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गणतंत्र का मालिक कौन?

अब लोकतंत्र बंदूक से कम, कारोबार से ज्यादा बदला जाता है। सत्ता पर कब्जा करने से पहले संस्थाओं की नीलामी शुरू हो जाती है। संविधान बाहर से वैसा ही दिखता है, लेकिन भीतर उसकी आत्मा धीरे धीरे निजी नियंत्रण में चली जाती है। यहीं से गणतंत्र और निजी साम्राज्य के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

अमेरिका की आजादी की ढाई सौवीं वर्षगांठ के समारोह में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भाषण आधी रात के बाद शुरू हुआ। वॉशिंगटन में तूफान, असहनीय गर्मी, रद्द हुए फ्लाईओवर, खाली कराया गया नेशनल मॉल और फिर लोगों को रात ग्यारह बजे दोबारा लौटने का आग्रह—इन सबने कार्यक्रम को देर तक टाल दिया। जब ट्रंप मंच पर आए तो उनके चेहरे पर वही सहज आत्मविश्वास था, जैसा किसी ऐसे विद्यार्थी का होता है जिसे पहले से पता हो कि उसके पूरे अंक आने वाले हैं।

उन्होंने कहा, “अमेरिका मानव इतिहास की सर्वोच्च उपलब्धि है।” फिर जोड़ा, “यह तो केवल स्वर्ण युग की शुरुआत है।” उन्होंने वादा किया कि अमेरिका और बड़ा होगा, और बेहतर होगा, और अधिक शक्तिशाली होगा। उन्होंने पुराने झंडे दिखाए। दावा किया कि उनमें से एक अब्राहम लिंकन के ताबूत पर रखा गया था। मंच पर बैठे सैनिकों और पूर्व सैनिकों का सम्मान किया। अंतरिक्ष यात्रियों को सलाम किया।

फिर उसी सांस में संस्थापक पिताओं, संविधान, साम्यवाद को “कैंसर” बताने और डाक से मतदान की व्यवस्था खत्म करने की बात भी कर डाली। अंत में ऐसी आतिशबाजी हुई जिसका लक्ष्य विश्व रिकॉर्ड बनाना था।

इन वाक्यों में कुछ नया नहीं था। उलटे, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे बहुत परिचित लगे। मगर इसी परिचितपन में असली समस्या छिपी थी। यह किसी ऐसे व्यक्ति की भाषा नहीं थी जो गणतंत्र के अर्थ पर विचार कर रहा हो। यह ऐसे व्यक्ति की भाषा थी जो गणतंत्र बेच रहा था।

“और बड़ा, और बेहतर, और मजबूत” किसी संविधान की भाषा नहीं होती। यह किसी विज्ञापन पुस्तिका की भाषा होती है। “स्वर्ण युग” इतिहासकार का निष्कर्ष नहीं, नीलामी करने वाले की पुकार होती है। ऐसे दावे से बहस नहीं की जा सकती। किसी बिक्री अभियान से तर्क नहीं किया जाता। या तो उसे खरीदा जाता है, या ठुकरा दिया जाता है।

भीड़ ने उसे ठुकराया नहीं। उसने तालियां बजाईं। पुराने झंडे पर भी, पराजित दुश्मनों की कथा पर भी, स्वर्ण युग के वादे पर भी। फिर घर लौट गई। उस रात क्या खरीदा गया, यह तुरंत दिखाई नहीं देता। उसका असर बाद में समझ आता है।

क्योंकि मंच के बीच खड़ा व्यक्ति गणतंत्र का निर्माता नहीं था। वह उसका सौदागर था।

वह ऐसे आदमी की तरह दिखाई देता है जिसे अचानक पता चल गया हो कि एक विशाल पुराना घर बिना पहरे के पड़ा है। उसमें वर्षों से जमा कानून हैं, संस्थाएं हैं, परंपराएं हैं, विश्वास है। नकदी का काउंटर खुला है। माल की सूची सामने रखी है। जिसे चाहो बेच दो, जिसे चाहो गिरवी रख दो।

वह पुनर्निर्माण की बात करता है, खोई हुई महानता की बात करता है, लेकिन संस्थाओं के भीतर ऐसे चलता है जैसे कोई दुकानदार दुकान बंद होने से पहले अंतिम सेल लगा रहा हो। जो चीज कभी सबकी साझा संपत्ति थी, वह धीरे-धीरे निजी लाभ में बदलने लगती है।

यह जंगल का शिकारी नहीं है। जंगल के अपने नियम होते हैं। वहां क्षेत्र, उत्तराधिकार और संतुलन होता है। यह बाजार का शिकारी है। ऊंची आवाज वाला, तमाशा पैदा करने वाला, करिश्माई और उस समय के लिए बिल्कुल उपयुक्त जब समाज नागरिकता के कठिन अनुशासन से ऊब चुका हो।

ऐसे नेता सबसे पहले उपनिवेशवाद से निकले नए देशों में दिखाई दिए। वे इतिहास के अपमानों का हिसाब चुकाने का वादा करते हुए सत्ता में आए। मगर कुछ वर्षों बाद राज्य को अपने परिवार की संपत्ति की तरह चलाने लगे।

