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ध्वंस के पार खड़ा सोमनाथ

आक्रमणकारियों ने धन के लोभ में मंदिर को लूटा, लेकिन वे उस श्रद्धा को नहीं लूट सके जो लोगों के हृदय में थी। सोमनाथ का पुनरुत्थान भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। सोमनाथ की यह गाथा केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं, बल्कि आर्यावर्त की उस जिजीविषा का जीवंत प्रमाण है, जिसने समय के प्रहार सहकर भी अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा।

भारत के पश्चिम तट पर प्रभास क्षेत्र में स्थित सोमनाथ केवल पत्थरों से बना मंदिर नहीं है, बल्कि यह आर्यावर्त की जिजीविषा, श्रद्धा और सांस्कृतिक निरंतरता का तेजस्वी प्रतीक है। विरासत के 75 वर्ष की यह गाथा केवल स्वतंत्र भारत के निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संकल्प की सिद्धि है जिसने हजारों वर्षों के ध्वंस और संघर्ष को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से परास्त किया। यह उस यात्रा का प्रतीक है, जहां विनाश की राख से सृजन का नया अंकुर जन्म लेता है। सोमनाथ का मूल आधार ऋग्वैदिक ऋचाओं में मिलता है।

सोम शब्द का अर्थ केवल चंद्र नहीं, बल्कि वह दिव्य रस और आनंद है, जो ब्रह्मांडीय चेतना को पुष्ट करता है। ऋग्वेद 9/1/1 के अनुसार सोम वही तत्व है जो देवत्व को जाग्रत करता है। सोमनाथ का प्राचीन नाम प्रभास है, जिसका अर्थ है प्रकृष्ट प्रकाश—वह स्थान जहां परम ज्योति प्रकट होती है। उपनिषदों के “अणोरणीयान् महतो महीयान्” सिद्धांत के अनुसार सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग उस निराकार ब्रह्म का साकार प्रतीक है, जो काल की सीमाओं से परे है। यहां सोम अर्थात उमा सहित शिव का स्वरूप शक्ति और शिव के संतुलन को दर्शाता है। स्कंद पुराण के प्रभास खंड में सोमनाथ की महिमा का विस्तार से वर्णन है।

पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति के शाप से क्षय रोग से पीड़ित चंद्रमा ने इसी सरस्वती-हिरण्या-कपिला त्रिवेणी संगम पर तप कर पुनर्जीवन पाया था। इस भूमि पर सृजन और विनाश का चक्र लगातार चलता रहा है। कथाओं के अनुसार सतयुग में सोमराज अर्थात चंद्रमा ने यहां स्वर्ण मंदिर बनवाया। त्रेतायुग में रावण ने चांदी का मंदिर बनवाया। द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन का मंदिर बनवाया। और कलियुग में भीमदेव तथा कुमारपाल ने पत्थर का मंदिर बनवाया। यह क्रम बताता है कि सोमनाथ का अस्तित्व पत्थरों पर नहीं, बल्कि लोकमानस की अटूट आस्था पर टिका है। लुटेरों ने मंदिर का शरीर तोड़ा, लेकिन उसकी आत्मा कभी नहीं तोड़ सके।

ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि 1947 में स्वतंत्रता के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रभास की पवित्र भूमि पर जो संकल्प लिया, वह आधुनिक भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का उदय था। 13 नवंबर 1947 को सरदार पटेल ने मंदिर पुनर्निर्माण की घोषणा की। महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि मंदिर का निर्माण सरकारी धन से नहीं, बल्कि जनसहयोग से होना चाहिए। “जय सोमनाथ” के उद्घोष के साथ कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारतीय विद्या भवन के माध्यम से सोमनाथ के गौरव को विश्व स्तर तक पहुंचाया।

