यह मंदिर ही नहीं, सत्ता भी चलाने की अयोग्यता का अधिक बड़ा संकेत है। वैयक्तिक ईमानदारी इस की कैफियत नहीं हो सकती। उस से कई गुणा अधिक महत्वपूर्ण समाज की सुरक्षा, न्याय, और सुव्यवस्था कायम करना है। शासक का मूल्यांकन इतिहास इसी से करता है — न कि वह खुद कैसा था।…. वे राजनीतिक काम के लिए अयोग्य दिखते हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक उन के नेता कार्यकर्ता असल कसौटी पर ढीले हैं। राम मंदिर का कचरा करना इस का उदाहरण भर है। अब वे इसे मामूली दिखाकर रफा-दफा की प्रतीक्षा करते लग रहे हैं।
“मंदिर में चोरी आप कीजिए, और हिन्दू धर्म के विरुद्ध षड्यंत्र कोई और कर रहा है!” — यह प्रतिक्रिया एक नागरिक ने टीवी पर आर.एस.एस. (संघ) नेताओं के बयान सुन कर दी। वह साधारण गृहस्थ है। पर हफ्तों से जो खबरें आ रही हैं, उस से बनी भावना उस ने व्यक्त की।
सचमुच, अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट — जो संघ नेताओं के हाथ में है, उस के चढ़ावे में नियमित चोरी की बात पर उन की महीने भर चुप्पी से गलत संदेश गया। अंततः मुँह खोला भी तो ऐसे निर्विकार, मानो उन की कोई जिम्मेदारी नहीं और अनाम लोग ‘हिन्दू धर्म को बदनाम’ कर रहे हैं!
महीने भर सोच कर यह कहना भोलेपन की पराकाष्ठा है। उन्होंने यह सीधी बात भी न देखी कि अयोध्या में देश भर के हिन्दू रोज आते हैं। संघ के दशकों पुराने नेताओं के ऐसे चरित्र और नकारेपन की खबर देश-विदेश हर हिन्दू घर तक पहुँचेगी। चरित्र यह कि उन की देखरेख में ऐसे घृणित अपराध की बात सामने आने पर भी जिम्मेदार ट्रस्टियों ने इस्तीफा तक नहीं दिया! मानो, कुछ भी हो जाए, उन का पद पर बना रहना तो शाश्वत है!
फिर नकारापन तो बहुस्तरीय है। एक तो उन के होते चोरी नियमित चलना। बल्कि इस में भी कि यदि अपने लिए या शागिर्दों को धन-सुख प्रदान करने की भी चाह थी तो केंद्र, राज्य की पूरी सत्ता समेत सब कुछ हाथ में लेकर भी वे इस का कोई वैध, शालीन रूप खोजना नहीं जानते?
यह मंदिर ही नहीं, सत्ता भी चलाने की अयोग्यता का अधिक बड़ा संकेत है। वैयक्तिक ईमानदारी इस की कैफियत नहीं हो सकती। उस से कई गुणा अधिक महत्वपूर्ण समाज की सुरक्षा, न्याय, और सुव्यवस्था कायम करना है। शासक का मूल्यांकन इतिहास इसी से करता है — न कि वह खुद कैसा था। यह बात साइरस द ग्रेट, मार्कस ऑरेलियस, सम्राट अशोक, मेजी से लेकर आज के ली क्वान यू तक महत्वहीन है। इसलिए संघी हिन्दुओं का इसी पर जोर देना नासमझी है। इस से वे राजनीतिक काम के लिए अयोग्य दिखते हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक उन के नेता कार्यकर्ता असल कसौटी पर ढीले हैं। राम मंदिर का कचरा करना इस का उदाहरण भर है। अब वे इसे मामूली दिखाकर रफा-दफा की प्रतीक्षा करते लग रहे हैं।
किन्तु यह दाग उन पर भारी पड़ सकता है। क्योंकि यह बरसों की अन्य विफलताओं, उलटे कामों, विचित्र बयानों, रंग बदलती नीतियों, और भारत की प्रतिष्ठा घटने के क्रम में नवीनतम है। हर कहीं सत्ताधारियों के अच्छे कामों से अधिक बुरे कामों की चर्चा फैलती है। कई बातों से संघ-परिवार की छवि हल्की हुई है। पहले वे सदैव ‘चरित्र निर्माण’ का दावा करते रहे थे। पर सत्ता लेने के बाद उन का अंदाज कुछ और ही दिखा है।
