शपथ ग्रहण के एक हफ्ते के अंदर सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो फैसले किए हैं अगर उनको थोड़ी बारीकी से देखें तो उसमें एक तारतम्य नजर आएगा। ऐसा नहीं लगेगा कि फैसले रैंडम हो रहे हैं। वे चूंकि खुद लंबे समय तक सरकार में भी रहे हैं और सरकार के कामकाज को करीब से देखा है तो उनको पता है कि किसी भी नेता या सरकार की मंशा कितनी भी अच्छी हो, उस पर प्रभावी अमल तब तक नहीं हो पाता है, जब तक अधिकारियों और कर्मचारियों यानी नौकरशाही का पूरा समर्थन नहीं मिले।
सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद आगाज बहुत शानदार किया है। कह सकते हैं कि मतदान समाप्त होने के दिन यानी 29 अप्रैल को ही उन्होंने इसका संकेत दे दिया था। मतदान समाप्त होने के बाद लौटते समय वे सड़क के किनारे बने तृणमूल कांग्रेस के एक छोटे से कार्यालय में गए और अपनी धुर विरोधी पार्टी के कार्यकर्ताओं से भी बड़ी आत्मीयता से मिले। उसके बाद जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्ट्रॉन्गरूम में जाकर भड़काऊ बातें कहीं तो उसके बाद भी सुवेंदु अधिकारी ने वहां जाकर जो बातें कहीं उससे उनकी परिपक्वता झलकी। उन्होंने वहां मौजूद सभी पार्टियों के कार्यकर्ताओं से कहा कि नेता को जेड श्रेणी की सुरक्षा मिली होती है, उसको कुछ नहीं होता है, इसलिए कार्यकर्ताओं को भी आपस में दुश्मनी नहीं करनी चाहिए।
पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में जहां नेता अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को शत्रु मानते रहे हैं वहां सुवेंदु अधिकारी हवा के ताजा झोंके की तरह आए हैं। उन्होंने पहले दिन से यह संकेत दिया कि राजनीतिक निष्ठा के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव या पक्षपात नहीं होगा और बदले की भावना से कोई कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन साथ ही यह संदेश भी दिया कि किसी भी दोषी को छोड़ा भी नहीं जाएगा। तभी विधानसभा के पहले सत्र में कई मुस्लिम विधायकों ने भी उनसे मुलाकात की और सहयोग का वादा किया। सरकार को ऐसा ही समावेशी होना भी चाहिए। उन्होंने पद की शपथ लेते हुए जो बातें कही है उसका अक्षरशः पालन करते दिख रहे हैं। राग द्वेष के साथ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
पहले दिन से जो कदम उठाए जा रहे हैं वह लोगों को आश्वस्त करने वाले हैं। सरकार और सिस्टम में लोगों का भरोसा लौटाने वाले हैं। लोग राहत की सांस ले रहे हैं। उनको लग रहा है कि वे सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की ओर से बनाई गई किसी समानांतर सत्ता की ज्यादतियों का शिकार नहीं होंगे। उनके साथ कानून के हिसाब से बरताव किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने अपने कामकाज और व्यवहार दोनों से यह प्रदर्शित किया है कि पार्टी और उसकी विचारधारा उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण है। उनको पता है कि भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल में कितना संघर्ष किया है और तमाम जुल्मों के बावजूद अपनी विचारधारा पर टिके रहे हैं। इसलिए मुख्यमंत्री भी अपने निर्णयों में पार्टी की प्राथमिकता का अनिवार्य रूप से ध्यान रख रहे हैं।
ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में लंबे समय के शासन में वामपंथी पार्टियों ने दो काम बहुत व्यवस्थित तरीके से किया था। तुष्टिकरण की नीति के जरिए एक बड़ा अल्पसंख्यक वोट बैंक तैयार किया था और दूसरा, जीतने लायक वोट हासिल करने के लिए शासन की एक समानांतर व्यवस्था बना रखी थी। इसके तहत पाड़ा क्लब चलते थे, मस्तान लोग काम करते थे, कटमनी वसूला जाता था, अवैध टोल चलते थे, जिनसे हर दिन करोड़ों रुपए एक सामानांतर अर्थव्यवस्था में जाते थे। ऐसे हित समूह से जुड़े लोग पार्टी के लिए काम करते थे। 2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं तो उन्होंने वामपंथी पार्टियों की बनाई इस व्यवस्था को हूबहू अपना लिया। उसी के दम पर वे आराम से चुनाव जीतती रहीं।
