• संघ के भगवान (मोदी) क्या सेना का भी उपयोग करेंगे?

    पहली बात जब सभी संस्थाओं अदालत, चुनाव आयोग, संसद, मीडिया आदि से मनमानी की है तो सेना के उपयोग में क्या हर्ज? दूसरी बात नरेंद्र मोदी बतौर भगवान अपने को जब भारत का भाग्य विधाता घोषित कर चुके हैं तो वे कुछ भी करने में समर्थ हैं। इसलिए मैं अफवाह की भी चिंता में हूं। अफवाह का आधार यह रिपोर्ट है कि सेना प्रमुख मनोज पांडे 31 मई को रिटायर होने थे लेकिन कैबिनेट की नियुक्ति कमेटी ने अप्रत्याशित तौर पर (in an unusual move, In rare move, In a last-minute surprise) उनका कार्यकाल एक महीने के लिए बढ़ाया। हिसाब...

  • चुनाव अब जनमत संग्रह!

    इतिहास बनता लगता है। जनवरी में जो देश अबकी बार चार सौ पार के हुंकारे में गुमसुम था वह मई में विद्रोही दिख रहा है। इसलिए चुनाव अब जनमत संग्रह है। और इसका मुद्दा है मोदी बनाम संविधान-लोकतंत्र। इसके सवाल हैं, जनता को चक्रवर्ती-अवतारी राजा की एकछत्रता चाहिए या संसदीय व्यवस्था? एक कथित सर्वज्ञ नेता की केंद्रीकृत सत्ता चाहिए या विकेंद्रित सरकार? प्रधानमंत्री का पद सार्वभौम हो या जवाबदेह? मनमानी चाहिए या चेक-बैलेंस? कोतवाल चाहिए या कानून? पक्षपात चाहिए या निष्पक्षता? बराबरी चाहिए या गैर बराबरी? निर्भयता चाहिए या भयाकुलता? बुद्धि चाहिए या मूर्खता? अहंकार चाहिए या विनम्रता? रावण चाहिए...

  • भाजपा का सब तरफ घटना जारी!

    लोकसभा चुनाव 2024 में मतदान के पांचवें चरण को लेकर जितनी तरह की रिपोर्ट है उसमें बहुत कुछ उलट-पलट होता लगता है। बावजूद इसके मैं, शुरुआत की अपनी कसौटी में ही अनुमान लगा रहा हूं कि एनडीए की संख्या के घटने की न्यूनतम संभावना क्या है? हालांकि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे बड़े प्रदेशों में यह धारणा बनी है कि ईवीएम का मैनेजमेंट हो तो अलग बात है अन्यथा भाजपा पैंदे में जा रही है। बहरहाल पिछले सप्ताह की तरह एनडीए बनाम एनडीए- विरोधी पार्टियों के आंकड़ों में यथास्थिति याकि 267 बनाम 269 की संख्या है। और एनडीए की 267...

  • बिहार में जात गणित से फैसला?

    भाजपा और नरेंद्र मोदी ने सोचा भी नहीं होगा कि 22 जनवरी को अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन होगा और सिर्फ तीन महीने में हिंदुत्व का छाता जाति की तेज आंधी में उड़ जाएगा। मंडल राजनीति की सबसे उर्वर जमीन बिहार में लालू प्रसाद की जात बिसात के आगे भाजपा का हिंदुत्व का कार्ड फेल होते हुए है। भाजपा ने यह होशियारी जरूर दिखाई जो नीतीश कुमार को साथ ले लिया लेकिन नीतीश अब अपने राजनीतिक करियर के प्राइम से ढलान पर हैं। वे उस तरह से जाति की बिसात नहीं बिछा सके, जैसे लालू और उनके बेटे तेजस्वी यादव...

  • झारखंड में भी वोट गणित पर चुनाव

    बिहार में एनडीए ज्यादातर सांसदों के फिर से टिकट देकर फंसा हैं तो झारखंड में भाजपा टिकट काट कर फंसी है। उसने प्रदेश के दोनों राजपूत सांसदों की टिकट काट दी और उनकी जगह भूमिहार और वैश्य को टिकट दिया। झारखंड की राजनीति में राजपूत मतदाता हमेशा अहम भूमिका निभाते रहे हैं। भाजपा के पीएन सिंह तीन बार से धनबाद से और सुनील सिंह दो बार से चतरा से जीत रहे थे। भाजपा ने इस बार दोनों की टिकट काट दी। दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन ने दो राजपूत उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस ने धनबाद सीट से पार्टी के दिग्गज नेता रहे...

