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अकारण नहीं है ‘लाल खतरे’ का लौट आना!

अमेरिका और पूरे पश्चिम में हाल मेंल उभरी “चाइनामैक्सिंग” (Chinamaxing) की परिघटना उनकी चिंता का इससे भी बड़ा स्रोत है। “चाइनामैक्सिंग” इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भू-राजनीतिक चर्चाओं में उभरा एक आधुनिक स्लैंग है।…

फिलहाल दुनिया के किसी क्षेत्र या देश में समाजवादी क्रांति या डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म के सिद्धांत पर संगठित किसी कम्युनिस्ट पार्टी के क्रांतिकारी रास्ते से सत्ता में आने की संभावना नहीं दिखती। पिछले 35 साल- यानी सोवियत संघ के विघटन के बाद- से सुनियोजित ढंग से किया गया यह प्रचार अभी भी खासा प्रभावी है कि साम्यवाद नाकाम साबित हो चुकी विचारधारा है। इस विचारधारा पर हुए प्रयोगों को बदनाम करने और इसके नायकों की भयाक्रांत करने वाली छवि बनाने की परियोजनाओं में काफी संसाधन खर्च किए हैँ। इसके बावजूद यह विडंबना ही है कि विश्व साम्राज्यवाद के केंद्र और दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के शासक वर्ग को अपने माथे पर कम्युनिज्म का खतरा मंडराता दिखने लगे!

अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह (चार जुलाई) की पूर्व संध्या पर जब राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्र को संबोधित किया, तो अपने 29 मिनट के भाषण में उन्होंने एक चौथाई से ज्यादा समय “कम्युनिज्म के खतरों” से अपने देशवासियों को आगाह करने और इस विचारधारा की निंदा में लगाया। उनके भाषण के कुछ अंशों पर गौर कीजिएः

Ø  “पृथ्वी पर अमेरिका जैसी व्यवस्था कभी कहीं नहीं रही। हम किसी को भी इसे हमसे छीनने नहीं देंगे। फिर भी, जैसे-जैसे हम इस भव्य वर्षगांठ के करीब पहुंच रहे हैं, हम अपनी अमेरिकी पहचान पर एक नए सिरे से हमला होते देख रहे हैं। जिस साम्यवाद के खतरे के खिलाफ हमने शीत युद्ध लड़ा और जीता, उसकी एक पीढ़ी बाद अब हमारे देश में उसी साम्यवादी खतरे का पुनरुत्थान हो रहा है। इसमें हमारे देश में आने वाले वे नए लोग भी शामिल हैं जो हमारे जीने के तौर-तरीकों और हमारी महान सफलता के पूरी तरह विपरीत विचारों को गले लगा रहे हैं…. यह हमारे देश के लिए प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, पर्ल हार्बर या यहां तक कि 9/11 से भी बड़ा खतरा है।”

Ø  “साम्यवाद दुनिया में हर जगह स्वतंत्र लोगों का दुश्मन है। यह कभी सफल नहीं होता। यह संविधान का दुश्मन है…. अगर आप इतिहास देखें, तो हजारों साल में अलग-अलग नामों, थोड़ी अलग विचारधाराओं और प्रणालियों के तहत, इस व्यवस्था ने किसी भी अन्य आजमाई गई व्यवस्था की तुलना में सबसे अधिक मौत और तबाही मचाई है। इसने अकेले पिछली सदी में ही 10 करोड़ लोगों की जान ले ली।”

Ø  “लोकतंत्र में ऐसे सिद्धांतों को रत्ती भर भी जगह नहीं दी जा सकती, क्योंकि सत्ता में आते ही कम्युनिस्ट सबसे पहला काम लोकतंत्र को ही पूरी तरह नष्ट करने का करते हैं। दुनिया भर के तमाम देशों में साम्यवादियों ने यह किया है, चाहे आप कहीं भी देखें… (अतः) आप या तो कार्ल मार्क्स के प्रति वफादार हो सकते हैं, या फिर अमेरिका के प्रति। आप या तो साम्यवादी हो सकते हैं, या देशभक्त। आप दोनों एक साथ नहीं हो सकते।”

Ø  “अमेरिकी विरासत की इस 250वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर, हम यह संकल्प लेते हैं और सभी के सामने यह कसम खाते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिक साम्यवाद को बहुत जल्द परास्त कर देंगे…. अमेरिका कभी भी साम्यवादी देश नहीं बनेगा।”

