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चमकता सोना और डूबता डॉलर

2026 के पहले चार हफ्तों में सोने की कीमत में 17 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ। सोने और चांदी के भाव में अभूतपूर्व उछाल असल में विश्व अर्थव्यवस्था में युगांतकारी परिवर्तन का सूचक है। यह कोई फौरी समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे इस समय हो रहा ढांचागत बदलाव है। इस बदलाव के बाद कैसी व्यवस्था उभरेगी, अभी यह साफ नहीं है।… भविष्य की विश्व मौद्रिक व्यवस्था को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है। मगर वर्तमान डॉलर के दिन लद गए हैं, इस संबंध में अब कोई अस्पष्टता नहीं है।

पिछले 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत प्रति औंस 5000 डॉलर को पार कर गई। उधर चांदी की कीमत भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची। (उसके अगले दिन भारतीय बाजार में प्रति दस ग्राम सोने का भाव एक लाख 61 हजार रुपये और प्रति एक किलोग्राम चांदी की कीमत तीन लाख 70 हजार रुपये से ऊपर हो गई थी।) उसके बाद से इन दोनों धातुओं के भाव में बढ़ोतरी का क्रम जारी है। इनके भाव कहां तक जाएंगे, फिलहाल इसका अनुमान किसी को नहीं है। इसलिए कि इस बात का अंदाजा किसी को नहीं है कि दुनिया की वित्तीय एवं मौद्रिक व्यवस्थाओं में मची उथल-पुथल किस हद तक बढ़ेगी और उसके परिणास्वरूप मूल्य भंडारण (value storage) एवं अंतरराष्ट्रीय भुगतान की कैसी नई व्यवस्थाएं अस्तित्व में आएंगी। अनुमान यही है कि जब तक इस बारे में स्पष्टता नहीं आती, सोना और चांदी के भाव संभवतः बढ़ते ही रहेंगे।

ये दोनों धातु उत्पन्न आर्थिक मूल्य के भंडारण का माध्यम ऐतिहासिक रूप से रहे हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई अन्य धातुओं को भी भंडारण का माध्यम बनाया गया, लेकिन जो टिकाऊपन सोना (और एक हद तक चांदी) का रहा, वह बेमुकाबिल है। अभी 55 साल पहले (1971) तक सोना मौद्रिक व्यवस्था का प्रतिमान था। मगर अपनी आर्थिक शक्ति एवं विश्व वर्चस्व की पराकाष्ठा के दौर में अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी (ब्रेटेन वुड्स) व्यवस्था को तोड़ते हुए अपनी मुद्रा यानी डॉलर को ही प्रतिमान बना दिया था।

अमेरिका के हैम्पशर राज्य में स्थित ब्रेटन वुड्स में दूसरे विश्व युद्ध के बाद की विश्व मौद्रिक व्यवस्था को स्वरूप दिया गया था। उसके तहत तय किया गया कि अमेरिका अपने भंडार में मौजूद सोने के अनुपात में डॉलर की छपाई करेगा। हर एक औंस डॉलर के बदले वह 35 डॉलर छाप सकेगा। बाकी दुनिया की मुद्राओं की कीमत डॉलर से जुड़ी होगी। यह एक तरह की स्थिर व्यवस्था थी। प्रावधान यह भी था कि कोई भी देश या व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कमाए गए डॉलर अमेरिका को सौंप कर उसके बदले सोना ले सकेगा। यानी हर 35 डॉलर पर एक औंस सोना।

इस व्यवस्था में मुद्रास्फीति की गुंजाइश नहीं थी। इसलिए कि मुद्रा की अंधाधुंध छपाई संभव नहीं थी। मुद्रा छापने के लिए अपने भंडार में उसी अनुपात में सोना जुटाना अनिवार्य था। मगर इस व्यवस्था को चलाना अमेरिका को भारी पड़ने लगा। अपने यहां कल्याणकारी योजनाओं पर आमदनी के अनुपात में अधिक खर्च, कोरिया, वियतनाम आदि जैसी जगहों पर युद्ध का बोझ, एवं दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सैन्य अड्डे स्थापित करने के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता के कारण उसके सामने अतिरिक्त डॉलर छापने (deficit financing) की मजबूरी आ गई, जिससे उसकी वित्तीय व्यवस्था पर अविश्वास पैदा होने लगा। नतीजतन, जर्मनी जैसे कई देशों को अपने भंडार में डॉलर रखना जोखिम भरा महसूस होने लगा। तो उन्होंने अपने पास मौजूद डॉलर के बदले सोने की मांग शुरू कर दी। इस मांग को पूरा करना अमेरिका को मुनासिब नहीं लगा।