11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा की। पिछले 75 वर्षों में सोमनाथ एक जर्जर स्मारक से उठकर जीवंत सांस्कृतिक केंद्र बन गया है। यह समय केवल पुनर्निर्माण का नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह सत्य है कि सोमनाथ का विनाशकारी इतिहास विदेशी आक्रमणकारियों की कुंठा का प्रतीक था, जबकि उसका पुनर्निर्माण भारतीय मेधा की विजय का प्रतीक बना। सोमनाथ का बाण स्तंभ इस तथ्य का प्रमाण माना जाता है कि यहां से दक्षिण ध्रुव तक समुद्र के बीच कोई भूभाग नहीं पड़ता।

यह हमारे पूर्वजों के खगोल और भूगोल ज्ञान की अद्भुत क्षमता को दर्शाता है। वास्तव में सोमनाथ राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार है। यह अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का केंद्र है। 75 वर्षों की यह यात्रा सांस्कृतिक दासता से मुक्ति का घोषणापत्र भी है। आज सोमनाथ केवल तीर्थ नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की प्रेरणा है। यह हमें सिखाता है कि जो राष्ट्र अपनी जड़ों और विरासत का सम्मान करता है, उसे समय कभी मिटा नहीं सकता। विरासत के 75 वर्ष इस बात के साक्षी हैं कि सोमनाथ फिर उस वैभव तक पहुंच चुका है जिसकी आभा पूरे विश्व को आलोकित करती है। सच तो यह है कि सोमनाथ की वैभवगाथा भारत के आत्मसम्मान के पुनर्जागरण की गाथा है।

वैदिक मत में सोम केवल वनस्पति या चंद्र का नाम नहीं, बल्कि वह ऋत अर्थात ब्रह्मांडीय सत्य का वाहक है। ऋग्वेद के नवम मंडल में सोम की स्तुति पवमान के रूप में की गई है। प्रभास क्षेत्र का उल्लेख प्राचीन सरस्वती नदी के विसर्जन स्थल के रूप में भी मिलता है। भूगर्भीय शोध बताते हैं कि सरस्वती का लुप्त मार्ग इसी क्षेत्र के पास अरब सागर में मिलता था, जिससे यह क्षेत्र वैदिक काल की प्रमुख ऊर्जा स्थली माना जाता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद के अनुसार “तमीश्वराणां परमं महेश्वरं”, अर्थात वह ईश्वरों का भी परम ईश्वर है। सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग उसी अनंत प्रकाश स्तंभ का प्रतीक है जिसका न आदि है, न अंत। यहां की दर्शन परंपरा अद्वैत पर आधारित है। सोम अर्थात मन, जब शिव अर्थात परम चेतना में विलीन होता है, तब सोमनाथ का प्राकट्य होता है। यह स्थान जीवात्मा के परमात्मा में विलय की आध्यात्मिक प्रयोगशाला माना गया है।

स्कंद पुराण और महाभारत के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इसी क्षेत्र में देह त्यागकर स्वधाम गमन किया था। भालका तीर्थ और देहोत्सर्ग की यह भूमि सोमनाथ को केवल मंदिर नहीं, बल्कि मोक्षद्वार बनाती है। मान्यता है कि जब-जब धर्म पर संकट आया, सोमनाथ ने नया रूप धारण किया। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला की मारु-गुर्जर शैली का श्रेष्ठ उदाहरण रहा है। 1947 में जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय केवल राजनीतिक विजय नहीं, सांस्कृतिक विजय का पहला चरण था।

सरदार पटेल ने प्रभास की लहरों को साक्षी मानकर जो संकल्प लिया, वह भारत की अस्मिता का शंखनाद था। सोमनाथ का पुनर्निर्माण इस सत्य की घोषणा था कि स्वतंत्र भारत अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलेगा। पिछले 75 वर्षों में सोमनाथ ट्रस्ट ने जिस पारदर्शिता से इस धरोहर को संभाला है, वह विश्व के लिए उदाहरण है।