ऐसा नहीं है कि बिना ट्रंप किसी खास संदर्भ के, यूं ही, साम्यवाद के खिलाफ ऐसी आग उगल गए हों। हालिया घटनाक्रम पर गौर करें, तो अमेरिकी शासक वर्ग के साम्यवाद के फिर उभरने की संभावना को लेकर चिंतित होने के ठोस संकेत मिलते हैँ। मसलन, इसी वर्ष म्यूनिख सिक्युरिटी कांफ्रेंस में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने “500 साल के पश्चिमी साम्राज्य विस्तार” को रोकने में कम्युनिस्टों की भूमिका को लेकर बेहद आक्रामक नजरिया पेश किया था। उन्होंने कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के अंत (1945) से पहले के 500 वर्षों तक ‘पश्चिम’ (यूरोप और अमेरिका) का लगातार विस्तार हो रहा था। कोलंबस के युग से लेकर तब तक पश्चिमी देशों के मिशनरी, तीर्थयात्री, सैनिक और खोजकर्ता अपने तटों से बाहर निकलकर महासागरों को पार कर रहे थे, नए महाद्वीप बसा रहे थे, और पूरी दुनिया में विशाल साम्राज्यों का निर्माण कर रहे थे। लेकिन 1945 में इतिहास में पहली बार यह विस्तार रुका और पश्चिम का सिकुड़ना शुरू हो गया।

रुबियो ने सीधे तौर पर “ईश्वरविहीन कम्युनिस्टों (Godless Communists) और उपनिवेशवाद-विरोधी विद्रोहों” को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। रुबियो का संदेश था कि अब पश्चिम को एकजुट होना होगा, ताकि वे आधुनिक कम्युनिज्म का मुकाबला कर सकें और एक नई “पश्चिमी शताब्दी” का निर्माण कर सकें।

इस सिलसिले में यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिका के कई राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रम में ‘कम्युनिस्ट खतरे’ और उसके इतिहास के बारे में पढ़ाना अब अनिवार्य कर दिया गया है। विशेष रूप से रिपब्लिकन पार्टी शासित राज्यों में इसको लेकर कड़े कानून बनाए गए हैं, जिन्हें 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से लागू किया जा रहा है। मसलन, फ्लोरिडा राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में किंडरगार्टन (KG) से लेकर 12वीं कक्षा तक कम्युनिज्म का इतिहास और उसका “खतरा” पढ़ाना अनिवार्य किया गया है। इसके तहत बच्चों को कम्युनिस्ट शासनों के तहत हुई “क्रूरता और मानवीय पीड़ा”, इस कारण हुई “दस करोड़ से अधिक मौतों”, और अमेरिका के भीतर चले कम्युनिस्ट आंदोलनों की रणनीतियों के बारे में पढ़ाया जाएगा।

टेक्सस राज्य में भी इसी तरह के एक कानून को मंजूरी दी गई है, जो इस नए सत्र से प्रभावी हो रहा है। ओक्लाहोमा और एरिज़ोना राज्यों में सामाजिक अध्ययन के पाठ्यक्रम में ‘20वीं सदी के अधिनायकवाद और कम्युनिज्म के इतिहास’ को शामिल करने के लिए नए नियम बनाए हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी संसद में ‘क्रूशियल कम्युनिज्म टीचिंग एक्ट’ लाया गया है, जिसका उद्देश्य देश भर के हाई स्कूलों के लिए एक एंटी-कम्युनिस्ट नागरिक पाठ्यक्रम (civic education curriculum) तैयार करना है।

इसके अतिरिक्त “कम्युनिज्म के पीड़ितों” की याद में कई महत्वपूर्ण स्मारक और संग्रहालय बनाए गए हैं। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी।सी। में अमेरिकी संसद के सर्वसम्मत आदेश के बाद 2007 में इस स्मारक का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश ने किया था। इस शिलालेख इस पर लिखा है: “साम्यवाद के 10 करोड़ से अधिक पीड़ितों और स्वतंत्रता से प्रेम करने वालों के लिए। साल 2022 में वाशिंगटन में एक “विक्टिम्स ऑफ कम्युनिज्म म्यूजियम” भी खोला गया।

और बात सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। बल्कि अन्य पूंजीवादी देशों में भी इस तरह की पहल हुई है। कनाडा की राजधानी ओटावा में दिसंबर 2024 में “कनाडाः ए लैंड ऑफ रिफ्यूज” (कनाडाः शरण भूमि) नाम से एक भव्य स्मारक का अनावरण किया गया। यह “उन लाखों लोगों को समर्पित है, जो दुनिया भर के दमनकारी कम्युनिस्ट शासनों से भागकर शरणार्थी के रूप में कनाडा आए और यहां आकर स्वतंत्रता से जिए।” ऐसे कई कथित स्मारक पूर्वी यूरोप के देशों में भी बनाए गए हैं, जो कभी सोशलिस्ट खेमे का हिस्सा थे।