  • 1977 या 2004 या 2019 !

    सन् 1977 की इस चुनाव में याद हो आई है। मुझे वह चुनाव क्योंकि याद है इसलिए उसके कुछ लक्षण 2024 में झलकते हुए हैं। कैसे? तो जरा नोट करें 1. बिना चेहरे, बिना नाम, बिना पैसों के भी ‘इंडिया’ गठबंधन वैसे ही मुकाबले में है जैसे विपक्ष तब था। 2. इंदिरा गांधी के काम, मंशा को लेकर तब जैसे लोगों में अफवाह आग की तरह फैली वैसा ही कुछ इस चुनाव में यह हल्ला लोगों में बना है कि मोदी संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे। 3. इंदिरा गांधी की रैलियां फीकी और विपक्ष की रैली में हुजूम...

  • हकीकत और सवाल

    2024 का चुनाव पहेली जैसा हो गया है! इतने सवाल हो गए हैं कि मै अपने ऑब्जर्वेशन और फीडबैक पर खुद किंतु-परंतु करते हुए हूं। सोचें, इन बिंदुओं पर-  1- सोशल मीडिया पर मोदी का वैसा डंका नहीं है जैसा 2014 और 2019 में था। सोशल मीडिया के मोदी भक्त हाशिए में हैं। वही विपक्ष के जीतने की तूताड़ी है। इसलिए सवाल है कि मोदी का चेहरा, मुद्दा और नैरेटिव उस सोशल मीडिया, यूट्यूब, इंस्टाग्राम की पसंदगी से कैसे बाहर है, जिसे नौजवान वोटर सर्वाधिक देखते हैं! और यदि ऐसा है तो इसका अर्थ? 2- टीवी चैनलों, अखबारों की अपनी...

  • क्या सचमुच?

    विश्वास नहीं होता लेकिन फीडबैक जमीनी है। यूपी की पांचवें राउंड की 14 सीटों में भाजपा को कम से कम चार सीटों का नुकसान है। और नौ सीटों में से कोई भी चार। इसका अर्थ यह है कि भाजपा को भारी नुकसान भी संभव है। 2019 में केवल रायबरेली की अकेली सीट पर विपक्ष जीता था। इस बार रायबरेली के अलावा अमेठी, बाराबंकी, मोहनलालगंज, बांदा, झांसी, कौशांबी, फतेहपुर और फैजाबाद में भाजपा हार सकती है। यदि ऐसा है तब फिर भाजपा का बचा क्या? इसलिए मैं कड़े मुकाबले की नौ सीटों में विपक्ष की चार सीट वैसे ही मान रहा...

  • नरेंद्र मोदी और गोबर भारत!

    यों गाय, गोबर और गोमूत्र अपनी पहचान है। पांच हजार वर्ष पहले गाय की उपादेयता में पूर्वजों ने जो माना था वह अब कलियुगी रूप में है। गोबर में लक्ष्मी का वास और गोमूत्र में माता गंगा। इसलिए गोबर भारत, गोबर पट्टी, गोबर संस्कृति जैसे जुमलों पर हम-आपको नाक-भौं नहीं सिकोड़नी चाहिए। हम वैसे हैं तो हैं, यह स्वीकारना चाहिए। फिर पिछले दस वर्षों में नरेंद्र मोदी ने भारत का जो गोबरीकरण किया है वह भला विश्वगुरूता से कम है? और यह नोट करें कि चार जून को चाहे जो नतीजा आए, कोई प्रधानमंत्री बने, भारत उस गोबर पथ से...

  • वाह! मोदी का ईदी खाना!

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पटना और बनारस में शो लाजवाब था। अपनी आत्ममुग्धता में उन्होंने फिर जताया कि वे अपने चेहरे, अपनी झांकियों से वोट पकने के विश्वास में हैं। साथ ही तुरूप का यह नया इक्का भी फेंका कि उनका बचपन तो मुस्लिम परिवारों के बीच बीता है! उनके घर में ईद के मौके पर खाना नहीं बनता था। उनके घर मुस्लिम पड़ोसियों के यहां से खाना आता था और ‘हम खाते थे’। मोदी मुहर्रम पर ताजिया भी करते थे। जाहिर है नरेंद्र मोदी ने इतना कुछ कहा है तो शायद पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार के मुस्लिम वोटों के...

