया। लेकिन तभी कर्नल मैक्सवेल के नेतृत्व में ब्रिटिश कैमल कॉर्प्स (ऊंट सवार दस्ता) अचानक युद्धक्षेत्र में पहुंच गया। उसी समय आसपास के कुछ स्थानीय जागीरदारों ने क्रांतिकारियों को रसद और सहायता देने से इंकार कर दिया। थकी हुई क्रांतिकारी सेना इस नई चुनौती का सामना नहीं कर सकी और कालपी भी हाथ से निकल गई।

इतिहास में इन क्षेत्रीय राजाओं की भूमिका अक्सर झांसी की रानी और तात्या टोपे की प्रसिद्धि के पीछे दब जाती है, जबकि उपलब्ध साक्ष्य उनके असाधारण साहस और बलिदान की पुष्टि करते हैं। कालपी और कुंच के युद्ध बताते हैं कि बाणपुर और शाहगढ़ जैसे क्षेत्रीय शासकों में राष्ट्रभक्ति और अंग्रेजों के प्रति गहरा आक्रोश था। वे गद्दार नहीं थे, बल्कि एक ऐसी बिखरी हुई व्यवस्था के शिकार थे, जिसमें मजबूत केंद्रीय नेतृत्व का अभाव था। यदि उनके साहस को झांसी की रानी की रणनीति और तात्या टोपे के दीर्घकालिक सैन्य समर्थन का पूरा लाभ मिलता, तो कालपी का परिणाम अलग हो सकता था।

महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस केवल एक वीरांगना की शहादत का स्मरण नहीं है। यह उस कटु सत्य की भी याद दिलाता है कि जब-जब राष्ट्रहित पर व्यक्तिगत स्वार्थ, सत्ता की सुरक्षा और आंतरिक षड्यंत्र हावी हुए हैं, तब-तब देश को पराजय और पराधीनता झेलनी पड़ी है।

दूल्हाजू का लालच हो या कुछ देशी रियासतों की दूरदर्शिता-विहीन अंग्रेजपरस्त नीतियां—इन सबने मिलकर उस स्वतंत्रता-ज्वाला को कुछ समय के लिए मंद कर दिया, जो 1857 में ही अंग्रेजी शासन को समाप्त कर सकती थी।

इतिहास के इन अंधेरे पन्नों से सीख लेकर ही कोई राष्ट्र अपनी एकता, आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत रख सकता है। वीरांगना लक्ष्मीबाई का शौर्य और विश्वासघात का यह इतिहास हमें हमेशा सजग रहने की प्रेरणा देता है।

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By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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