मंदिर का दक्षिणमुखी स्वरूप और बाण स्तंभ की स्थिति यह भी दिखाती है कि भारत प्राचीन काल से समुद्र विज्ञान और खगोल विज्ञान में अग्रणी था। सोमनाथ का इतिहास विनाश और सृजन के संघर्ष का इतिहास है। आक्रमणकारियों ने इसे तोड़कर अपनी संकीर्णता दिखाई, जबकि भारत ने पुनर्निर्माण कर अपनी उदारता और सनातनता सिद्ध की। आज 75 वर्षों की यह विरासत हमें यह संदेश देती है कि सत्य को दबाया जा सकता है, पर हराया नहीं जा सकता।

वैदिक परंपरा में सोम का एक अर्थ “स-उमा” भी माना गया है, अर्थात शक्ति के साथ शिव। ऋग्वेद के नवम मंडल के पवमान सूक्त में जिस दिव्य रस का वर्णन है, सोमनाथ उसी का भू-सांस्कृतिक केंद्र है। उपनिषदों की दृष्टि से यह मंदिर छांदोग्य उपनिषद के उस सत्य को व्यक्त करता है, जहां सूर्य और सोम के मिलन से ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन बनता है। प्रभास क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहां सरस्वती का विलय और समुद्र का संगम एक विशेष चुंबकीय क्षेत्र बनाता है।

पुराणों में सोमनाथ को प्रलय के बाद का प्रथम प्रकाश कहा गया है। स्कंद पुराण के प्रभास खंड में दर्ज कथाएं बताती हैं कि यह स्थान चंद्रमा के अंधकार से मुक्ति का प्रतीक है। प्रतीक रूप में यह अज्ञान के अंत और ज्ञान के उदय की भूमि है। महाभारत के मौसल पर्व में श्रीकृष्ण का इस भूमि को चुनना यह सिद्ध करता है कि सोमनाथ केवल शैव परंपरा का केंद्र नहीं, बल्कि संपूर्ण सनातन चेतना का केंद्र रहा है। यही कारण है कि 1947 में स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ का पुनरुद्धार आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे साहसी घटनाओं में माना गया। यह 75 वर्ष केवल पत्थरों के जुड़ने की कहानी नहीं, बल्कि टूटे हुए राष्ट्रीय आत्मविश्वास को फिर से जोड़ने की यात्रा है।

सरदार पटेल ने स्पष्ट कहा था कि सोमनाथ का निर्माण सरकारी काम नहीं, बल्कि लोक संकल्प होना चाहिए। के.एम. मुंशी ने सोमनाथ को भारतीय संस्कृति का अक्षय पात्र कहा। उनके संपादन में सोमनाथ का इतिहास शोधपूर्ण ग्रंथ के रूप में सामने आया। मंदिर का बाण स्तंभ आज भी भूगोलवेत्ताओं के लिए आश्चर्य का विषय है, जो बिना किसी भू-अवरोध के सीधे दक्षिण ध्रुव की ओर संकेत करता है। सोमनाथ का इतिहास सात बार टूटकर फिर उठ खड़े होने का इतिहास है। यह राख से पुनर्जन्म लेने वाली सभ्यता का प्रतीक है। आक्रमणकारियों ने धन के लोभ में मंदिर को लूटा, लेकिन वे उस श्रद्धा को नहीं लूट सके जो लोगों के हृदय में थी। आज 75 वर्षों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि भौतिक ढांचा नष्ट किया जा सकता है, लेकिन शाश्वत सत्य को मिटाया नहीं जा सकता।

सोमनाथ का पुनरुत्थान भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। आज यह मंदिर केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि अनुसंधान, पुरातत्व और स्थापत्य का ऐसा वैश्विक विश्वविद्यालय है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान समझाता रहेगा। सोमनाथ की यह गाथा केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं, बल्कि आर्यावर्त की उस जिजीविषा का जीवंत प्रमाण है, जिसने समय के प्रहार सहकर भी अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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