सर्वोच्च न्यायालय में 13 अप्रैल को सुनवाई होनी है, जहां इन मतदाताओं के वैधानिक अधिकार पर भी निश्चित रूप से चर्चा होगी। अगर इनको मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है तो इससे बहुत खराब मिसाल बनेगी। इसे मिसाल बना कर भविष्य में लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा सकेगा और उनके नागरिक अधिकारों में भी कटौती होनी शुरू हो सकती है।
यह बड़ा सवाल है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है कि पश्चिम बंगाल में जो 27 लाख लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो गए हैं उनका क्या होगा? यह लगभग तय हो गया है कि अगर समय पर चुनाव होता है यानी 23 और 29 अप्रैल को दो चरण में पश्चिम बंगाल की 294 सीटों के लिए वोटिंग होती है, जिसकी संभावना दिख रही है तो 27 लाख लोग वोट नहीं डाल पाएंगे। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान किया था। लेकिन इस बार मतदान नहीं कर पाएंगे। इसका कारण यह है कि समय रहते उनके दस्तावेजों की अंतिम जांच नहीं हो पाई है। सवाल है कि क्या ऐसे तकनीकी आधार पर या प्रशासनिक विफलता की वजह से या समय कम होने से या समय पर चुनाव कराने की मजबूरी में लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है? किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए यह गहरी चिंता पैदा करने वाला सवाल है।
पश्चिम बंगाल के मामले में सबसे हैरानी की बात यह है कि दूसरे किसी भी राज्य के मुकाबले वहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के काम को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास हुए। इसके बावजूद सबसे ज्यादा समस्या बंगाल में आई। जिन राज्यों में सबसे ज्यादा नाम कटे वहां भी ऐसी समस्या नहीं आई। जान कर हैरानी होगी कि सबसे ज्यादा नाम गुजरात में कटे और उसके बाद उत्तर प्रदेश में। पश्चिम बंगाल में एसआईआर से पहले वाली मतदाता सूची में से 11 फीसदी से कुछ ज्यादा नाम कटे हैं, जबकि गुजरात और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों में 13 फीसदी से ज्यादा नाम कटे। उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची गुरुवार, 10 अप्रैल को जारी हुई, जिसके मुताबिक दो करोड़ चार लाख नाम कट गए हैं।
अब यही पर उत्तर प्रदेश या किसी और राज्य के बरक्स पश्चिम बंगाल के फर्क को देखने की जरुरत है। उत्तर प्रदेश में पहली मसौदा सूची आई तो दो करोड़ 89 लाख नाम कटे थे, जबकि अंतिम सूची में दो करोड़ चार लाख नाम कटे। इसका अर्थ है कि मसौदा सूची में जो नाम कटे थे उनमें से 85 लाख के करीब नाम जुड़ गए। लगभग सभी राज्यों में ऐसा हुआ कि अंतिम सूची में मसौदा सूची से ज्यादा नाम शामिल हुए। पश्चिम बंगाल का मामला अपवाद है। वहां मसौदा सूची में 58 लाख नाम कटे और अंतिम सूची में 90 लाख नाम कटे। यानी मसौदा सूची में जिनके नाम थे उनमें से भी 32 लाख लोगों के नाम कट गए। इनमें से 27 लाख नाम ऐसे हैं, जिनको तार्किक विसंगति के आधार पर मतदाता सूची से बाहर रखा गया।
ऐसा तब हुआ, जब उत्तर प्रदेश या किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले पश्चिम बंगाल में ज्यादा प्रयास किए गए। किसी दूसरे राज्य में सर्वोच्च न्यायालय को दखल देने की जरुरत नहीं पड़ी। पश्चिम बंगाल में मसौदा मतदाता सूची आने के बाद से ही कदम कदम पर सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। जब मसौदा सूची के बाद सवा करोड़ लोगों को तार्किक विसंगति के आधार पर नोटिस दिया गया तब भी सवाल उठा और जब 60 लाख लोगों को विवेचनाधीन श्रेणी में रखा गया तब भी सवाल उठा। तब सर्वोच्च न्यायालय में विवेचनाधीन श्रेणी के मतदाताओं के दस्तावेजों के जांच के लिए अभूतपूर्व कदम उठाया। न्यायालय ने बंगाल के साथ साथ ओडिशा, झारखंड के न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के आदेश दिए। यह संभवतः पहला मौका था, जब न्यायिक अधिकारियों को प्रशासनिक कामकाज में लगाया गया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 19 ट्रिब्यूनल यानी न्यायाधिकरणों का गठन किया ताकि न्यायिक अधिकारियों की जांच के बाद जिन लोगों के नाम कटें उन्हें सुनवाई का एक मौका और दिया जा सके।
दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय का इतना गंभीर प्रयास भी प्रशासनिक स्तर पर असहयोग या राजनीतिक कारणों से सफल नहीं होने दिया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बने न्यायाधिकरण समय रहते कामकाज ही शुरू नहीं कर सके। तभी तार्किक विसंगति के आधार पर जिन 27 लाख लोगों के नाम कटे उन्हें अपने दस्तावेज जमा कराने और उनकी जांच कराने का मौका ही नहीं मिला, तब तक चुनाव आ गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक तार्किक विसंगति के आधार पर जिन लोगों के नाम कटे उनमें से दो लोग एक न्यायाधिकरण के पास पहुंचे और दोनों के दस्तावेज देखने के बाद न्यायाधिकरण के माननीय जज ने उनके नाम मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया। इसी तरह कांग्रेस पार्टी के दो उम्मीदवारों के नाम मतदाता सूची से कट गए थे। वे दोनों लोग सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे और न्यायालय ने उनके दस्तावेजों की जांच के बाद उनके नाम मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश दिया।
