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चुनाव में भुलाया जा रहा कोरोना का समय

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क्या जनता बिल्कुल ही सोई हुई है? उसे अपना हित -अनहित कुछ नहीं मालूम? क्या उससे कहोगे कि कोरोना में मरना सीधे मोक्ष प्राप्त करना है और वह मान जाएगी? उससे कहोगे कि 2047 में आज से 23 साल बाद तुम्हें यह देंगे, वहदेंगे और वह मान जाएगी?प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो यही समझ रहे हैं। इसलिए अभी जो उन्होंने अपना घोषणा पत्र जारी किया उसमें नौकरी, महंगाई, सरकारी शिक्षा देने,सरकारी चिकित्सा की कोई बात नहीं की। केवल 2047 के सपने दिखाए हैं।

लोगों को शायद ही याद हो लेकिन ध्यान रहे कोरोना के न भूले जाने वाले भयानक समय के बाद का यह पहला लोकसभा चुनाव है।क्या जनता को कोरोना की बेबसी याद है? होनी चाहिए। हजारों लोग बेमौत मरेथे। कोई दवा नहीं, आक्सीजन नहीं, अस्पताल में बेड नहीं और मर जाओ तोश्मशान में जगह नहीं!

तब सरकार ने सब दोष जनता पर डाल दिया था। यह ऐसी है! वैसी है! यह कर रही है,वह नहीं कर रही। मध्य प्रदेश भाजपा के नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा थाइन्दौर में जनता के एक वर्ग ने ताली थाली नहीं बजाई इसलिए कोरोना यहांज्यादा फैला।

सरकार ने सारा दोष सिस्टम पर रख दिया था। सिस्टम मतलब नियति! मीडिया इसीका ढोल पीटने लगा था। मीडिया में भी बहुत मौतें हुई। तमाम पत्रकार,कैमरामेन, फोटोग्राफर बिना इलाज के चले गए। किसी को आक्सीजन सिलेन्डरनहीं मिला तो किसी को वह उस समय का जीवनदायी इंजेक्शन रेमडेसिविर, तोकिसी को अस्पताल में बेड। नौकरी करते हुए। फील्ड में घुमते हुए कोरोना केशिकार हुए। मगर मालूम पड़ते ही मीडिया संस्थानों ने हाथ खिंच लिए। अपनाइलाज खुद कराओ। लोगों को बड़ी तादाद में नौकरी से निकाला गया।

मीडिया को भी याद नहीं। तभी तो कोई डिबेट, कोई खबर नहीं कि उस समय के बाद का यहपहला चुनाव है। क्या कोई उस दौर का प्रभाव है?  यही लिख दे कोई कि मोदीसरकार ने कोरोना में जनता की बहुत मदद की इसलिए उस कारण भी उन्हें वोटमिलेंगे!

दरअसल भूलना चाहते हैं सरकार, मीडिया दोनों। मगर क्या जनता भी भूल गई? ऐसा हैनहीं। कौना सा घर ऐसा था जो इसकी मार से बचा है। कहीं कोई मरा। कहीं कोईलाखों प्राइवेट अस्पताल को देकर बरबाद होकर बड़ी मुश्किल से घर वापसपहुंचा। किसी की नौकरी गई। तो कई घरों में लाकडाउन से तहस नहस हुई आर्थिक स्थिति के बाद आत्महत्याएं हुईं।

बरबादी का यातना का वह ऐसा आलम था कि कोई भूल नहीं सकता। और कुछ भूल भीजाता अगर उसके बाद सरकारी चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करने पर सरकारध्यान देती। सरकार तो ताली थाली की वर्षगांठ मनाकर यह बता रही थी कि साराचमत्कार इसने किया है।

रामदेव ने उसी समय देश के साथ सबसे बड़ा धोखा किया था। कोरोना की दवाई बेचकर। दो केन्द्रीय मंत्री जिनमें एक डॉ हर्षवर्द्धन जो केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री थे और दूसरे गडकरी उसकी लांचिग में शामिल हुए थे। और उसके बाद जब मेडिकल एसोसिएशन ने इस दवा कोरोनिल पर सवाल उठाए तो रामदेवने डाक्टर टर्र टर्र कहकर उनका उपहास उड़ाया।

लेकिन कहते हैं कि हर झूठ बेइमानी की एक सीमा होती है। तो रामदेव के मामले में तो वह आ गई। अब वे सुप्रीम कोर्ट से माफी माफी मांग रहे हैं। मगर सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि नहीं। उन पर कार्रवाई होगी। कानून के शासन के लिए यह अच्छी बात है। साथ ही उन सारे लोगों के लिए भी एक चेतावनी है जो सोचते हैं कि उनका झूठ, लोगों को भरमाना हमेशा चलता रहेगा।

क्या जनता बिल्कुल ही सोई हुई है? उसे अपना हित -अनहित कुछ नहीं मालूम? क्या उससे कहोगे कि कोरोना में मरना सीधे मोक्ष प्राप्त करना है और वह मानजाएगी? उससे कहोगे कि 2047 में आज से 23 साल बाद तुम्हें यह देंगे, वहदेंगे और वह मान जाएगी?प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो यही समझ रहे हैं। इसलिए अभी जो उन्होंनेअपना घोषणा पत्र जारी किया उसमें नौकरी, महंगाई, सरकारी शिक्षा देने,सरकारी चिकित्सा की कोई बात नहीं की। केवल 2047 के सपने दिखाए हैं।

सपने आदमी को वही अच्छे लगते हैं जो उसके जिंदा रहते पूरे हो जाएं। 23 साल बाद के सपने आज के युवा के लिए क्या मतलब रखते हैं? नौकरी, शादी, माता-पिता की सेवा वह अभी करना चाहता है। 2047 में बूढ़े हो जाने के बाद वहक्या करेगा?

