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सोशल मीडिया का राक्षस भारी पड़ेगा

भारत सरकार साजिश के नैरेटिव को जिस नेटवर्क से फैला रही है उसी नेटवर्क से वह कथित साजिश भी फैल रही है। अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी या वोट चोरी का नैरेटिव फैल रहा है तो वह पारंपरिक मीडिया या टेलीविजन और अखबारों से तो फैल नहीं रहा है। वह तो सोशल मीडिया के जरिए ही फैल रहा है। सोशल मीडिया के जरिए ही ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह बात पहुंची है कि उनका वोट चोरी हो रहा है। यह बात भी लोगों तक पहुंची है कि अगर वोट चोरी हो गया यानी मतदाता सूची से नाम कट गया या संदिग्ध मतदाता बना दिया गया तो फिर सामाजिक सुरक्षा की सारी योजनाओं से भी नाम कट जाएगा।

याद करें कैसे लोकसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभाओं में कहना शुरू किया कि इंडी गठबंधन वाले आएंगे तो आपका मंगलसूत्र छीन लेंगे, आपकी भैंस खोल कर ले जाएंगे और इसके जवाब में ‘इंडिया’ ब्लॉक ने कहा कि मोदी को चार सौ सीटें आ गईं तो संविधान बदल जाएगा और आरक्षण छीन लिया जाएगा। मोदी का मंगलसूत्र वाला नैरेटिव मीडिया ने चलाया और आरक्षण छीनने वाली बात सोशल मीडिया में चली और अंत नतीजा सबको पता है कि भाजपा 303 से 240 पर आ गई।

असल में भाजपा ने ही सोशल मीडिया का मॉनस्टर या भस्मासुर खड़ा किया है। उसको राजनीतिक विमर्श का टूल बनाया या बन जाने दिया। सत्ता में आने के बाद जिस तरह से मुख्यधारा के मीडिया को यानी पारंपरिक मीडिया को कंट्रोल किया गया, मीडिया मालिकों की दुकान जमाई गई, टेलीविजन के जाने माने चेहरों को भक्त बनाया गया उसके बाद लोगों के पास विकल्प के तौर पर सोशल मीडिया ही बचा। मीडिया में जैसे दो चार बड़े कॉरपोरेट घरानों का एकाधिकार बना है वह देखने लायक है। बहरहाल, सोशल मीडिया में भी पहले मोदी और भाजपा का ही विस्तार ज्यादा था। लेकिन वह चूंकि डेमोक्रेटिक स्पेस है इसलिए वहां तुरंत ही विपक्षी पार्टियों और उसके इकोसिस्टम ने भी अपने लिए जगह बना ली। तभी आईटी एक्ट के जरिए उसको नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है या पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया, जिस पर सरकार खुशी खुशी सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का दिशा निर्देश बनाने को तैयार हो गई है।

इसके बावजूद सोशल मीडिया सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द है। राहुल गांधी का वोट चोरी का नैरेटिव सोशल मीडिया  से इतना फैला कि देश के सारे चुनाव अब संदिग्ध हो गए हैं। चुनाव आयोग के आचरण से भी लोगों का संदेह बढ़ा है। इसी तरह क्रोनी कैपिटलिज्म का नैरेटिव भी लोगों तक पहुंचा हैं तो भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों में वंशवाद  होने की धारणा भी स्थापित हुई है। भाजपा और संघ के लोग कैसे ऐशो आराम का जीवन जी रहे हैं और उनका सुरक्षा काफिला कितना बड़ा है इसके वीडियो भी खूब शेय़र हो रहे हैं। उनके बच्चों के विदेशों में पढ़ने और आम हिंदू के बच्चों से भड़काऊ नारे लगवाने की बातें भी लोगों के दिमाग में बैठी हैं। धीरे धीरे ही सही ये बातें लोगों तक पहुंचने लगी हैं। जिन बातों की वजह से लोग अपनी मुश्किलों को भूले हुए थे उन बातों से भी मोहभंग होने लगा है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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