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हवा बदल रही है?

इस वर्ष दो घटनाओं ने हवा बदलने में निर्णायक काम किया। यह थे — शिक्षा और मंदिर पर घमंडी लापरवाही। पहली थी: यूजीसी गाइडलाइन्स, जिस ने भाजपा को हिन्दू स्टार से एक बौना वी.पी. सिंह बना दिया। …. रही-सही कसर अयोध्या राम मंदिर में बेफिक्र और नियमित चोरी ने पूरी कर दी। दोनों घटनाओं ने दिखाया कि बेचारे आदर्शवादी हिन्दू को बरसों से केवल उल्लू बनाया गया। विवेकानन्द और शिवाजी केवल फोटो दिखाकर लुभाने, विज्ञापन बेचने के बहाने जैसे थे।

कॉकरोच, वांगचुक, इस्तीफा, गाली, बाँकीपुर, आरक्षण-विरोधी आक्रोश, ‘फ्रेंड्स’ और रात में रील बनाना … यह सब शायद चार वर्ष पहले नहीं हो सकता था। जबकि कोशिशें होती रहीं! पहले भी ‘चौकीदार चोर’, ‘लिंचिंग’, ‘अवार्ड वापसी’, ‘असहिष्णुता’, आदि वैसे ही सांकेतिक शब्द थे — जैसा अभी ‘कॉकरोच’ है। अर्थ-गर्भित, सत्ताधारियों को कठघरे में खड़ा करने, हिलाने, गिराने, आदि की मंशा से। पर पहले उस से सत्ताधारियों को हानि नहीं हुई थी। तो अब क्या बदल रहा है?

दरअसल, अभी भी मामला वोट का नहीं, बल्कि केवल बौद्धिक-नैतिक क्षेत्र का है। जो हवा बनने-बिगड़ने का क्षेत्र है।‌ जिस से वोटों पर तुरत असर नहीं होता। किन्तु जो एक वर्ग विशेष की समझ को प्रभावित करता है। उस में अनायास कुछ बदलाव आने लगता है। यह एकाएक नहीं होता। किन्तु कोई घटना उसे निश्चित रूप दे देती है। तब विरोधी प्रचार भी स्वीकृति पाने लगता है, जो पहले विफल रहता था।

इस वर्ष दो घटनाओं ने हवा बदलने में निर्णायक काम किया। यह थे — शिक्षा और मंदिर पर घमंडी लापरवाही। पहली थी: यूजीसी गाइडलाइन्स, जिस ने भाजपा को हिन्दू स्टार से एक बौना वी.पी. सिंह बना दिया। उस ने मंडल कमीशन लागू करने से भी अधिक अप्रत्याशित झटके का काम किया। लाभित और वंचित — दोनों समूहों को असलियत दिख गयी। यह असलियत कि दूर-दूर तक कोई हिन्दू या राष्ट्रीय चिन्ता नहीं है। केवल जैसे हो गद्दी पकड़े रखना ही अंतिम लक्ष्य है।

उस झटके ने एक लघु, किन्तु परिश्रमी, लिखने-बोलने, उलझने वाले आदर्शवादी समूह का मोहभंग कर दिया! रही-सही कसर अयोध्या राम मंदिर में बेफिक्र और नियमित चोरी ने पूरी कर दी। दोनों घटनाओं ने दिखाया कि बेचारे आदर्शवादी हिन्दू को बरसों से केवल उल्लू बनाया गया। विवेकानन्द और शिवाजी केवल फोटो दिखाकर लुभाने, विज्ञापन बेचने के बहाने जैसे थे। भाजपा नेता असल में मामूली कुर्सीपकड़ हैं। यूजीसी गाइडलाइन्स ने बिजली कौंध सी एक झलक में असल चरित्र दिखा दिया। तब से संघ-भाजपा कमांडरी तो कर रहे हैं, पर उन के पीछे से सिपाही चले गये।

