राज्यसभा की चिंता में केंद्र सरकार

सरकार और भाजपा दोनों ने राज्यसभा को गंभीरता से लेने की जरूरत दिखाई। लोकसभा में वैसे भी विपक्ष के पास ज्यादा सांसद नहीं हैं और विपक्ष की पार्टियों के बीच तालमेल भी नहीं है। इसके मुकाबले राज्यसभा में बेहतर तालमेल है।

कोरोना काल में संसद

corona crisis parliament session : कोरोना वायरस की महामारी शुरू होने के बाद संसद चौथा सत्र शुरू होने वाला है। पिछले साल बजट सत्र के समय महामारी शुरू हुई थी और उसकी वजह से सत्र को समय से पहले खत्म कर दिया गया। उसके बाद जैसे तैसे पिछले साल मॉनसून सत्र का आयोजन हुआ और शीतकालीन सत्र टाल दिया गया। इस साल बजट सत्र का आयोजन हुआ लेकिन वह सत्र बहुत छोटा रहा। उसे भी केसेज बढ़ने की वजह से बीच में ही रोक दिया गया। अब फिर मॉनसून सत्र होने जा रहा है लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि यह सत्र भी सामान्य रूप से चल पाएगा। क्योंकि इसका आयोजन भी कोरोना काल के ऐसे प्रोटोकॉल के तहत हो रहा है, जिससे संसदीय कार्यवाही न तो पूरी तरह से वर्चुअल बन पाती है और न पूरी तरह से ऑफलाइन हो पाती है। यह भी पढ़ें: कृषि कानून क्यों नहीं बदल रही सरकार? सबसे हैरान करने वाली बात है कि देश में 16 जनवरी से टीकाकरण का अभियान चल रहा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 60 साल से ऊपर के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू होने के बाद एक मार्च को टीके की पहली डोज लगवा ली… Continue reading कोरोना काल में संसद

कितने मुद्दे हैं पर विपक्ष!

Opposition attacks in parliament  : इस समय देश में आम लोगों से जुड़े इतने मुद्दे हैं कि अगर संसद में विपक्ष उन मुद्दों को गंभीरता से उठाए तो सरकार बैकफुट पर जा सकती है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। खाने-पीने की चीजों की महंगाई रिकार्ड स्तर पर है। लगातार दो महीने खुदरा महंगाई की दर छह फीसदी से ऊपर रही है। बेरोजगारी रिकार्ड स्तर पर है। किसान आंदोलन चल रहा है और सरकार उसे खत्म कराने के लिए कुछ नहीं कर रही है। उधर सीमा पर चीन लगातार अपने को मजबूत कर रहा है। उसने भारत की कब्जाई जमीन खाली नहीं की है। पैंगोंग झील से पीछे हटने के बाद वह बाकी इलाकों में डट कर बैठा है, जिसकी वजह से सरकार को सेना की तैनाती बढ़ानी पड़ी है। अफगानिस्तान के हालात से भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हुआ है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर खत्म नहीं हो रही है और देश में वैक्सीनेशन की रफ्तार एक बार फिर धीमी हो गई है। विपक्ष की ओर से ये मुद्दे उठाए भी जाएंगे, जैसे हर बार उठाए जाते हैं लेकिन वह संसदीय कार्यवाही की एक औपचारिकता जैसी होती है। यह भी… Continue reading कितने मुद्दे हैं पर विपक्ष!

चुनाव प्रचार ज्यादा अहम या संसद?

देश की संसद ज्यादा अहम है या राज्यों के विधानसभा चुनाव का प्रचार? संसदीय राजनीति और उस पर आधारित शासन प्रणाली में भरोसा करने वाले किसी भी समझदार व्यक्ति का जवाब यही होगा कि संसद ज्यादा अहम है, संसदीय कामकाज ज्यादा अहम हैं।

होली से पहले खत्म हो जाएगा सत्र!

दूसरा चरण आठ अप्रैल तक चलना है लेकिन कहा जा रहा है कि सत्र उससे काफी पहले खत्म किया जा सकता है। ऐसा पांच राज्यों में चल रहे चुनाव की वजह से किए जाने की खबर है।

एनडीए के सहयोगी अब हैं कहां?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को एनडीए की सहयोगी पार्टियों की बैठक बुलाई थी। संसद के हर सत्र में यह एक औपचारिकता होती है कि सरकार सर्वदलीय बैठक बुलाती है

भाजपा को परोक्ष सहयोगियों का भरोसा

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए में अब ज्यादा घटक दल नहीं बचे हैं। ज्यादातर बड़ी पार्टियां एनडीए से अलग हो गई हैं। लेकिन भाजपा के पास अभी कम से कम चार परोक्ष सहयोगी हैं, जो एनडीए का हिस्सा नहीं हैं पर समय आने पर भाजपा की सरकार की मदद करते हैं।

किसान आंदोलन का दायरा बढ़ा

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन का दायरा बढ़ता जा रहा है। राजस्थान के कई इलाकों से लेकर पंजाब के अंदर और हरियाणा के कुछ इलाकों में भी किसानों का आंदोलन तेज हो गया है।

नई चिट्ठी, दोहराई बाते!

देश के कई राज्यों के किसान दिल्ली की कड़ाके की ठंड में दिल्ली की सीमा पर 29 दिन से प्रदर्शन कर रहे हैं और केंद्र सरकार उनकी मांगें सुनने की बजाय उनको चिट्ठी लिख रही है।

ठोस प्रस्ताव के बगैर वार्ता नहीं

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों ने सरकार पर टालमटोल का रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए अपना रुख सख्त कर लिया है।

बदलाव नहीं कानूनों की वापसी हो

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध में 27 दिन से दिल्ली की सीमा पर और देश के कई हिस्सों में आंदोलन कर रहे किसान सरकार से वार्ता के बारे में बुधवार को फैसला करेंगे।

खुद्दार किसान और अय्यार सरकार!

एक तरफ अपने खून-पसीने से धरती का सीना चीर कर अनाज उपजाने वाले खुद्दार और मेहनतकश किसान हैं तो दूसरी ओर बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चंद्रकांता संतति’ के अय्यारों की तरह की सरकार है।

किसानों की भूख हड़ताल शुरू

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों ने क्रमिक भूख हड़ताल शुरू कर दी है। दिल्ली की सीमा पर जहां-जहां किसान आंदोलन कर रहे हैं वहां 11-11 किसानों की टीम भूख हड़ताल पर बैठी।

मानों ‘ब्रेन डेड’ अवस्था और जीवन!

इस पृथ्वी पर भारत वह दास्तां है, जहां लोग लूट, गुलामी में होते हुए भी उसकी सुध में जीते हुए नहीं हैं। वजह गुलामी-लूट के चौदह सौ साल के झटकों से बनी ब्रेन डेड याकि मृत मष्तिष्क अवस्था है।

ये सुप्रीम कोर्ट का काम है?

सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन खत्म कराने की पहल करते हुए मध्यस्थ की भूमिका अपना ली है। ये हैरतअंगेज है। अधिकारों के अलगाव पर आधारित किसी संवैधानिक व्यवस्था में कोर्ट ऑफ जस्टिस और कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में फर्क होता है।

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