इसका अर्थ है कि जिन 27 लाख लोगों के नाम कटे हैं और जिनको समय की कमी के कारण मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है उनमें लाखों लोग ऐसे हो सकते हैं, जिनके दस्तावेज सही हों और वे पात्र मतदाता हों। परंतु राज्य सरकार की ओर से एसआईआर को लेकर पहले दिन से विरोध का जो रुख अख्तियार किया गया और चुनाव आयोग के साथ टकराव का जो रास्ता चुना गया उसका नतीजा है कि इतने लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो गए हैं। अगर राज्य सरकार की मंशा ठीक होती तो जैसे ही सर्वोच्च न्यायालय ने सात सौ न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करने का आदेश दिया वैसे ही उनके कामकाज की जगह से लेकर दूसरी बुनियादी सुविधाएं जुटाई जातीं। अगर ऐसा होता तो उनके कामकाज में इतना समय नहीं लगता। इसी तरह राज्य सरकार ने अगर न्यायाधिकरण के माननीय जजों के लिए कार्यालय, कर्मचारी और दूसरी बुनियादी सुविधाएं पहले उपलब्ध करा देती तो उनका कामकाज भी पहले शुरू हो सकता है और तब संभव है कि ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाते। परंतु राज्य सरकार ने पहले दिन से असहयोग का रुख अपनाया हुआ है, जिसकी वजह से स्थिति ऐसी बन गई है।
ध्यान रहे राज्य में स्थिति बहुत तनावपूर्ण है। भले सतह पर तनाव उतना ज्यादा नहीं दिख रहा है लेकिन सतह के अंदर लोगों में गुस्सा है। अगर कोई व्यक्ति राजनीतिक लाभ के लिए चिंगारी लगा दे तो बड़ी आग भड़क सकती है। सतह के भीतर उबल रहे गुस्से को ही मालदा में एक बड़े विवाद में बदल दिया गया था। वहां असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के एक नेता और तृणमूल कांग्रेस की एक महिला नेता के भड़काऊ भाषण के बाद ऐसे हालात बन गए थे, जिसमें भीड़ ने सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। कई घंटे तक वे लोग बंधक रहे, जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं। देश के चीफ जस्टिस को देर रात इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा तब जाकर पुलिस सक्रिय हुई और न्यायिक अधिकारियों को वहां से निकाला गया। उस समय भी उनकी गाड़ी पर पथराव हुए और तोड़फोड़ की गई। इस तरह की घटनाएं कहीं भी हो सकती हैं। राजनीतिक फायदे के लिए कोई भी लोगों को भड़का सकता है।
यह ध्यान रखने की बात है कि राजनीतिक उद्देश्य से एसआईआर की प्रक्रिया का पहले दिन से विरोध किया गया। यह धारणा बनवाई गई कि चुनाव आयोग भाजपा की मदद कर रहा है। यह अफवाह फैलाई गई कि एक खास समुदाय के लोगों के नाम ज्यादा कट रहे हैं। चुनाव आयोग की ओर से जारी अंतिम मतदाता सूची से ये सारे अफवाह गलत साबित हुए हैँ। अंतिम मतदाता सूची में जो 90 लाख नाम कटे हैं उनमें 64 फीसदी के करीब हिंदू मतदाताओं के नाम कटे हैं और करीब 34 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के नाम कटे हैं। भारतीय जनता पार्टी के समर्थक माने जाने वाले मतुआ, जो नामशूद्र समुदाय से आते हैं और सबसे बड़े दलित जातीय समूह राजबंशी के नाम भी काफी संख्या में कटे हैं।
इसका अर्थ है कि जमीनी स्तर पर चुनाव आयोग ने जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया। परंतु सत्तारूढ़ दल ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए एक नैरेटिव बनाया, जिसको अभी तक जारी रखा गया है। इस नैरेटिव को स्थापित करने के लिए ही चुनाव आयोग से असहयोग की नीति अपनाई गई। इसका अंत नतीजा यह हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग दोनों के ईमानदार प्रयास के बावजूद 27 लाख लोग मतदान के अधिकार से वंचित होते दिख रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में 13 अप्रैल को सुनवाई होनी है, जहां इन मतदाताओं के वैधानिक अधिकार पर भी निश्चित रूप से चर्चा होगी। अगर इनको मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है तो इससे बहुत खराब मिसाल बनेगी। इसे मिसाल बना कर भविष्य में लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा सकेगा और उनके नागरिक अधिकारों में भी कटौती होनी शुरू हो सकती है। यह एक बड़ी चिंता है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को विचार करना है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