  • मोदी के 62 दिन और ग्रह-नक्षत्र!

    हिसाब लगाएं 16 मार्च को घोषित चुनाव प्रोग्राम के बाद हर चरण के साथ नरेंद्र मोदी के भाषण, जुमलों और थीम में तथा भाव-भंगिमा में कैसे-कैसे परिवर्तन आए? साथ ही 16 मार्च से लेकर 17 मई तक के 62 दिनों में हुई घटनाओं, सुर्खियों का भी हिसाब लगाएं। क्या एक भी ऐसी कोई बड़ी सुर्खी या घटना हुई, जिससे नरेंद्र मोदी की वाह बनी हो? उलटे सब कुछ उलटा हुआ है। भारतीयों को लगी कोविड वैक्सीन की अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों से घर-घर शक बना। इलेक्टोरल बांड्स का घपला सार्वजनिक हुआ। कांग्रेस का खाता फ्रीज होते-होते बकौल मोदी, अंबानी-अडानी उसके यहां टेंपों...

  • चुनावी ग्राउंड पर क्या है?

    मुश्किल सवाल है। मोदी के पटना-बनारस शो के बाद मेरा फोकस यूपी, बिहार, हरियाणा, दिल्ली याकि उत्तर भारत के चुनावी मुकाबले पर बना है? जरा एक बार फिर उत्तर प्रदेश की बकाया सीटों की गणित पर विचार करें। सन् 2019 में प्रदेश में भाजपा ने 64 सीटे जीती थी। इनमें 27-28 सीटें ऐसी थी जो आधा, एक प्रतिशत से साढ़े दस प्रतिशत वोटों के अंतर से जीती गई। मतलब विपक्ष ने 2019 में 16 सीटें जीती तो उसका भाजपा से 27-28 सीटों पर कांटे का मुकाबला था। उस नाते यूपी की बची हुई सीटों के चुनावी ग्राउंड में क्या कुछ...

  • विपक्ष के पास है संविधान और रेवड़ी

    भाजपा को यदि हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव का भरोसा है तो विपक्ष को संविधान का सहारा है। राहुल गांधी इन दिनों हर जगह मंच पर संविधान की प्रति लेकर जा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि भाजपा की सरकार बन गई तो वह इस किताब को फाड़ कर कचरे के डब्बे में फेंक देगी। राहुल किताब को इस तरह से डिस्प्ले कर रहे हैं, जिससे लग रहा है कि यह खतरे में है। इस तरह के ऑप्टिक्स का लोगों के दिल दिमाग पर असर होता है। इसी तरह 1989 के चुनाव में वीपी सिंह अपने जेब से एक परची निकालते...

  • अब सिर्फ हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव

    लोकसभा चुनाव 2024 के बचे हुए तीन चरणों के प्रचार में एक ही चीज है, जिसकी गारंटी है और वह है हिंदू मुस्लिम का नैरेटिव। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों को लेकर जो भी कहा है और जितना भी सद्भाव दिखाया है उसका यह मतलब नहीं है कि वे मुसलमानों का भय दिखा कर हिंदू वोटों की गोलबंदी के प्रयास छोड़ने जा रहे हैं। अब उन्होंने हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का एक नया रास्ता निकाल लिया है। जिस तरह से विज्ञापन की दुनिया में सरोगेट विज्ञापन होते हैं, उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने प्रचार का तरीका निकाल लिया है। टेलीविजन...

  • मोदी का सिक्का, हुआ खोटा!

    मैंने 29 अप्रैल को लिखा था, ‘उम्मीद रखें, समय आ रहा है’! और दो सप्ताह बाद आज क्या तस्वीर? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के जिस सिक्के से देश चार सौ पार सीटों में खनका हुआ था, वह खोटा हो गया है। वह अपने नाम व दाम से छोटा है और सिक्का बस एक  मुखौटा है। हां, खुद नरेंद्र मोदी के भाषण, शेयर बाजार की खनक और आम चर्चाओं में यह हकीकत आग की तरह फैलते हुए है कि मोदी के सिक्के से अब भाजपा उम्मीदवारों की जीत की गारंटी नहीं है। उम्मीदवारों को अपने बूते, अकेले अपने दम पर...

