नरेंद्र भाई मोदी को क्या पड़ी है कि वे ट्रंप की हर एक शर्त मान कर व्यापार समझौता करने पर तुले हुए हैं? क्या इस के पीछे कोई रहस्य है? क्या ट्रंप के यह कहने में कोई गहरा संदेश छिपा हुआ है कि प्रधानमंत्री मोदी मुझे स्नेह करते हैं, वे मेरे मित्र हैं और इसलिए मैं उन का राजनीतिक भविष्य चौपट नहीं करना चाहता हूं।
आजकल सत्ता पक्ष भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार सौदे का झूम-झूम कर ज़श्न मना रहा है। एक ऐसे सौदे को वह अपनी बड़ी भारी उपलब्धि की तरह पेश कर रहा है, जिस की वज़ह से भारतीय वस्तुओं के अमेरिका को निर्यात पर पहले से पंद्रह फ़ीसदी ज़्यादा तट-कर लगेगा और अमेरिका से भारत आने वाली तक़रीबन सारी चीज़ों पर हम क़रीब-क़रीब षून्य तट-कर वसूलेंगे। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की पिछले कुछ महीनों से लगातार छीछालेदर कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पहले भारतीय वस्तुओं के अमेरिका में आयात पर पच्चीस प्रतिशत तट-कर लगाया और फिर भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद का बहाना ले कर बतौर सज़ा उसे पचास फ़ीसदी कर दिया। रूसी तेल की खरीद बंद कर देने के बाद उन्होंने सज़ा माफ़ कर दी और उसे फिर पच्चीस प्रतिशत कर दिया।
इस के बाद संभावित भारत-अमेरिका व्यापार सौदे को ऐतिहासिक, अभूतपूर्व और तवारीख़ी बताने का ढोल-नगाड़ा पिटना शुरू हुआ और दयालु ट्रंप ने पच्चीस प्रतिशत तट-कर को सात प्रतिशत कम कर के अठारह कर दिया। इस हल्ले में यह तथ्य तिरोहित करने की पूरी कोशिश की गई कि अब तक भारत से अमेरिका को भेजे जाने वाले सामान पर औसत तट-कर महज़ तीन प्रतिशत के आसपास था। सो, दरअसल तट-कर में सात प्रतिशत की कमी नहीं, पंद्रह प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मगर सूरदासों के जत्थे ताली-थाली बजा रहे हैं। यह मसला भी दफ़्न करने की कोशिशें हो रही हैं कि इस सौदे से भारत का कृशि क्षेत्र अमेरिका के लिए जिस तरह खुल जाएगा, वह आगे चल कर किसानों का टेंटुआ मसक देगा।
समूचा स्थूल-बुद्धि मीडिया देशवासियों को यह समझाने में भिड़ गया है कि इस सौदे से किसान तबाह नहीं होंगे, वे तो ख़ुशहाल हो जाएंगे। अपने हाथों में लंबी-लंबी सूचियां ले कर टेलीविजन सूत्रधार और अख़बारी मुदीरे-आला इन दलीलों की बारिश करने में जुटे हुए हैं कि अमेरिका से फ़लां-फ़लां-फ़लां कृषि उत्पाद भारत नहीं आने दिए जाएंगे। मगर वे यह नहीं बता रहे हैं कि आने क्या-क्या दिया जाएगा? यह तथ्य भी बड़ी चतुराई से छुपाया जा रहा है कि भारतीय किसान को अमेरिकी किसान के सामने मुक्त स्पर्धा में झोंकना उसी तरह है, जैसे एक कीकड़ पहलवान को जर्जर लंगोट के साथ किंगकांग के सामने अखाड़े में परोस दिया गया हो।
अमेरिका में तक़रीबन पैंतीस लाख किसान हैं। भारत में पैंतीस करोड़। अमेरिका में एक कृशि जोत डेढ़ सौ से पौने दो सौ हैक्टेयर की है। भारत में एक-सवा हैक्टेयर की। अमेरिका में खेती पूरी तरह यंत्रीकृत है। भारत में किसान अपना बदन ले कर दिन-रात धूप, बारिश और सर्दी में खेत में खटता है। अमेरिका अपने पैंतीस लाख किसानों को सालाना पौने चार-चार लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी देता है। भारत के पैंतीस करोड़ किसानों को केंद्र और राज्य सरकारें मिला कर एक-सवा लाख करोड़ रुपए की सरकारी इमदाद देती हैं। यानी अमेरिका के एक किसान को खेती के लिए सालाना पौने ग्यारह करोड़ रुपए की माली मदद मिलती है और भारत में एक किसान को मिलती है सिर्फ़ साढ़े तीन लाख रुपए की।