इसीलिए जब बार-बार पेपर लीक पर मामूली ‘कॉकरोच’ ने पुकार लगाई, तो उसे अप्रत्याशित सहानुभूति मिली! उसी समय, अयोध्या मंदिर के चढ़ावे की नियमित चोरी की खबर आ‌ई। जिस पर भी ‘चरित्र निर्माण’ कंपनी के ठेकेदार टस से मस नहीं हुए। उसे मामूली बात, या कि अपने संगठन का अधिकार ही समझ लिया।

इन बिन्दुओं पर घटनाक्रम ने वह क्षोभ बढ़ाया जिसे देख कर भी नेता कुछ न समझ सके। अपने द्वारा ही तैयार युवा पीढ़ी से बात करना उन्हें नहीं आया! एक ओर, हिन्दू आदर्शवादियों में निराशा, धक्के, आक्रोश, असहायता का जमा होता जाना — जबकि नेताओं की बेपरवाही और यह अंदाज कि हम कुछ भी करेंगे, पर हमारा कोई कुछ नहीं कर सकता। इस दोहरे रवैये ने क्रमशः असहजता, अस्वीकृति और असंतोष का ढेर जमा कर दिया। उसे बस चिंगारी चाहिए थी। ‘कॉकरोच’ ने वही किया। उस ने हवा को नया रुख दे दिया।

अब भाजपा नेता की विश्वसनीयता बहुत कम हो चुकी है। उन की बातें कोरी गप भर ली जाने लगी हैं। इस में तेरह-चौदह या बीस-बाइस वर्षों का तारतम्य दिखता है — हवाई बातों, नाटकीयता, और‌ गोलपोस्ट बदलते रहने का अटूट सा क्रम। उक्त दो घटनाओं ने नकली बातों और उलटे कामों की लंबी स्मृति जगा दी है।

चाहे, केवल उन्हीं लघुसंख्यक बिखरे पैदल सिपाहियों में, जो चिन्तनीय मुद्दों पर चीखना-चिल्लाना, मौखिक-लिखित बकझक, आदि करते रहते हैं। जिस से लंबे समय में ‘जनमत’ पर कुछ अंतर पड़ता है। वह बौद्धिक तबका वोट नहीं दिला सकता, केवल उस पर कोई सहयोगी परत चढ़ा या उतार सकता है। वह हवा से लड़ता है। इसीलिए, उस के सतत श्रम से हवा पर कुछ असर होता है। चाहे नि:शब्द सा, पर होता है। यह उन बौद्धिकों की भी शक्ति नहीं। वह तो सच्चाई की शक्ति है, जिस का एक अंश भी जब किसी की बातों में हो तो वह धीरे-धीरे कोई असर छोड़ती है।

पर कुर्सीदाँ नेता यह नहीं मानते। उन के पास भौतिक बल होता है — साम, दाम, दंड, भेद, राजकोष, तथा संगठन-पार्टी। फिर, यहाँ तो ‘दुनिया की सब से बड़ी’ पार्टी और संगठन उन की जेब में है। उन के सामने बेचारे इक्के-दुक्के पैदल सिपाहियों की क्या बिसात! सत्ता-सवार नेताओं के माथे में समीकरण अनगिनत और हाथ में संसाधन अपरिमित है। सो, दोनों एक दूसरे की बात भी नहीं समझ सकते।

एक क्षुब्ध है, दूसरा आत्मविश्वासी। इसीलिए, शिक्षा और मंदिर — दोनों में घपले, और इन पर उठी आवाज पर मामूली बयान देने में भी नेताओं को चार हफ्ते लगे। जिम्मेदारी फिर भी नहीं महसूस की। एक मुद्दे पर तो सब से बड़े नेताओं ने अब तक मुँह भी नहीं खोला, जो जिम्मेदारी की दृष्टि से सीधे उन के माथे जाता है — अयोध्या मंदिर में चोरी तथा फूहड़ व्यवस्था।