उन के कर्णधार सुप्रीम कोर्ट में आधिकारिक रूप कहला चुके हैं (11 अप्रैल 2019) कि — ‘‘लोगों को जानने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक दलों को कहाँ से चंदा मिल रहा है’’; ‘‘समय की सच्चाई को देखते हुए विचार करना चाहिए’’; तथा ‘‘पारदर्शिता को कोई मंत्र नहीं बनाना चाहिए’’। यह तीनों बातें भारत सरकार कार्यपालिका की ऑफिशियल दलील है! तदनुरूप, संघ नेताओं को इतनी बढ़िया दलील सूझी ही नहीं कि कहें — “दान का पैसा कहाँ जा रहा है, यह किसी को जानने की क्या जरूरत है! हमारे संन्यासियों, तपस्वियों पर भरोसा रखिए।” बात खत्म।
सो ऐसी मानसिकता के नेताओं के दौर में राम मंदिर की घटना अपवाद नहीं लगनी चाहिए। शासन में या मंदिर में, संघ के प्रशिक्षित वरिष्ठतम लोग ही हैं। अतः उन का बुद्धि-विवेक, दर्शन-चिंतन एक सा है। विशेषकर जिम्मेदारी और पारदर्शिता संबंधी। वैसे भी, राम मंदिर की घिचपिच गतिविधियों में संगठन, पार्टी, व सरकार सभी भागीदार हैं। हर जगह संघ-परिवार के नेता ही सिरमौर हैं।
ऐसी स्थिति में केवल दूसरों को कोस कर राम मंदिर के कलंक से बचना कठिन है। भ्रष्टाचार से अधिक यह संघ-भाजपा की अयोग्यता दिखाता है कि वे ऐसे इकलौते महत्व के स्थान को भी चलाने में अक्षम हैं। इस बात की गंभीरता तक से अबोध हैं!
उन के पूर्ण नियंत्रण में एक विशिष्ट मंदिर में नियमित जैसी चोरी, और बात खुलने पर ऐसी उदासीनता ने काफी हिन्दुओं को अंदर तक दु:खी किया। वे मूक हैं, उन का कोई प्रवक्ता नहीं। पर वे संवेदनशील हैं। यह देख सकते हैं कि दूसरों का श्रेय भी हड़पने के आदी नेता अपनी प्रत्यक्ष करनी झुठलाने की जिद में हैं।
बल्कि सुप्रीम कोर्ट जजमेंट (नवंबर 2019) के बाद, फौरन अयोध्या का श्रेय झपटने, और दशकों से लगे विविध लोगों को परे कर, उस के उदघाटन में अकेले बैठ, टीवी द्वारा प्रचार, फिर मंदिर की फोटो घर-घर फैलाकर वोट समेटने की खुली राजनीति करने वाले नेताओं का कोई बयान अभी तक नहीं आया! जबकि इसी बीच वे तरह-तरह के वक्तव्य देते रहे हैं।
आए दिन बेकार की बातें हर कहीं पहुँचाने के हठी नेता गंभीर घटनाओं पर मुँह सी लेते हैं, जहाँ प्रतिक्रिया अपेक्षित हो। नेता चाहे संघ के हों या भाजपा के। चाहे मामला देसी हो या वैदेशिक। वे चुप रह कर उस के ठंढे होने का इंतजार करते हैं। यह प्रवृत्ति भी उन के क्लूलेस होने तथा जिम्मेदारी से कतराने का ही उदाहरण है। ऐसा बार-बार देख कर अंततः मामूली लोग भी असलियत समझ लेते हैं। तब प्रोपेगंडा छिपा नहीं पाता कि राजा की पोशाक उधार की है। उस की चतुराई, निष्ठा, और कुशलता वह नहीं जो प्रचारित होती रही है।
पर कोई सत्ता तमाम प्रोपेगंडा के बावजूद जनमत को सदैव अनुकूल रखने में सफल नहीं होती। फिर अयोध्या तो संघ-परिवार की राजनीति, और उस के सत्ता शीर्ष पर पहुँचने से जुड़ा हुआ है। वह कोई मामूली स्थान नहीं, जहाँ ऐसी भूल और उपेक्षा आई-गई हो जाए। यह एक मानसिकता दिखाता है। फॉर-ग्रांटेड लेने की भावना कि हम कुछ भी करें, हमारा कोई विकल्प नहीं!