तो अचानक एक दिन- 15 अगस्त 1971 को- तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म करने का एलान कर दिया। इसका अर्थ था कि अब डॉलर की छपाई सोने की उपलब्धता पर निर्भर नहीं रहेगी। ना ही अमेरिका किसी को डॉलर के बदले सोना नहीं देगा। आम सहमति से बनी विश्व वित्तीय व्यवस्था को इस तरह अमेरिका ने मनमाने और एकतरफा ढंग से तोड़ डाला। मगर तब अमेरिका की हैसियत ऐसी थी कि बाकी दुनिया के पास उसके निर्णय को स्वीकार कर लेने के अलावा कोई चारा नहीं था।

इसके तुरंत बाद अमेरिका ने दबाव बना कर पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देशों- खासकर सऊदी अरब को राजी कर लिया कि वे कच्चे तेल की बिक्री सिर्फ डॉलर से भुगतान पर ही करेंगे। इसके बदले अमेरिका ने सऊदी अरब को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी खुद पर ली। इस तरह पेट्रो-डॉलर का सिस्टम वजूद में आया। पश्चिम एशिया के पेट्रोलियम उत्पादक लगभग सभी देश इस सिस्टम में शामिल हो गए। इस व्यवस्था में यह भी अंतर्निहित था कि वो देश जो तेल बेच कर जो डॉलर कमाएंगे, उसका निवेश अमेरिका सरकार के (ट्रेजरी) बॉन्ड्स में करेंगे। इस तरह उन देशों का मूल्य स्वतः अमेरिका पहुंचने लगा।

चूंकि तेल सबको चाहिए, इसलिए सभी देशों के लिए अपने भंडार में डॉलर रखना जरूरी हो गया। फिर यह चलन बढ़ता गया कि तमाम देश कमाए गए डॉलर का निवेश अमेरिकी बॉन्ड्स में करें। तो चलन यह बना कि तमाम देश अपने संसाधन एवं श्रम से जो कमाएंगे, उसका एक हिस्सा अमेरिका में निवेश करेंगे। उधर विभिन्न देश अपने वास्तविक उत्पाद का निर्यात अमेरिका को करेंगे, जबकि उसके बदले अमेरिका उन्हें डॉलर नाम का छपा हुआ कागज एक टुकड़ा देगा। इसे ही फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जिस्कार देस्तां ने अमेरिका का exorbitant privilege कहा था।

अमेरिका का वर्चस्व दुनिया पर बना रहा, तो उसके पीछे यही अर्थव्यवस्था रही है। इससे अमेरिका को सभी देशों को अपने मन-माफिक चलाने की ताकत मिली, क्योंकि जो ऐसा नहीं करता, उस पर प्रतिबंध लगा कर डॉलर की व्यवस्था से वह बाहर कर सकता था। और उसने ऐसा किया भी। मगर, जैसा आम तौर पर होता है, किसी भी चीज की अति बुरी होती है। किसी शक्ति का अत्यधिक दुरुपयोग विपरीत परिणाम पैदा करने लगता है। यही डॉलर और प्रकरांतर में अमेरिका के वर्चस्व के साथ हो रहा है। आमदनी से ज्यादा कर्ज लेने की बढ़ती गई प्रवृत्ति और अंधाधुंध नोट की छपाई ने डॉलर के मूल्य में सेंध लगाई है, तो प्रतिबंधों के दुरुपयोग ने विभिन्न देशों को डॉलर में निवेश घटाने के लिए प्रेरित किया है। इन देशों में भारत भी हैः

–     भारतीय रिज़र्व बैंक अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड्स में अपने निवेश को घटा कर पांच साल के निचले स्तर तक ले आया है। भारत ने 2025 में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में अपना निवेश लगभग 21 प्रतिशत घटाया। ट्रेजरी बॉन्ड्स में रिज़र्व बैंक की होल्डिंग्स अक्टूबर 2024 में 241।4 बिलियन डॉलर थी। अक्टूबर 2025 में यह 190।7 बिलियन रह गई।