इन मामलों को हल्के से लेना बड़ी भूल बन सकती है।‌ क्योंकि उन नेताओं की लोकप्रियता का सर्वोच्च क्षण पीछे छूट चुका है। चाहे संघ-भाजपा के वोट में अधिक अंतर न पड़ा हो, पर उन में अब वह चमक नहीं रही। ऊपर से, यह भी बार-बार दिखा कि उन के पास गंभीर अवसरों पर दो-चार सही शब्द तक नहीं होते। विदेशियों को भी ढंग का उत्तर देना भारी लगता है।‌ यह सब छिप जाता, यदि ये भी ‘मौनी बाबा’ होते। किन्तु आप तो बिना जरूरत, लिट्टी-मिट्टी पर भी फिजूल बोलते रहने के शौकीन हैं। तब मंदिर में अकर्मण्यता, और शिक्षा-परीक्षा के कचरे धंधे बन जाने पर चुप्पी का क्या मतलब? जब कि दोनों से असंख्य देशवासियों की भावना जुड़ी‌ है। गहरे दुःख की भावना!

शिक्षा और मंदिर — दोनों हिन्दू हितों के बुनियादी क्षेत्र भी हैं। चाहे अधिकांश हिन्दू नोट नहीं करते कि इन दो विषयों में वे यहाँ हीन दर्जे के नागरिक हैं! बड़े मंदिरों पर सरकारी कब्जा होने के कारण उस की आय का मनमाना दुरुपयोग होता है — जैसे अयोध्या ने भी दिखाया। जबकि मस्जिदें व चर्च राजकीय कब्जे से मुक्त हैं। इसलिए मुस्लिम और क्रिश्चियन अपने शिक्षा संस्थानों और अपने श्रद्धा-स्थलों पर नियंत्रण की दृष्टि से हिन्दुओं से अधिक अधिकार रखते हैं। इस तरह, हिन्दू इन दोनों विषयों में भारत में निम्न दर्जे के नागरिक हैं। वस्तुत:, ऐसे दुःखों को भुनाकर ही संघ-भाजपा सत्ता में आए थे!

पर सत्ता में आकर वे अपेक्षित देंग सियाओ पिंग के बदले अनपेक्षित राज कपूर बनने लगे! यानी नये-नये सपने बेचना। सो, हिन्दू हित उसी तरह घूरे पर फेंके रहे, जैसे पहले थे। भाजपा सत्ताधारी नित नये दिखावे, तमाशे, जुमले, आदि ही लाते, बदलते रहे। जब यह सब भी चुक गया, तब उन का वी.पी. सिंह का बौना रूप सामने आया! इस ने अंततः निर्णायक रूप से दिखा दिया कि संघ-भाजपा नेताओं की लालसा भी बस उतनी ही थी। येन-केन प्रकारेन गद्दी लेना, और फिर जैसे-तैसे उसे पकड़े रहना।

उन का विगत युग में ‘छद्म-सेक्यूलरिज्म’ का नारा केवल हिन्दुओं पर अन्याय का दोहन करने का साधन भर था। सत्ता पाकर वे उस ‘छद्म’ को खत्म करने के बजाए प्रतिद्वंद्वी दल को खत्म करने में लग गये। पहले ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’, और फिर मुस्लिम ‘तृप्तिकरण’ उसी की घोषणाएं थी। उस प्रथम अप्रत्याशित नारे से यह नवीनतम अप्रत्याशित यूजीसी गाइडलाइन्स तक — केवल गोलपोस्ट बदलने, या एक धोखे से दूसरे धोखे तक के झटके रहे हैं।

सो, ‘छद्म सेक्युलरिज्म’ खत्म करने के बदले सत्तासीन भाजपा का केवल एक लक्ष्य दिखा:  कि सत्ता उस के पास रहनी चाहिए। बाकी चाहे कुछ भी रहे या न रहे। शिक्षा-परीक्षा पर घपले, और मंदिर पर कब्जा कर उस में मनमानी की जिद — इन दो घटनाओं ने साधारण लोगों को भी आगे-पीछे बहुत दूर तक कुछ दिखा दिया है। इस के बाद हवा पहले जैसी होनी मुश्किल है।

अतः अब सच्चे बदलाव का समय है। चाहे भाजपा खुद करे, या पवन देवता।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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