nayaindia Lok sabha election 2024 बीजेपी के पास ध्रुवीकरण के अलावा
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बीजेपी के पास ध्रुवीकरण के अलावा और कुछ नहीं

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Lok Sabha election 2024
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हालात बदलते दिखने लगे हैं। और सबसे पहले यह उस बीजेपी को दिखना शुरू हुए हैजिसका सबसे बड़ा दांव लगा है।हरियाणा में उसने अपना मुख्यमंत्री बदल दिया है। उससे पहले जिस नागरिकताकानून को ठंडे बस्ते में डाल रखा था उसे अचानक निकाल कर लागू कर दिया। जिन गाली देने वालों को खूब आगे बढ़ाते थे उन रमेश बिधुड़ी, प्रज्ञा सिंहका टिकट काट दिया।

मोदी अपने तीसरे टर्म के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। हालांकि उनके तरकशमें तीर केवल एक ही है। सांप्रदायिक ध्रुविकरण का। उसी को बार बार वह औरचमका कर नुकीला कर के आजमाते हैं। मगर कहते हैं कि हर चीज की एक सीमाहोती है। लगता है कि अब नफरत और विभाजन की राजनीति की एक्सपायरी भी आ गई।

लेकिन मोदी कांग्रेस की तरह जैसे वह 2014 में लड़ने से पहले ही हार मानगई थी हथियार डालने को तैयार नहीं हैं। वे हर दांव आजमाएंगे। हालांकि फिरवही बात की दांव उनके पास ज्यादा हैं नहीं हैं। ले दे कर एक वहीसांप्रदायिकता का कार्ड है। मगर उसे भी वे कितनी भी खराब स्थिति हो जाएउसकी चिंता किए बिना खेलने की पूरी कोशिश करेंगे।सुप्रीम कोर्ट में आई यह हिम्मत की उनके कहने के बाद अगर आज कृष्ण होतेतो सुदामा के वह चावल लेते हुए उन पर आरोप लग जाते सुप्रीम कोर्ट नेस्टेट बैंक को मोहलत देने से न केवल इनकार कर दिया बल्कि फटकार लगा दी।

सब जानते थे सुप्रीम कोर्ट भी कि यह मोहलत स्टेट बैंक नहीं केन्द्र सरकारमांग रही है। मगर इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट न्याय करने पर अड़ गया। यहबदलते वक्त के ही संकेत हैं। थोड़ा बहुत इधर उधर के मामलों में फैसलेदेकर न्याय करने की कहानी बनाना अलग बात है। मगर जिस मामले इलेक्ट्रोरलबांड को बैन करने उसे असंवैधानिक बताने पर खुद प्रधानमंत्री नेप्रतिक्रिया व्यक्त की हो जिसका सीधा मतलब था वे सुप्रीम कोर्ट के फैसलेसे नाराज हैं उस पर आगे और आदेश सुनाना सारे पर्दे हटा देने को कहना बड़ीबात है।

आज की तारीख से पहले तो देश में सुप्रीम कोर्ट बहुत बड़ी ताकत था। मगर जबउसके चीफ जस्टिस रिटायर होकर राज्यसभा लेकर धन्य हो जाते हैं तो आप समझसकते हैं कि न्यायपालिका कहां पहुंच गई। एक समय था जब सुप्रीम कोर्ट तोछोड़िए हाई कोर्ट भी प्रधानमंत्री का चुनाव अवैध घोषित कर देता था। मगरआज हाई कार्ट का जज ( पश्चिम बंगाल के गंगोपाध्याय) अचानक न्याय पीठ सेउठता है और बीजेपी की सदस्यता ले लेता है। ऐसे में उस इलेक्ट्रोरल बांडके मामले में जो देश का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला साबित हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट का दुध का दुध पानी का पानी करने का प्रयास बहुत साहस कीबात है। और जज लोया की संदिग्ध मृत्यु के बाद जो डर के बादल न्यायपालिकापर छा गए थे उसके छंटने की बात है।

परिवर्तन बहुत तेज गति से हो रहे हैं। मोदी जैसे ताकतवर नेता के रहतेपहले हरियाणा के एक वर्तमान लोकसभा सदस्य बृजेन्द्र सिंह और राजस्थान सेलोकसभा सदस्य राहुल कस्वां ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ली। आजके समय में यह हिम्मत की बात है। ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स की टीम कहीं भीपहुंच सकती है। लेकिन हिम्मत आई तो वह वहीं से आई जहां से न्यायपालिकामें आ रही है कि हमेशा तो नहीं रहेंगे। कब तक डरा जाए।

इन्सान के समझौते की, डर की एक सीमा होती है। उससे आगे कोई किसी को नहींझुका सकता। यह अब दिखने लगा है। मगर इसके लिए भी कोई जमीनी माहौल होनाजरूरी होता है। जनता में धीरे धीरे जो परिवर्तन आता है वह उसके बीच जानेपर ही दिखता है। मोदी के पास राजनीतिक नजरें हैं। वे देख पा रहे हैं किउनके चार सौ पार का नारा तीसरे टर्म में आकर यह और उसके बाद आकर यहकरुंगा का असर अब नहीं हो रहा है।