–     इस बीच रिजर्व बैंक ने सोने में अपना निवेश बढ़ाया है। रिजर्व बैंक के पास 2023 में लगभग 760 टन सोना था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 880 टन हो गया। मूल्य के लिहाज़ से यह वृद्धि लगभग 25–30 बिलियन डॉलर की रही। कुल सोने का भंडार नवंबर 2025 में 106।7 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था।

–     जो रास्ता भारत ने अपनाया है, उस पर ही दुनिया भर के अनेक देश चले हैं। ट्रेजरी बॉन्ड्स में सबसे ज्यादा निवेश घटाने और सोना खरीदने वाला देश चीन रहा है। यहां तक कि पोलैंड जैसे देश ने भी बड़ी मात्रा में सोने की खरीदारी की है।

–     इस परिघटना का परिणाम यह है कि 1990 के दशक के बाद अब ऐसा पहली बार हुआ, जब बीते अक्टूबर में तमाम देशों के सेंट्रल बैंकों के भंडार में मौजूद सोने की कीमत उनके ट्रेजरी बॉन्ड्स में निवेश से अधिक हो गई। उसके बाद से यह अंतर (सोने के हक में) बढ़ता ही गया है।

और बात सिर्फ सेंट्रल बैंकों की नहीं है। अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी बॉन्ड्स को लेकर निजी निवेशकों का भरोसा भी चूक रहा है। यानी वे भी अमेरिकी बॉन्ड्स बेच कर सोना खरीद रहे हैं। यही कारण है कि सोने के भाव में अभूतपूर्व तेजी आई हुई है। वैसे, ये परिघटना पुरानी है, मगर डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद नीतियों में बढ़ी अस्थिरता ने इसे और गति प्रदान कर दी है। गौर करेः

–     2026 के पहले चार हफ्तों में सोने की कीमत में 17 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ।

–     अमेरिका की प्रोफेशनल सर्विसेज फर्म RSM US के मुख्य अर्थशास्त्री जो। ब्रूसुएलस ने एक न्यूज वेबसाइट से कहा- सोने में बढ़ रहा निवेश मुख्य रूप से अमेरिका सरकार की अप्रत्याशित नीतियों से पैदा हुए जोखिम का परिणाम हैं।

–     एसेट एडवाइजरी फर्म Twin Focus के सीईओ पॉल कार्गर ने कहा कि अमेरिका में ‘नीतिगत विखंडन’ की स्थिति के बीच सोना एक तरह से बीमा का काम कर रहा है।

–     विशेषज्ञों के मुताबिक अनेक केंद्रीय बैंक (खासकर यूरोपीय) अभी भी अमेरिकी ट्रेज़री खरीद रहे हैं, लेकिन इन खरीदारियों की गति धीमी हो गई है।

–     अनेक ऐसे देश, जो पहले अपनी राशि डॉलर या ट्रेज़री में रखते थे, अब अमेरिका से दूर होकर अपनी पूंजी के भंडारण लिए नए माध्यम ढूंढ रहे हैं। सोना इसमें उनका सबसे भरोसेमंद माध्यम बना है। साथ ही विभिन्न देश अपने विदेशी मुद्रा भंडारों में यूरो (यूरोपियन यूनियन), येन (जापान), युवान (चीन) आदि जैसी मुद्राओं की मात्रा बढ़ा रहे हैं।

(https://www.axios.com/2026/01/27/trump-gold-rally-risk)

मुद्रा भंडार के स्वरूप में बदलाव इस घटनाक्रम का सिर्फ एक पक्ष है। मुद्रा की दूसरी भूमिका कारोबार में लेन-देन का सेटलमेंट करने की होती है। इस बिंदु पर डॉलर अभी भी सबसे बड़ी मुद्रा है। वैश्विक कारोबार में सबसे ज्यादा भुगतान इसी मुद्रा के जरिए हो रहा है। लेकिन इसमें भी बदलाव का रुझान लगातार अधिक साफ होता चला गया है। विभिन्न देशों में आपसी मुद्राओं के जरिए भुगतान करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। चीन आज अपने लगभग आधे आयात-निर्यात का सेटलमेंट अपनी मुद्रा युवान और संबंधित देश की मुद्रा में करता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व प्रथम उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने हाल में दावोस में एक चर्चा के दौरान स्वीकार किया कि यह एक बड़ा बदलाव है। कहा कि चीन का अपना कारोबार इतना बड़ा है कि उसका डॉलर से हटना डॉलर वर्चस्व के लिए एक बड़ी चुनौती है।