मगर मोदी जी को खुद पर विश्वास है। वे पूरे चुनाव में भी और घोषणा पत्रमें भी मैं मैं ही बोल रहे हैं। हर जगह केवल मोदी मोदी है। घोषणा पत्रमें गारंटी भी मोदी की है। भाजपा की नहीं। उन्हें अपने उपर विश्वास हीइतना है। दस साल से वे सत्ता में हैं। मगर क्या किया इसकी बात नहीं करतेहैं। बात करते हैं। 2047 की। जनता के पेशेंस का बहुत बड़ा इम्तहान!

देखते हैं जनता क्या करती है। अभी दो दिन बाद ही पहले चरण का मतदान है।बुधवार की शाम छह बजे चुनाव प्रचार खत्म हो जाएगा। 19 अप्रैल को 102 सीटों पर मतदान हो जाएगा। यह सीटें दक्षिण से उत्तर पूर्व, पश्चिम, मध्य भारतऔर सुदुर उत्तर तक फैली हुई हैं। मतलब पहले चरण से ही पूरे भारत कीतस्वीर साफ होना शुरू हो जाएगी। 21 राज्यों में मतदान है।

अगर मोदी जी जीतेंगे तो देश एक नए दौर में चला जाएगा। जिसके बारे मेंकिसी को अभी कोई कल्पना भी नहीं है। क्या हो सकता है। यह कुछ तो हम अभीबता सकते हैं। सबसे पहले तो भाजपा के जो दो चार नेता अभी भी थोड़ा बहुतदिख रहे हैं। वे सब अडवानी, उमा भारती, विनय कटियार, मुरली मनोहर जोशी,प्रवीण तोगड़िया की तरह अतीत के तहखाने में फेंक दिए जाएंगे। राजनाथ सिंह इसको समझ रहे हैं इसलिए ज्यादा से ज्यादा बोलकर भक्ति दिखाने की कोशिश कररहे हैं।

और ऐसा हो भी क्यों ना! अगर मोदी जीतते है तो जैसा लिखा मोदी जी हीजीतेंगे। कोई भाजपा कोई संघ नहीं। किसी नेता का कोई योगदान नहीं। और फिरजब मोदी जी जीतेंगे तो सब उनके हिसाब से ही होगा। पूरी नई टीम आ जाएगी।खैर यह तो हुई भाजपा की बात। जो इन दिनों भाजपा नेताओं में ही चल रही है।

बाकी देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह देखना होगा। जनता को कुछ मिलेगा इसमेंपूरा संदेह है। जनता अगर जीताती है मोदी जी को वह यह सोचकर ही जिताएगी किकोरोना उपर वाले की देन थी। मोदी जी कर ही क्या सकते थे। बाकी ताली थालीतो उन्होंने बजवाई ही। लाइट मोमबत्ती भी जलवाई। और अब 2047 में देश कोविकसित करने की गारंटी भी दे रहे हैं। तो जनता को इसी हाल में रहने कीआदत पड़ जाएगी।

बाकी लोकंतत्र जैसे इश्यू का कोई महत्व रह नहीं जाएगा। कांग्रेस कितनाबचेगी कहना मुश्किल है। एक राहुल हैं, जिनके बारे में गारंटी देकर कहा जासकता है कि उन्हें मोदी जी नहीं तोड़ पाएंगे। बाकी कौन कांग्रेसी कितनी हिम्मत रख पाता है कहना मुश्किल है।

लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कि अगर जनताके मन में कोरोना की कसक है, युवाओं को बेरोजगारी सता रही है, महंगाई नेगरीब, मध्यमवर्ग सबकी कमर तोड़ दी है, प्राइवेट स्कूलों की फीसों,युनिफार्म और दूसरे खर्चों ने नाक में दम कर दिया है, प्राइवेट डाक्टर,अस्पताल लूट के अड्डे बन गए हैं और दस साल बाद फिर 23 साल बाद के सपनेदेखने की ताकत आंखों में नहीं बची है तो एक पुराना भारत, हंसतामुस्कराता, एक दूसरे की मदद करता, काम करता, झूठ प्रपंच से बचता वापसआपके पास है।

संभावनाएं दोनों हैं। एक मोदी का भारत, जो दरअसल मोदी का नहीं है, बल्किएक उस अहंकारी विचार का है जो दुनिया में अलग अलग समयों पर कई बार आता हैकि अहं ब्रह्मास्मि! मैं कुछ भी कर सकता हूं। वह कुछ और समय चल जाए।या देश की जनता का भारत। जो हमेशा से रहा है। खुशहाल, आगे बढ़ता हुआ, एकदूसरे को समझता हुआ। या बहुत ज्यादा स्पष्ट शब्दों में जहां आजादी के बादसे विपक्ष में रहने के बावजूद भाजपा के नेताओं का भी बहुत सम्मान और जलवारहा। आज दस साल से उनकी सरकार है। मगर वे यह नहीं कह सकते कि हमारी सरकारहै। उन्हें यही कहना पड़ता है कि मोदी जी की सरकार है।

खैर वह तो है मगर उसमें उनकी हैसियत क्या है वह उनका दिल ही जानता है।भाजपा के नेताओं के हनक की वापसी भी इसी पर टिकी है कि जनता क्या करती है।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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