तो मुद्दा यह है कि जो विचारधारा “पराजित” हो चुकी है, जिसकी कथित नाकामी जग-जाहिर है, और जो सत्ता में आते ही सबसे पहले “लोकतंत्र एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट करती है”, उसको याद करने में “कामयाब” देश अपने इतने संसाधन और ऊर्जा क्यों लगा रहे हैं? स्वतंत्रता एवं समृद्धि की कथित भूमि का राष्ट्रपति अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में इतना समय उस विचारधारा के कथित खतरों के जिक्र पर क्यों ज़ाया करने लगा है? 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा करने वाली व्यवस्थाएं क्यों फिर से अपने ऊपर “साम्यवाद का खतरा” मंडराता देख रही हैं?

गहराई में उतर कर उत्तर की तलाश करें, तो जो पहलू सबसे नजर आता है, वह पूंजीवाद के गढ़ देशों में इस व्यवस्था से हुआ लोगों का मोहभंग है। उत्पन्न धन, नई तकनीक से संभव हुई सुविधाओं, और व्यवस्था में आवाज रखने की क्षमता से अधिक-से-अधिक लोगों के वंचित होते जाने की हकीकत ने आम श्रमिकों में पूंजीवाद और चुनावी लोकतंत्र की उपयोगिता एवं वैधता को संदिग्ध बना दिया है। इस सिलसिले में कुछ तथ्य महत्त्वपूर्ण हैः

  • अमेरिका में घर खरीदना अब युवाओं के लिए लगभग असंभव होता जा रहा है। किराये की दर और आम महंगाई काफी बढ़ चुकी है।
  • कॉलेज की पढ़ाई के लिए अमेरिकी युवाओं पर लाखों डॉलर का कर्ज है, जिससे वे अपने करियर की शुरुआत ही भारी वित्तीय दबाव में करते हैं।
  • अमेरिका में बिना इंश्योरेंस के इलाज कराना बेहद महंगा है। अतः युवा स्वाभाविक रूप ऐसी प्रणालियों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जहां सरकार मुफ्त या सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था करती हो।
  • युवाओं को लगता है कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था केवल बड़े कॉरपोरेट्स और अमीर लोगों (टॉप एक प्रतिशत आबादी) को फायदा पहुंचा रही है, जबकि आम जनता पीछे छूट रही है।

नतीजतन, एक व्यवस्था एवं विचारधारा के रूप में समाजवाद की लोकप्रियता अमेरिका में तेजी से बढ़ी है। गौर कीजिएः

  • धुर दक्षिणपंथी कैटो इंस्टीट्यूट के हालिया राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार जेनेरेशन जेड में पूंजीवाद (45 प्रतिशत%) की तुलना में समाजवाद (53%) के प्रति अधिक समर्थन देखा गया।
  • प्यू रिसर्च और यू-गोव (YouGov) के अध्ययनों के मुताबिक जहां 45 वर्ष से अधिक उम्र के अमेरिकियों की बहुसंख्या पूंजीवाद की समर्थक है, वहीं 18-29 वर्ष के युवाओं में पूंजीवाद और समाजवाद को लेकर लगभग बराबरी की टक्कर है, या कई बार समाजवाद का पलड़ा भारी रहता है।
  • थिंक टैंक- हार्टलैंड इंस्टीट्यूट और रासमुसेन के सर्वे बताते हैं कि 18-39 वर्ष के आधे से अधिक (53%) अमेरिकी युवा भविष्य में किसी ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ राष्ट्रपति को ह्वाइट हाउस में देखना पसंद करेंगे।

फिलहाल, अमेरिकी युवाओं की बहुसंख्या समाजवाद को चुनावी सिस्टम के भीतर का एक विकल्प मान रही है। 2016 से बर्नी सैंडर्स और उनके समर्थकों को मिली सफलताओं से इस बात की पुष्टि हुई। इस सोच के नए पोस्टर ब्वॉय जोहरान ममदानी हैं, जो वैसे तो एक शहर (न्यूयॉर्क) के मेयर भर हैं, लेकिन ट्रंप के धुर-दक्षिणपंथी एवं नव-फासीवादी प्रशासन के खिलाफ उन्हें विकल्प के राष्ट्रीय चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी भूमि पर जन्म ना होने के कारण ममदानी राष्ट्रपति पद का चुनाव तो नहीं लड़ सकते, लेकिन उनका प्रभाव डेमोक्रेटिक पार्टी के ढांचे में बड़े उथल-पुथल का संकेत दे रहा है, जो उनकी सोशल डेमोक्रेटिक (अथवा डेमोक्रेटिक सोशलिज्म की) नीतियों की लोकप्रियता का संकेत है।

