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रुस्तम-ए-हिंद को सींकिया टोली का जवाब

मनमोहन सिंह के ज़़माने में टूजी स्पेक्ट्रम मामले में ए राजा का नाम आया, इस्तीफ़ा देना पड़ा। दयानिधि मारन का नाम आया, इस्तीफ़ा देना पड़ा। भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में वीरभद्र सिंह का नाम आया, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। रिश्वतखोरी के मामले में पवन कुमार बंसल के भतीजे का नाम आया, उन का इस्तीफ़ा ले लिया गया। अश्विनी कुमार पर आरोप लगे कि उन्होंने सीबीआई की जांच में दखल दिया है तो उन का इस्तीफ़ा हो गया। वोल्कर रिपोर्ट में नटवर सिंह का नाम आया, उन का इस्तीफा हो गया। हत्भाग हमारे कि इस तरह की परंपरा वाले भारत का प्रधानमंत्री आज अपने एक मंत्री को इसलिए नहीं हटा रहा है कि उस की ज़िद है कि विद्यार्थियों और विपक्ष की मांग पर तो वह ऐसा नहीं करेगा।

हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के जीवन का बीजमंत्र है – ‘मेरा गधा पहलवान’। वे अपने साथियों का साथ कभी नहीं छोड़ते हैं। जो उन के साथ है, उस के सौ खून माफ़ हैं। और, जो उन के साथ नहीं है, उस का जीना मुहाल करने में वे कोई कसर बाक़ी नहीं रखते हैं। और, जो उन्हें आंखें दिखाए, उस का तो समझ लीजिए, वे क्या हाल करते होंगे! वे प्रधानमंत्री बनने के बाद से ऐसे नहीं हुए हैं। यह उन का जन्मज़ात स्वभाव है। आप ने ‘बाल-नरेंद्र’ पुस्तक में वह कहानी नहीं पढ़ी क्या कि वे किस तरह घड़ियाल को घसीट कर अपने साथ खींच लाए थे? तब से अब तक जहां उन्हें किसी में घड़ियाल का अक़्स दिखा नहीं कि वे घसीट-घसीट कर रगड़ डालते हैं।

अपने राजनीतिक विपक्ष में नरेंद्र भाई को घड़ियाली सूरतें नज़र आती हैं। इसलिए वे बारह बरस से उस की बेरहमी से रगड़पट्टी कर रहे हैं। उन्होंने विपक्ष-मुक्त, और ख़ासकर, कांग्रेस-मुक्त भारत की स्थापना का संकल्प ले रखा है। उन के इस जीवन के दो ही लक्ष्य हैं। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना और भारत की सियासत को प्रतिपक्ष-मुक्त बनाना। अपने अश्वमेध यज्ञ के ये दोनों चरण पूरे किए बिना उन्हें कहां विश्राम! सो, जैसे ही नरेंद्र भाई को आशंका हुई कि जंतर-मंतर से समूचे देश में फैल गए विद्यार्थी-आंदोलन से कहीं विपक्षी राजनीतिक दलों को प्राणवायु न मिल जाए, उन्हें बच्चों में भी घड़ियाल दिखाई देने लगे। वे न तो इतने भोले हैं और न इतने भले कि बच्चे अगर ख़ुद को कॉकरोच बताएं तो वे मान लें कि वे कॉकरोच ही हैं। उन की दूरबीनी आंखों ने देख लिया कि घड़ियाल तिलचट्टों का लबादा ओढ़ कर सड़कों पर निकले हैं।

तो घड़ियालों से दो-दो हाथ करना तो उन का बचपन से शगल है। ऐसे में अगर आप सोच रहे थे कि नरेंद्र भाई की हुक़ूमत समझदारी के साथ, संवेदनशीलता के साथ और सहानुभूति के साथ विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान खोजेगी तो आप से बड़ा जड़-बुद्धि और कौन हो सकता है? सो, नरेंद्र भाई ने अपने बावर्दी और बेवर्दी पुलिस बल को बच्चों के पीछे छू कर दिया। इस के बाद जो होना था, वही हुआ। मुस्टंडे-मुस्टंडियों ने लड़के-लड़कियों को आगे से, पीछे से, ऊपर से, नीचे से ऐसा सबक सिखाना शुरू कर दिया कि उसे देख कर निर्लज्जता के नयन भी भर आए। बेशर्मी का गला भी रुंध गया। बेहयाई का मन भी भीग गया।

लेकिन बच्चे ऐसे डट गए हैं कि टस-से-मस होने का नाम नहीं ले रहे हैं। जंतर-मंतर पर उन का उछाह देख कर सरकार की सिट्टीपिट्टी गुम होती जा रही है। बृहस्पतिवार की आधी रात नरेंद्र भाई ने जो वीडियो-संदेश जारी किया, उस में उन के चेहरे पर मौजूद हताश भावों को देख कर उन की आराधक मंडली में ज़रूर घनघोर निराशा के बादल तैर रहे होंगे। फिर इम्तहानों को ले कर एक नए विधेयक के मसौदे पर विचार के लिए शुक्रवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक से प्रधानमंत्री जी के मुखमंडल की जैसी तस्वीरें और चलचित्र सामने आए, उन्होंने तो उन के यश और पराक्रम के ताज़ा हालात की पूरी पोलपट्टी ही खोल कर रख दी। पिछले बारह साल में, मैंने तो नरेंद्र भाई की सूरत पर ऐसी मुर्दनी कभी देखी नहीं थी। वे अपने जबड़े भींच कर इस तरह बैठे हुए थे गोया किसी लहीम-शहीम रुस्तम-ए-हिंद को सींकिया-टोली ने बुरी तरह धूल चटा दी हो। वे भीतर से क्षोभ और अपमान के गहरे अहसास से तमतमाए हुए भी लग रहे थे और बेतरह लाचारी का साया भी उन के चेहरे पर साफ़ था।