  • मोदी से लोग लड़ रहे न कि विपक्ष!

    2024 के चुनाव में अजूबा होगा। मैंने पहले भी लिखा था कि मौन लोग विपक्ष की ओर से चुनाव लड़ते हुए हैं। मेरी यह थीसिस मुझे सात मई के मतदान के दिन साक्षात सही दिखी। उस दिन मैं कोई तीन सौ किलोमीटर घूमा होगा। महाराष्ट्र में मुंबई से दूर तीन लोकसभा क्षेत्रों में। कोंकण इलाके में। इनमें एक रायगढ़ की सीट पर मतदान भी था। तीनों जगह नरेंद्र मोदी नजर आए लेकिन उद्धव ठाकरे, शरद पवार, राहुल गांधी का कहीं कोई होर्डिंग, पोस्टर नहीं था। न पार्टियों के एक्टिविस्ट या वोटर इनका नाम बोलते हुए थे। पर हर जगह लोग...

  • मोदी की घबराहट का चरम, अंबानी-अडानी भाषण!

    तमाम तरह की बातें हैं। लेकिन असल बात भाषा है। नरेंद्र मोदी भले दस साल प्रधानमंत्री रह लिए हैं और अंबानी व अडानी दुनिया के टॉप खरबपति हैं मगर तीनों का स्तर कैसा-क्या है? इसे बूझे इन वाक्यों से- अंबानी, अडानी से कितना माल उठाया है? काले धन के कितने बोरे भरकर मारे हैं? आज टेंपो भरकर नोट कांग्रेस के लिए पहुंची है क्या?क्या सौदा हुआ है? आपने रातों रात अंबानी, अडानी को गाली देना बंद कर दिया? जरूर दाल में कुछ काला है? पांच साल तक अंबानी, अडानी को गाली दी और रातों रात गालियां बंद हो गईं। मतलब...

  • बिहार में भाजपा की सीटें ही फंसी

    लोकसभा चुनाव 2024 शुरू होने के बाद आमतौर पर माना जा रहा था कि बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी की स्थिति डावांडोल है, जबकि भाजपा बहुत अच्छी स्थिति में है। इस आधार पर अनुमान लगाया जा रहा था कि नीतीश की पार्टी जिन 16 सीटों पर लड़ रही है वहां उनको नुकसान होगा, जबकि भाजपा की 17 सीटें सुरक्षित हैं। एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ने भाजपा के साथ साथ चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की सीटें भी सुरक्षित बता दी थीं। यानी उनकी पांच सीटों पर भी कोई खतरा नहीं बताया गया था। लेकिन लोकसभा चुनाव के पहले...

  • कर्नाटक में मतदान बढ़ने का मतलब

    आमतौर पर राजनीति में माना जाता है कि मतदान तभी बढ़ेगा, जब बहुत अच्छी लड़ाई हो या कोई बहुत अच्छा मुद्दा हो। इस बार देश के चुनाव में न तो बहुत अच्छी लड़ाई दिख रही है और न कोई बहुत बड़ा मुद्दा दिख रहा है। यही कारण है कि पूरे देश में लोकसभा की 283 सीटों पर मतदान के बाद भी मत प्रतिशत पिछली बार से कम दिख रहा है। तमाम पार्टियों के प्रयासों के बावजूद मतदान प्रतिशत में इजाफा नहीं हो रहा है। पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोड़ दें तो हर जगह औसत मतदान हो रहा है। ज्यादातर...

  • उद्धव और शरद के इलाके में सुधरा मतदान

    हालांकि महाराष्ट्र में तीसरे चरण के मतदान में भी पिछली बार के मतदान की बराबरी नहीं हुई लेकिन इतना जरूर हुआ कि मतदान का प्रतिशत 61 से ऊपर चला गया। पहले दो चरण में मतदान इससे कम रहा था। लेकिन तीसरे चरण में जब शरद पवार और उद्धव ठाकरे के गढ़ में मतदान हुआ तो मतदान प्रतिशत 61.4 फीसदी हो गया। इसमें थोड़ी और बढ़ोतरी हो सकती है। यह अंतरिम आंकड़ा है। पिछली बार इन 11 सीटों में 61.7 फीसदी मतदान हुआ था। तीसरे चरण में कोल्हापुर में 70 फीसदी से ऊपर मतदान हुआ। सांगली में 61 फीसदी तो सातारा...

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