अदालतें बाधा बन गईं। नौकरशाही, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थागत स्मृति थी, बोझ लगने लगी। नियुक्तियां योग्यता नहीं, कृपा का विषय बन गईं। हस्ताक्षर सरकारी निर्णय कम और निजी लाभांश अधिक लगने लगे। भाषणों में जनहित बना रहा, लेकिन व्यवहार में सत्ता का धीरे-धीरे निजीकरण शुरू हो गया।

पहले राष्ट्रीय संप्रभुता के नाम पर शोर मचता है। बाद में सार्वजनिक जीवन चुपचाप निजी संपत्ति में बदलने लगता है।

अमेरिका को अलग माना जाता था। उसका संविधान जानबूझकर जटिल बनाया गया था। शक्तियों का विभाजन, परस्पर नियंत्रण, स्वतंत्र एजेंसियां और ऐसी स्थायी सिविल सेवा, जो किसी भी राष्ट्रपति से अधिक लंबी उम्र रखे। विचार यह था कि व्यक्ति बदल सकता है, लेकिन व्यवस्था नहीं।

लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक वही पुराना खतरा वहां भी दिखाई देने लगा।

एक ऐसा राष्ट्रपति, जिसने व्हाइट हाउस को भी अपनी कारोबारी दुनिया की तरह देखना शुरू किया। उसने अत्यंत जटिल लोकतांत्रिक व्यवस्था को ऐसी चलती हुई कंपनी की तरह माना, जिसमें लाभ निजी हो सकते हैं और नुकसान समाज पर डाले जा सकते हैं।

जब राष्ट्रपति परिवार से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधियों की आय पुराने सभी मानकों से कहीं ऊपर पहुंचने लगे, और उन्हीं के समानांतर तकनीकी निर्यात, नियामकीय फैसलों और सरकारी नीतियों में ऐसे बदलाव दिखाई दें जिनसे उन्हीं हितों को लाभ मिले, तब व्यक्ति और पद के बीच की दूरी सिकुड़ने लगती है।

लोकतंत्र पर किसी टैंक ने हमला नहीं किया। संविधान को किसी ने निलंबित नहीं किया। चुनाव भी होते रहे। लेकिन गणतंत्र का किराये पर उठना शुरू हो गया—टुकड़ा टुकड़ा, कभी सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को, कभी सबसे वफादार समर्थक को। यही आधुनिक लोकतंत्र का नया संकट है। अब लोकतंत्र बंदूक से कम, कारोबार से ज्यादा बदला जाता है। सत्ता पर कब्जा करने से पहले संस्थाओं की नीलामी शुरू हो जाती है। संविधान बाहर से वैसा ही दिखता है, लेकिन भीतर उसकी आत्मा धीरे धीरे निजी नियंत्रण में चली जाती है। यहीं से गणतंत्र और निजी साम्राज्य के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

भारत की कहानी अलग है। लेकिन उसका रास्ता पूरी तरह अपरिचित नहीं। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्य स्वयं पुनर्निर्माण की एक परियोजना था। विभाजन की त्रासदी, औपनिवेशिक शासन की विरासत और व्यापक निर्धनता के बीच नई संस्थाएं खड़ी की गईं। शुरुआती नेताओं ने संस्थाओं की भाषा बोली, भले ही कई बार उन्हें अपनी राजनीतिक जरूरतों के अनुसार मोड़ा भी। समय बीतने के साथ राजनीति की एक दूसरी शैली उभरने लगी। नेता कथा का भी केंद्र बन गया और निर्णय का भी। वह संसद, दल और संस्थागत विमर्श के बजाय सीधे जनता से संवाद करने लगा। प्रक्रियाएं उसे बोझ लगने लगीं और संस्थागत स्वतंत्रता निर्णय क्षमता में बाधा दिखाई देने लगी।

धीरे धीरे प्रशासन भी उसी दिशा में ढलता गया। तबादले केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रहे। पदोन्नति केवल योग्यता का पुरस्कार नहीं रही। वैचारिक निष्ठा भी प्रशासनिक मूल्यांकन का हिस्सा बनने लगी। नागरिकता, मीडिया, विश्वविद्यालयों और जांच एजेंसियों से जुड़े कानून तथा व्यवस्थाएं ऐसी बनाई गईं कि संस्थागत प्रतिरोध कम होता जाए। अदालतें जब असहमति प्रकट करतीं तो उन पर लोकप्रिय जनादेश के रास्ते में खड़े होने का आरोप लगाया जाता।

यह किसी सैन्य तख्तापलट जैसा दृश्य नहीं था। संस्थाएं अचानक नहीं टूटीं। वे बाहर से पहले जैसी ही दिखती रहीं। संसद बैठती रही। अदालतें चलती रहीं। नौकरशाही काम करती रही। लेकिन भीतर उनका स्वायत्त चरित्र धीरे धीरे क्षीण होने लगा। लोकतंत्र का ढांचा बचा रहा, इसलिए उसके क्षरण को पहचानना भी कठिन हो गया।