बेरोजगारी बहुत बड़ा सवाल बन गई है। दलित पिछड़े आदिवासी के वोट सेउन्होंने दस साल शासन किया मगर उसकी नौकरियां खत्म कर दीं। सरकारीनौकरियों में भर्ती बंद कर दी। तो सबसे ज्यादा नुकसान आरक्षण वालो काहुआ। दलित पिछड़ा आदिवासी सरकारी नौकरी की दम पर ही आगे बढ़ा है।प्राइवेट में उसे नौकरी मिलती नहीं। राहुल जो यह सवाल बार बार करते है किमीडिया में कितने दलित, पिछड़े, आदिवासी हैं तो इस पर बिफर तो बहुत सारेपत्रकार जाते हैं। मगर जवाब कोई नहीं दे पाता।

प्राइवेट अपना आंकड़ा देता नहीं है। दे तो मालूम पड़ जाए कि अगर सरकारीनौकरी दलित पिछड़े आदिवासी को नहीं मिलती तो आज उसकी नई पीढ़ी जोसांप्रदायिकता का झंडा लिए सबसे आगे दौड़ रही है वह किस हाल में होती।सरकारी नौकरी के आरक्षण ने ही इस वर्ग को मजबूत किया है। मगर जैसा किकांग्रेस ने आंकड़े जारी करते हुए बताया कि तीस लाख सरकारी नौकरियां कहांकहां खाली पड़ी हैं। और उनमें आठ लाख के करीब आरक्षित पद हैं।

मतलब इतनेपदों पर दलित, पिछड़ा आदिवासी आज नौकरी कर रहा होता। लेकिन नौकरियां नहींनिकाले जाने के कारण या तो बेरोजगार है या कोई छोटा मोटा काम करके गुजरकर रहा है। राहुल इसी लिए सरकार बनते ही तीस लाख पदों को तुरंत भरने कावादा कर रहे हैं।

इसी बेरजगारी की समस्या से युवा का ध्यान हटाने के लिए अचानक नागरिकताकानून लागु करने का एलान कर दिया। अब इससे बेरोजगार युवा कितना बहलेगाकहना मुश्किल है। नागरिकता कानून से बेरोजगार को क्या मिलना वाला है यहतो कोई नहीं बता सकता। मगर वह यह कहने लगते हैं  कि हर चीज नौकरी औररोजगार ही नहीं होता।

राष्ट्र को मजबूत करना भी होता है। मोदी कृषि परतीन नए कानून बनाकर, इलेक्ट्रोरल बांड से पैसा बनाकर, नौकरी की भर्तियांन निकलाकर, सेना तक में अग्निवीर के नाम पर ठेका भर्ती करके, हवाई अड्डे,

बंदरगाह, रेल्वे स्टेशन दूसरे सरकारी कल कारखाने प्राइवेट हाथों मेंबेचकर लोगों को बताने की कोशिश करते हैं कि इससे देश मजबूत होगा।

रोज रोज मंहगाई का शोर, नौकरी नहीं है का रोना देश के लिए अच्छी बात नहींहै। हम भविष्य का नक्शा दे रहे हैं। उसे देखो। देश विश्व गुरु बनेगा।नौकरी महंगाई छोटी छोटी चीजों से बाहर निकलो।

कह तो रहे हैं। और है भी क्या कहने को। मगर अन्दर ही अन्दर जान रहे हैंकि भूखे भजन ने होई गोपाला।

दुष्यंत चौटाला हरियाणा में क्यों अलग हुए? हरियाणा में लोकसभा औरराज्यसभा दोनों चुनावों में भाजपा की खराब हालत सबको दिख रही है। बस यहहै कि कांग्रेस राजस्थान जैसी गलती न करे। गुटबाजी पर नियंत्रण करे।

हरियाणा में राजस्थान से ज्यादा खराब हालत हैं। राजस्थान में तो दो हीगुट थे। हरियाणा में जितने नेता उतने गुट। बीजेपी को अगर फायदा मिलेगा तोइसी का मिलेगा। नहीं तो विधानसभा तो वह हार ही रही है। लोकसभा में भी जोदस सीटें हैं हरियाणा में और दसों पर बीजेपी का कब्जा है इस बार आधीबचाना भी उसके लिए मुश्किल है।

मगर वहां हुड्डा, सैलजा, किरण चौधरी,सुरजेवाला, बृजेन्द्र सिंह जो अभी आए हैं इनके पिता वीरेन्द्र सिंह जिनकेआने की संभावना है कितने ही गुट हैं। और एक दूसरे का नुकसान करने के लिएपूरी तरह तैयार। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा हैं तो दूसरी तरफ बाकीजो चार नाम उपर लिखे वे एक साथ मिलकर हुड्डा के खिलाफ हैं।

वहां अगर आप इन नेताओं से पूछो कि आप किसके खिलाफ हैं तो वे तुरंत अपनॉ प्रतिद्वंद्वी गुट का नाम लेते हैं। भाजपा का नहीं। राहुल को बहुत सख्तहोना पड़ेगा। नहीं तो जैसे 2019 में हरियाणा विधानसभा गुटबाजी में हारेथे वैसा ही इस बार भी जनता के साथ होने के बावजूद हो सकता है।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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