ऐसे में होगा क्या? होगा यह कि अमेरिकी सरकार की भारी-भरकम इमदाद के हथियार से लैस वहां के किसान भारत के बाज़ार में बेहद सस्ती दरों पर अपनी उपज के ढेर लगा देंगे। भारतीय उपभोक्ता अमेरिकी उत्पादों पर टूट पड़ेगा। जब हमारे किसानों की उपज महंगी पड़ने के कारण नहीं बिकेगी तो दो-तीन फ़सल-चक्रों के बाद वे उन फ़सलों को उगाना बंद कर देंगे। तब जा कर असली अमेरिकी दंगल शुरू होगा। वे अपनी उपज के दाम बढ़ाते जाएंगे और आगे का भारी मुनाफ़ा सुनिश्चित करते हुए पिछला हिसाब भी बराबर कर लेंगे। तब तक भारत के खेतों में उगने वाली फ़सल का बुनियादी चरित्र पूरी तरह बदल चुका होगा। अपने खेतों को उन का पुराना परिदृश्य लौटाना हमारे लिए नामुमकिन-सा हो जाएगा। आख़िर यही तो अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देशों के साथ किया था। आज वहां की खेती-किसानी पूरी तरह अमेरिकी अनुकंपा के भरोसे है।
मगर हमारी सरकार चाहती है कि हम उस की यह बात आंख मूंद कर मान लें कि मौजूदा भारत-अमेरिका व्यापार समझौता भारतीय किसानों के लिए खरबों रुपए का एक ऐसा बाज़ार खोल रहा है, जिस से वे रातोंरात मालामाल हो जाएंगे। अमेरिका से आ सकने वाले कृषि उत्पादों की संशोधित सूची से दाल और कुछ मसालों को बाहर कर देने पर ट्रंप के राज़ी हो जाने का महोत्सव भी मतांध अनुचर ज़ोर-शोर से मना रहे हैं। मगर वे जानबूझ कर दो बातें नहीं बता रहे हैं। पहली तो यह कि समझौता अभी अंतरिम प्रारूप की स्थिति में है और वह मार्च के मध्य में कभी जा कर अंतिम रूप लेगा। दूसरी यह कि ट्रंप साफ कह चुके हैं कि अंतिम समझौता होने के बाद भी अगर कभी भी उन्हें लगा किसी बिंदु पर वे संतुष्ट नहीं हैं तो उस में रद्दोबदल करने के लिए वे स्वतंत्र हैं।
अब आइए एक और भूमिगत मसले पर। आख़िर ट्रंप यह संदेश देने के लिए इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं कि उन्होंने अपने किसानों की भारतीय बाज़ार में मुक्त आवाजाही का बंदोबस्त कर दिया है और इस से अमेरिका के ग्राम्य जीवन का गुलाबीपन दिन दूनी, रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ने वाला है? ऐसा इसलिए है कि ट्रंप इस वक़्त दुनिया भर में तो हैं ही, अमेरिका में भी अपनी लोकप्रियता की सब से निचली पायदान पर उकड़ूं बैठे हुए हैं और नौ महीने बाद अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, जिन में उन की रिपब्लिकन पार्टी की हार तय दिखाई दे रही है। इन चुनावों में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों के लिए चुनाव होंगे। सीनेट की एक तिहाई सीटों के लिए वोट पड़ेंगे। राज्यपालों और स्थानीय निकायों के लिए भी मतदान होगा। यह ट्रंप सरकार के अब तक के प्रदर्शन पर एक तरह का जनमत संग्रह होगा। अगर इन चुनावों में वे बुरी तरह हारते हैं तो दो साल बाद राष्ट्रपति पद का चुनाव उन की पार्टी का प्रत्याशी नहीं जीत पाएगा।
लेकिन नरेंद्र भाई मोदी को क्या पड़ी है कि वे ट्रंप की हर एक शर्त मान कर व्यापार समझौता करने पर तुले हुए हैं? क्या इस के पीछे कोई रहस्य है? क्या ट्रंप के यह कहने में कोई गहरा संदेश छिपा हुआ है कि प्रधानमंत्री मोदी मुझे स्नेह करते हैं, वे मेरे मित्र हैं और इसलिए मैं उन का राजनीतिक भविष्य चौपट नहीं करना चाहता हूं। ‘युद्ध मैं ने रुकवाया, युद्ध मैं ने रुकवाया’ के आलाप का हम बिना कोई जवाब दिए ट्रंप को शतक बनाने देते हैं। वे कहते हैं कि रूस से तेल लेना बंद करो और हम कर देते हैं। भारतवासियों का सकल-डेटा हम अमेरिका के हवाले करने को तैयार हो जाते हैं। मध्यावधि-बवंडर से ट्रंप को सहेज कर बाहर लाने के लिए हम सब-कुछ करने को तैयार हो रहे हैं तो इस के पीछे कुछ तो होगा? कुछ तो है, जिस की पर्दादारी है! क्या है, सो, आप अंदाज़ लगाइए।