अब सत्ता में आने पर सुवेंदु अधिकारी के सामने दो रास्ते थे। एक रास्ता तो यह था कि वामपंथी पार्टियों की बनाई व्यवस्था को जैसे ममता बनर्जी ने अपनाया था वैसे ही वे भी अपना लें या दूसरा रास्ता था कि इसके बरक्स अपनी एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाएं, जो कानूनसम्मत हो। सुवेंदु अधिकारी ने दूसरा रास्ता चुना है। वे कानूनसम्मत व्यवस्था को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसा इसलिए भी हो पाया क्योंकि राजनीति और चुनाव में भी भाजपा ने वैकल्पिक रास्ता चुना। उसने तुष्टिकरण की तृणमूल कांग्रेस की राजनीति को अपनी समावेशी राजनीति से हराया। इसलिए पहले से चली आ रही व्यवस्था को चलाए रखना उसका मकसद हो ही नहीं सकता था।
शपथ ग्रहण के एक हफ्ते के अंदर सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो फैसले किए हैं अगर उनको थोड़ी बारीकी से देखें तो उसमें एक तारतम्य नजर आएगा। ऐसा नहीं लगेगा कि फैसले रैंडम हो रहे हैं। वे चूंकि खुद लंबे समय तक सरकार में भी रहे हैं और सरकार के कामकाज को करीब से देखा है तो उनको पता है कि किसी भी नेता या सरकार की मंशा कितनी भी अच्छी हो, उस पर प्रभावी अमल तब तक नहीं हो पाता है, जब तक अधिकारियों और कर्मचारियों यानी नौकरशाही का पूरा समर्थन नहीं मिले। पश्चिम बंगाल में तो स्थिति और भी विकट है क्योंकि वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के 50 साल के शासन में पुलिस और प्रशासन दोनों को पार्टी के कैडर में बदल दिया गया है। तभी सुवेंदु अधिकारी के दो फैसले सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को एक संदेश देने वाले हैं।
उन्होंने आरजी कर बलात्कार और हत्या की जांच से किसी न किसी तरह से जुड़े रहे तीन आईपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। यह समूचे पुलिस प्रशासन के लिए बड़ा संदेश है। उनको यह बता दिया गया है कि अब वैसा नहीं चलेगा, जैसा पहले चलता था। दूसरा फैसला बड़ी संख्या में ऐसे अधिकारियों को हटाने का है, जो सेवा पूरी करने के बाद यानी रिटायर होने के बाद किसी न किसी रूप में सलाहकार इत्यादि बन कर काम कर रहे थे। इनमें रिटायर आईएएस, आईपीएस सहित अलग अलग स्तर के अधिकारी, कर्मचारी शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि इसमें योग्य लोग नहीं होंगे। लेकिन ज्यादातर ऐसे लोग थे, जो पार्टी का एजेंडा पूरा करने के लिए काम करते थे। उनको हटा कर भी सुवेंदु अधिकारी ने नौकरशाही को संदेश दिया है कि उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता संविधान और शासन के प्रति और जनता के लिए होनी चाहिए। कानून व्यवस्था की बहाली और आम नागरिकों के रोजमर्रा के कामकाज के सुचारू संचालन के लिए इस तरह का संदेश जरूरी था।