किन्तु जनमत की हवा कब, किस घटना से करवट लेने लगे यह कोई नरेटिव-मैनेजर तय नहीं कर सकता। कोई छोटी घटना भी पिछली घटनाओं की पूरी श्रृंखला को विशेष अर्थ दे देती है। तब सत्ता की छवि अनायास बदलने लगती है। फिर उसे नियंत्रित करने का प्रयास बेकार होने लगता है।
अभी संघ परिवार की चुप्पी, बयान, और जिद — तीनों उसी दिशा में है। वे अपने लोगों की भूल, दुर्बलता, और जिम्मेदारी पर केंद्रित रह कर कुछ बोलते और करते तो अधिक भरोसेमंद होता। पर वे खुद ही पुलिस, खुद वकील, खुद हाकिम होने की जिद पर अड़े हैं। जबकि दरअसल अभियुक्त हैं! अयोध्या से लेकर दिल्ली तक जिम्मेदारी और भूल उन की है। न विरोधी दल, न मीडिया, न वामपंथियों, इस्लामियों या मिशनरियों की।
अतः इस कांड में दूसरों पर ‘हिन्दू धर्म के विरुद्ध षड्यंत्र’ का आरोप लगाने से उन के बयान बोगस बन गए। चाहे अपने नेताओं को बचाने की मंशा या अयोग्यता से, यही लगेगा कि अयोध्या में राम मंदिर गलत हाथों में रहा है।
इसे गत दशकों की गतिविधियों से जोड़ कर देखा जाएगा। न केवल मंदिर का दलीय लाभ के लिए दुरुपयोग, बल्कि भ्रष्टाचार भी। पहले भी उन के नेताओं पर राम मंदिर में दान की रकम उड़ाते रहने के आरोप लगे थे। वह आरोप राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी बाबा लाल दास ने लगाये थे (इंडियन एक्सप्रेस, 8 सितंबर 1991)।
अतः मूल प्रश्न यह बनता है कि अनुपयुक्त लोगों को बड़े-बड़े स्थान, चाहे सामाजिक अथवा राजनीतिक, देना नीति है नासमझी? हिन्दू नासमझी या संघी नासमझी, जो कहें। आखिर संघ में विवेकशील, चरित्रवान, तथा युवतर लोग भी हैं। वैसे लोग क्यों सदैव किनारे दिखते हैं? पार्टी या संगठन, शासन या शिक्षा-संस्कृति, यह दृश्य बरबस दिखता है। हर कहीं बड़बोले, बेढंगे और संदिग्ध किस्म के ही नेता क्यों बढ़े हैं? यह सवाल दरकिनार कर दूसरों पर आरोप लगाने से कई समर्थक भी चिढ़ेंगे। जो काम अपने घर की सफाई का है, उस में भी दूसरों की निन्दा अपनी जबावदेही से भागना है।
संघ-परिवार को लोगों को अपनी जेब में नहीं समझना चाहिए। पिछले शासकों के प्रति बढ़े असंतोष की प्रतिक्रिया में उन्हें सत्ता मिली थी। यदि वही असंतोष वर्तमान के प्रति बढ़ने लगे, तो उसी तरह बिना कुछ किए दूसरों को भी सत्ता मिल सकती है। यह कई बार हुआ है। संघ-परिवार नेता इस थ्योरी पर चल रहे हैं कि आगे ऐसा न होने का उन्होंने चौतरफा प्रबंध कर लिया है। यह सही लगता भी है। उन्हें कहीं से चुनौती देता मोर्चा नहीं दिखता।
परन्तु राजनीति में एक एक्स फैक्टर भी होता है। वह कब किस प्रबंध को विफल कर दे, कहना कठिन है। क्योंकि मनुष्य चेतन और चंचल प्राणी है। पूरी तरह ढोर-डंगर नहीं कि उसे जैसे चाहें, वैसे सदा हाँक लिया जाए। लोकतंत्र में यह चतुराई से करना होता है ताकि लोगों को महसूस न हो कि उन्हें चराया जा रहा है।
इसी बिन्दु पर संघ-परिवार अधिक बौड़म या दुस्साहसी लगता है। वे अपने प्रचार, समीकरण, और मैनेजमेंट पर अतिशय विश्वास कर रहे हैं। तभी सदा एक से आरोप, अंदाज, और तिकड़म से काम निकलने की आशा करते हैं।
उन्हें अपनी चतुराई पर भरोसा है। पर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कुछ भी पूर्वनिर्धारित मानना जोखिम भरा है। यद्यपि संघ महानुभावों को कुछ कहना हजार वाट के बल्व को दिया दिखाने जैसा है। फिर भी, ध्यान रहे, जो नाली घर से गंदा पानी बाहर निकालने को बनाई जाती है, उसी नाली से भारी बरसात में बाहर का गंदा पानी अंदर घुस जाता है।
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