विद्यार्थियों के आंदोलन को हर तरह से बदनाम करने के लिए पूरा आराधक-मीडिया पिछले छह दिनों से दिन-रात एक कर रहा है। वह कह रहा है कि बच्चे मौज-मज़े के लिए आंदोलनजीवी बन गए हैं, वे सीआईए के एजेंट हैं, वे एक बहुत बड़े वैश्विक षड्यंत्र में हिस्सेदार हैं, वे विदेशी ताक़तों के हाथों में खेल रहे हैं, वे अराजक हैं, वे सुरक्षा बलों पर हमले कर रहे हैं, वे देशद्रोही हैं और विपक्षी नेता उन्हें उकसा रहे हैं। मगर यह विमर्श गढ़ने के सारे हथकंडे नाकाम हो गए हैं। सरकार की तरफ़ से दी गई ये अनौपचारिक धमकियां भी बेअसर रहीं कि आंदोलन में शामिल बच्चों के पासपोर्ट रद्द हो जाएंगे, उन्हें विदेश जाने के लिए वीज़ा नहीं मिला करेगा और उन्हें रोज़गार देने के पहले निजी और सरकारी कंपनियों बीस बार सोचा करेंगी।

इन सब तरीक़ों से आंदोलन ठंडा पड़ने के बजाय उत्तर से निकल कर पूरब, पश्चिम और दक्षिण तक फैल गया। डेढ़ दर्जन राज्यों के पचासों शहरों में धरने-प्रदर्शन शुरू हो गए। देश भर में दूरदराज़ के शहरों, कस्बों और गांवों से बच्चे अपने माता-पिता को ले कर और माता-पिता अपने बच्चों को ले कर विद्यार्थियों के मुद्दों से एकजुटता ज़ाहिर करने के लिए जंतर-मंतर पहुंचने लगे। आंदोलन इतना स्वतःस्फूर्त आकार ले चुका है कि अब न वह कॉकरोच जनता पार्टी जैसे ग़ैर-राजनीतिक मंच की बपौती रह गया है और न सियासी प्रतिपक्ष की जायदाद है। उस का अपना ख़ुद का एक ऐसा संवेग जन्म ले चुका है कि उसे किसी के नेतृत्व की ज़रूरत ही नहीं रह गई है। वह अपनी अबाध रफ़्तार से अपनी दिशा में अपने आप बढ़ता चला जा रहा है।

ज़ाहिर है कि यह स्थिति नरेंद्र भाई जैसे एकाधिकारवादी प्रधानमंत्री को अपने लिए चुनौती की तरह लग रही है। वे इतने जनोन्मुखी कभी रहे ही नहीं कि आंदोलनकारियों के मसलों को और उन की दलीलों को समझने और उन का समाधान निकालने की कोशिश करें। अब तक उन्हें सिर्फ़ हुक़्म देने की आदत रही है और हुक़्मउदूली उन्हें सख़्त नापसंद रही है। वे शमन नहीं, दमन के मंत्रों की साधना करते रहे हैं। तो जब किसी राजा की अवधारणा में अपनी ही प्रजा को देश का दुश्मन समझने की जन्मघुट्टी हो तो समाधान कहां से निकलेंगे?

पहले ज़रा-से आरोप भर लगने पर मंत्रियों से इस्तीफा ले लिया जाता था। नेहरू जी के ज़़माने में टी टी कृष्णमाचारी पर एलआईसी-मूंदड़ा मामले में छींटे उछले। उन का इस्तीफा हो गया। सिराजुद्दीन एंड कंपनी के मामले में के डी मालवीय पर आरोप लगा, उन का इस्तीफ़ा हो गया। नरसिंहराव के वक़्त में बी शंकरानंद का नाम हर्षद मेहता मामले में हलका-सा आया था तो उन का इस्तीफ़ा हो गया। रामेश्वर ठाकुर वित्त राज्य मंत्री थे। स्टाक घोटाले की जांच रपट में उन के नाम का ज़िक्र हो गया था तो उन का इस्तीफ़ा हो गया। कल्पनाथ राय का नाम चीनी घोटाले में आ गया तो उन का इस्तीफ़ा हो गया।

मनमोहन सिंह के ज़़माने में टूजी स्पेक्ट्रम मामले में ए राजा का नाम आया, इस्तीफ़ा देना पड़ा। दयानिधि मारन का नाम आया, इस्तीफ़ा देना पड़ा। भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में वीरभद्र सिंह का नाम आया, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। रिश्वतखोरी के मामले में पवन कुमार बंसल के भतीजे का नाम आया, उन का इस्तीफ़ा ले लिया गया। अश्विनी कुमार पर आरोप लगे कि उन्होंने सीबीआई की जांच में दखल दिया है तो उन का इस्तीफ़ा हो गया। वोल्कर रिपोर्ट में नटवर सिंह का नाम आया, उन का इस्तीफा हो गया। हत्भाग हमारे कि इस तरह की परंपरा वाले भारत का प्रधानमंत्री आज अपने एक मंत्री को इसलिए नहीं हटा रहा है कि उस की ज़िद है कि विद्यार्थियों और विपक्ष की मांग पर तो वह ऐसा नहीं करेगा।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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