इसके साथ ही नई सरकार ने अपने वादों पर भी अमल की शुरुआत कर दी है। चुनाव के समय वादा किया गया था कि सरकार बनी तो पहली कैबिनेट में सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ को जमीन देने का फैसला होगा ताकि बांग्लादेश की सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा हो। वह काम सरकार ने पहली कैबिनेट में किया और 45 दिन के अंदर जमीन देने की प्रक्रिया पूरी करने का फैसला किया। घुसपैठ और सीमा पार से होने वाली तमाम किस्म की तस्करी को रोकने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण कदम है। इसके बाद सरकार घुसपैठियों की पहचान करने और उनको निकालने का काम करेगी। वैसे यह कदम उठा लिया गया है कि जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं उनमें तार्किक विसंगति वालों को छोड़ कर बाकियों को मिलने वाली सुविधाएं बंद कर दी गई हैं। इसी तरह चुनाव के समय वादा किया गया था कि केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना बंगाल में भी लागू होगी ताकि लोगों को मुफ्त चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध हो सके। वह फैसला भी सरकार ने कर दिया है।
पश्चिम बंगाल लंबे समय से आर्थिक व औद्योगिक विकास की गतिविधियों से वंचित रहा है। इसके कारण थे। एक कारण तो तत्कालीन सरकारों की मानसिकता थी, जिसमें उनको लगता था कि विकास की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ वोट बैंक की राजनीति से चुनाव जीता जा सकता है। दूसरा कारण यह था कि करीब 50 साल से पश्चिम बंगाल में ऐसी सरकार बनती रही थी, जो केंद्र सरकार की विरोधी होती थी। दोनों के बीच सद्भाव की जगह टकराव चलता रहता था। इस बार दोनों चीजें बदल गई हैं। अब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री दोनों ऐसे हैं, जो वोट बैंक या तुष्टिकरण की बजाय विकास कार्यों के प्रति समर्पित हैं। इसका प्रभाव पहले ही सप्ताह से दिखने लगा है। डबल इंजन की सरकार का सबसे पहला असर यह दिखा कि रेलवे की तीन परियोजनाओं को मंजूरी मिल गई। इसके साथ ही मेट्रो और बंदरगाहों के निर्माण का कार्य भी शुरू हो गया। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की प्रतिबद्धता है कि वे राज्य में विकास के कार्यों की गति तेज करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएंगे। वे लालफीताशाही की अड़ंगेबाजी को दूर करेंगे ताकि कारोबार सुगमता और निवेश की सुनिश्चित की जा सके। पश्चिम बंगाल को एक बार फिर निवेश और औद्योगिक गतिविधियों के लिए सबसे आकर्षक गंतव्य बनाने का लक्ष्य मुख्यमंत्री ने तय किया है और जिस तरह से काम शुरू किया है उससे लगता है कि उनको सफलता मिलेगी।
अगर विचारधारा पर आधारित या जनभावना को ध्यान में रख कर किए जाने वाले निर्णयों या कार्रवाइयों की बात करें तो उसमें भी सरकार ने ठोस पहल की है। विकास के साथ साथ विचारधारा पर टिके रहना भी भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत जरूरी है। इसको ध्यान में रख कर भी कार्रवाई शुरू हो गई है। सरकार ने सड़कों पर नमाज पढ़ना बंद करा दिया है। इसे लेकर थोड़ा तनाव भी हुआ लेकिन यह एक जरूरी पहल है। ऐसे ही मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर उतारने या आवाज कम करने की कार्रवाई भी कई जगह हुई है।
तुष्टिकरण की नीति के तहत पिछली सरकारों ने जो व्यवस्था बनाई थी उसे बदलना आसान काम नहीं होगा लेकिन सरकार ने इसे शुरू किया है तो इसका स्वागत होना चाहिए। इसके साथ ही आम लोगों के मन से भय की धारणा समाप्त करने के लिए जो जरूरी कदम हैं वो उठाए जा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना इसका संकेत है। सरकार ने बताया है कि कोई कितना भी शक्तिशाली हो उसके खिलाफ कानून समान रूप से काम करेगा। ध्यान रहे अभिषेक ने चुनाव के दौरान देश के गृह मंत्री अमित शाह को धमकी दी थी और साथ ही मतदाताओं को भी धमकाया था। अब उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई करेगी। इससे लोगों का व्यवस्था के प्रति भरोसा लौटेगा और राजनीतिक गतिविधियों में सामान्य लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