(https://www.youtube.com/watch?v=r_VlnirCdAE&t=3s)

आम समझ रही है कि भू-राजनीति एवं सामरिक समीकरणों में अमेरिकी दबदबा का आधार डॉलर का वर्चस्व है। इसी वर्चस्व के कारण के कारण अमेरिका को मनमाने ढंग से नोट छाप कर हर तरह के खर्चों को पूरे करने की सुविधा मिली रही है। अगर डॉलर अंतरराष्ट्रीय कारोबार की सर्वोपरि मुद्रा नहीं रहा और देशों के लिए अपने भंडार में डॉलर रखने की मजबूरी नहीं रही, तो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद लगभग साढ़े सात सौ सैनिक अड्डों को चलाना अमेरिका के लिए संभव नहीं रह जाएगा। ना ही आंतरिक जरूरतों के लिए असीमित वित्त मुहैया कराना उसके लिए संभव रहेगा।

विश्व बैंक के पूर्व निदेशक और अमेरिकी अर्थशास्त्री एरिक बेथेल ने कुछ समय पहले एक पॉडकास्ट में उस स्थिति के संभावित परिणामों की चर्चा की थी। उनके मुताबिक,

“अमेरिका इतनी खरीदारियां कैसे कर रहा है? ऐसा वह डॉलर की छपाई करके करता है। दुनिया भर में डॉलर की कृत्रिम मांग इस वजह से है कि लगभग 60 फीसदी देशों के सेंट्रल बैंकों ने अपने भंडार को डॉलर से भर रखा है। वह स्थिति आई, जब कोई डॉलर का उपयोग नहीं करना चाहेगा, तो हम तबाह हो जाएंगे। तब हम मेडिकेयर का भुगतान नहीं कर सकेंगे। हम हर सौ दिन पर एक ट्रिलियन डॉलर कर्ज बढ़ा रहे हैं। साल में एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हमारी सरकार ब्याज चुकाने पर खर्च कर रही है। लोगों का डॉलर में भरोसा चूकने लगेगा, तो हमें भारी मुद्रास्फीति- बल्कि अत्यंत मुद्रास्फीति (hyper-inflation) का सामना करना होगा।”

तो सार यह है कि सोने और चांदी के भाव में अभूतपूर्व उछाल असल में विश्व अर्थव्यवस्था में युगांतकारी परिवर्तन का सूचक है। यह कोई फौरी समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे इस समय हो रहा ढांचागत बदलाव है। इस बदलाव के बाद कैसी व्यवस्था उभरेगी, अभी यह साफ नहीं है। एक समय चर्चा थी कि ब्रिक्स+ समूह अपनी करेंसी लॉन्च कर नई मौद्रिक व्यवस्था का सूत्रधार बनेगा। लेकिन बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई है। कई तकनीकी दिक्कतें और साझा इच्छाशक्ति के अभाव के कारण ब्रिक्स मुद्रा की बात अभी भी सैद्धांतिक ही है।

इस बीच चीन ने अपने तईं पहल की है। वह अपने कारोबार में अपनी मुद्रा रेनमिनबी (युवान) को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। इसी क्रम में उसने हांगकांग में गोल्ड वॉल्ट बना कर और शंघाई में गोल्ड एक्सचेंज की गतिविधियां तेज कर अपनी मुद्रा को साख प्रदान करने की कोशिश की है। हांगकांग के गोल्ड वॉल्ट में प्रावधान है कि जिन देशों ने कारोबार में युवान इकट्ठा किया है, उसके जरिए वे वहां से उस रोज के भाव पर सोना हासिल कर सकते हैं। या फिर वे सोना देकर युवान प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह आंशिक रूप से चीन ने ब्रेटन वुड्स व्यवस्था जैसा चलन कायम करने की कोशिश की है। मगर चीन की मुद्रा के बाजार के तर्क से पूर्ण हस्तांतरणीय (free transferable) ना होने तथा वहां मौजूद पूंजी नियंत्रण के कारण युवान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बन पाएगा, ऐसा ज्यादातर विशेषज्ञ नहीं मानते।

ऐसे में भविष्य की विश्व मौद्रिक व्यवस्था को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है। मगर वर्तमान डॉलर के दिन लद गए हैं, इस संबंध में अब कोई अस्पष्टता नहीं है।

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By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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