इससे अमेरिका के अरबपति वर्ग का चिंतित होना लाजिमी है। मगर बात यहीं तक नहीं है। अमेरिका और पूरे पश्चिम में हाल मेंल उभरी “चाइनामैक्सिंग” (Chinamaxing) की परिघटना उनकी चिंता का इससे भी बड़ा स्रोत है। “चाइनामैक्सिंग” इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भू-राजनीतिक चर्चाओं में उभरा एक आधुनिक स्लैंग है। शब्दकोश के मुताबिक यह शब्द मूल रूप से इंटरनेट सब-कल्चर- जैसे Looksmaxing या Careermaxing से निकला है, जिसका अर्थ किसी चीज़ को अधिकतम स्तर पर ले जाना होता है।

भू-राजनीति और आर्थिक संदर्भों में चाइनामैक्सिंग के मुख्य रूप से दो अर्थ सामने आए हैं:

–    चीन की आर्थिक और रणनीतिक नीतियों की नकल का पक्ष लेना, और

–    व्यक्तिगत या कॉरपोरेट स्तर पर चीन से अधिकतम लाभ उठाने की वकालत करना

चाइनामैक्सिंग परिघटना के तहत पश्चिम में सोशल मीडिया पर चीन की तरह बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण (बिना लेटलतीफी या कानूनी अड़चनों के रिकॉर्ड समय में बड़े-बड़े हाईवे, बुलेट ट्रेन नेटवर्क, बंदरगाह और शहर बसाना, आदि), मैन्युफैक्चरिंग पर अत्यधिक जोर (देश विशेष को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए सरकारी ताकत झोंक देना), कड़े राज्य-नियंत्रित फैसले (लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की लेटलतीफी के बजाय ‘टॉप-डाउन’ प्रशासनिक फैसले लेना ताकि विकास की गति बहुत तेज हो), आदि जैसी नीतियों की बेहिचक वकालत की जा रही है।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐप जेमिनी के मुताबिक ‘चाइनामैक्सिंग’ का अर्थ है—“चीन की तरह सोचना, चीन की तरह तेज़ी से काम करना, और चीन के विकास मॉडल या उसकी मैन्युफैक्चरिंग ताकत का अपनी प्रगति के लिए अधिकतम उपयोग करना।”

पश्चिमी विशेषज्ञों ने बहुत तेजी से आगे बढ़ी इस प्रवृत्ति (चाइनामैक्सिंग) को अजीब विरोधाभास बताया है। उनके मुताबिक एक तरफ पश्चिमी सरकारें सार्वजनिक रूप से चीन को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक और आर्थिक प्रतिद्वंदी मानती हैं और उन्होंने उसकी प्रगति रोकने में उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है, वहीं पश्चिमी राजनेता, तकनीकी विशेषज्ञ, और उद्यमी चीन की कार्यकुशलता और गति की नकल करने की होड़ में भी लगे हुए हैं। इसका असर युवा सोच पर पड़ा है।

बहरहाल, चीन की सफलताओं को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व से अलग करके नहीं समझा जा सकता। तो इसके मद्देनजर यह समझा जा सकता है कि ट्रंप, उनके समर्थकों और आम तौर पर पूरे अमेरिका एवं पश्चिम में फैला ‘लाल भय’ (Red Scare) अकारण नहीं है। यह इतिहास के उस मोड़ पर पहुंचने का परिणाम है, जिसमें पूंजीवादी लोकतंत्र से मायूस और उसके लाभों से वंचित समूहों के बीच कार्ल मार्क्स और कम्युनिज्म का आकर्षण बढ़ने लगा है। ट्रंप ने उन्हीं समूहों को निशाने पर रख कर कहा है कि आप साथ-साथ मार्क्स और अमेरिका के प्रति वफादार नहीं हो सकते- साथ-साथ कम्युनिस्ट और देशभक्त नहीं हो सकते।

मगर यह उनका पैमाना है। संभव है कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जाए, जो कम्युनिस्ट होने को ही असली देशभक्ति समझें। उसी दिन की कल्पना से ट्रंप और अमेरिकी शासक वर्ग की नींद अभी से उड़ी हुई है!

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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