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पश्चिम एशिया शांत नहीं हुआ तो क्या होगा

भारत का मुश्किल समय गंभीर होता हुआ है। खास कर आर्थिक मोर्चे पर भारत की स्थिति बिगड़ने वाली है। महंगाई बेकाबू होगी, शेयर बाजार में बनाई गई कृत्रिम तेजी ठंडी पड़ेगी, रुपया और गिरेगा, जिससे भारत का मुद्रा बाजार तेजी से खाली होगा। इसका बड़ा असर यह संभव है कि महंगाई बढ़ेगी और महंगाई बढ़ेगी तो अनिवार्य रूप से रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी होगी, जिससे विकास दर कम होगी। अभी ही अर्थव्यवस्था की हालत देखते हुए संस्थागत विदेशी निवेशक यानी एफआईआई और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफपीआई अपना पैसा शेयर बाजार से निकाल कर रहे हैं। यह ताजा खबर है कि ताइवान के शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार मूल्य से ज्यादा हो गया है।

अगर अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी युद्धविराम नहीं होता है और होर्मुज की खाड़ी से पहले की तरह कच्चे तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति नहीं शुरू होती है तो भारत के लिए बहुत मुश्किल होगी। यह कहना आसान है कि भारत अपनी ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए खरीद में विविधता ला रहा है। लेकिन वह विविधता सस्ती नहीं पड़ने वाली है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका या अमेरिका और वेनेजुएला से तेल की खरीद भारत को महंगी पड़ेगी। पश्चिम एशिया में स्थायी युद्धविराम होने और होर्मुज की खाड़ी खुलने के बाद भी आपूर्ति सामान्य होने में समय लगेगा।

इस बात का अंदाजा प्रधानमंत्री मोदी को है और उनकी नीतियों के समर्थक आर्थिक जानकारों को भी है। तभी सुरजीत भल्ला जैसे अर्थशास्त्री ने लिखा कि भाजपा चुनाव तो जीत रही है लेकिन देश की अर्थव्यवस्था बरबाद हो रही है। उन्होंने लिखा कि देश की अर्थव्यवस्था लगातार गिरती जा रही है। अब तो आर्थिक जानकार बुनियादी ढांचे में संरचनागत खामी बताने लगे हैं। वित्त आयोग के अध्यक्ष बनाए गए अरविंद पनगढ़िया और विश्व बैंक की गीता गोपीनाथ सलाह दे रहे हैं कि रुपए की साख बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर निकाल कर बाजार में बेचना अच्छी रणनीति नहीं है। दूसरी ओर संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के अश्विनी महाजन जैसे लोग हैं, जिनका कहना है कि किसी हाल में डॉलर की कीमत सौ रुपए से ऊपर नहीं जानी चाहिए। मुद्रा की कीमत में देश का सम्मान तलाशा जा रहा है। ऐसा भी इसलिए है क्योंकि नरेंद्र मोदी और भाजपा के दूसरे नेताओं ने मनमोहन सिंह के समय कहा था कि भारत की मुद्रा यानी रुपए की कीमत गिर रही है तो इससे देश का सम्मान घट रहा है।

बहरहाल, डॉलर महंगा होने और तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से सम्मान पर जो असर पड़ रहा है, कीमतों पर बहुत भारी पडेगा। पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर केमिकल और फर्टिलाइजर की कीमतें बढ़ रही हैं। ऊपर से इस साल सुपर अल नीनो की आशंका है, जिसके असर से अनाज की पैदावार कम होगी। इन सबका मिला जुला असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर बहुत बड़ा होने वाला है। इमरजेंसी की कोई तैयारी नहीं है। ले दे कर इतना ही सोच सकते है कि एक दिन घोषणा सुनाई देगी कि जैसे कोरोना के समय 20 लाख करोड़ रुपए का कर्ज देने का पैकेज दिया वैसा ही लोगों को कोई कर्ज देने का यह पैकेज!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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