जो शक्ति और निर्णायक नेतृत्व दिखाई देता था, वह अक्सर संस्थागत स्मृति की जगह व्यक्तिगत आदेश के स्थापित होने की प्रक्रिया होती थी। राज्य की निरंतरता व्यक्ति की लोकप्रियता पर निर्भर होने लगी।

ऐसे नेताओं के आसपास इकट्ठा होने वाले लोग प्रायः विचारधारा से प्रेरित नहीं होते। उन्हें उपयोगिता जोड़ती है। वॉशिंगटन में वे वकील हैं जो पुराने कानूनों में नए अर्थ खोज लेते हैं। वे सलाहकार हैं जो निजी शिकायतों को कार्यपालिका के आदेश में बदल देते हैं। वे कारोबारी सहयोगी हैं जिनके उद्यम सरकारी नीतियों की छाया में फलते फूलते हैं।

नई दिल्ली में वही भूमिका दूसरे लोग निभाते हैं। ऐसे नौकरशाह जो जल्दी समझ जाते हैं कि सत्ता की नई भाषा क्या है। ऐसे मीडिया स्वामी जो पहुंच के बदले अनुकूल कवरेज का सौदा करते हैं। ऐसे ठेकेदार और मध्यस्थ जिनके लिए सत्ता से निकटता ही सबसे बड़ी पूंजी है। वे किसी विचार के प्रति नहीं, अवसर के प्रति निष्ठावान होते हैं। सत्ता का केंद्र बदलता है तो उनकी निष्ठा भी बदल जाती है।

उनका सबसे बड़ा कौशल यह है कि जो कभी अस्वीकार्य माना जाता था, उसे धीरे धीरे सामान्य बना दें। कल जो अपवाद था, आज वह व्यवस्था बन जाता है।

यहीं पर “भ्रष्टाचार” शब्द अपर्याप्त हो जाता है। भ्रष्टाचार का अर्थ है स्थापित नियम से विचलन। यहां तो नियम ही बदल रहे हैं। जब नियामकीय ढील किसी विशेष हित समूह को लाभ पहुंचाने लगे, जब नियुक्तियां पुराने योग्यता मानकों को दरकिनार करके होने लगें, जब जांच एजेंसियों की गति राजनीतिक उपयोगिता के अनुसार तेज या धीमी हो, तब यह अलग अलग घोटालों की सूची नहीं रहती। यही शासन प्रणाली बन जाती है।

अमेरिका में राष्ट्रपति परिवार से जुड़ी क्रिप्टोकरेंसी परियोजनाओं और उनसे मेल खाते नीतिगत परिवर्तनों ने सर्वोच्च पद को भी निवेश के अवसर में बदल दिया। भारत में आर्थिक निर्णयों का केंद्रीकरण, राजनीतिक विरोधियों पर जांच एजेंसियों का चयनात्मक इस्तेमाल और मीडिया आख्यानों का व्यवस्थित प्रबंधन उसी प्रवृत्ति का दूसरा रूप है। दोनों देशों का इतिहास अलग है। संस्थागत परंपराएं अलग हैं। पैमाना भी अलग है। लेकिन तर्क एक है। सत्ता जितनी निकट होगी, लाभ उतना अधिक होगा।

फिर भी यह व्यवस्था केवल भय से नहीं चलती। केवल दमन से भी नहीं। इसकी सबसे बड़ी ताकत समाज की स्वीकृति है। लोकतंत्र अपने नागरिकों से धैर्य मांगता है। प्रक्रिया मांगता है। समझौते की क्षमता मांगता है। संस्थाओं पर विश्वास मांगता है। लेकिन जब बड़ी संख्या में नागरिक इन्हें समय की बर्बादी समझने लगते हैं, तब वे ऐसे नेता की तलाश करते हैं जो हर समस्या का त्वरित समाधान देने का दावा करे। उन्हें तेज फैसले चाहिए। उन्हें शक्तिशाली नेतृत्व चाहिए। उन्हें यह संतोष चाहिए कि तथाकथित अभिजात वर्ग को उसकी जगह दिखा दी गई है।

यहीं से तमाशा लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगता है। लगातार संघर्ष, ऊंची आवाज और हर असहमति को राष्ट्रीय संघर्ष में बदल देने की राजनीति संयमित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अधिक आकर्षक दिखाई देने लगती है।

विडंबना यह है कि जिस क्षरण से यह लोकप्रियता पैदा होती है, वही अंततः राज्य की क्षमता को भी नष्ट करता है। किसी व्यापारी के लिए अगला सौदा हमेशा संभव होता है। लेकिन किसी राष्ट्र के लिए ऐसा नहीं होता। यदि कानून की विश्वसनीयता, प्रशासन की निष्पक्षता और यह विश्वास कि सत्ता जनता की ओर से निभाई जाने वाली न्यास व्यवस्था है, यही पूंजी खर्च हो जाए, तो उसकी भरपाई पीढ़ियों में होती है।

दूर से देखने पर आज दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र समानांतर पटरियों पर चलते दिखाई देते हैं। एक में नारा है कि देश को फिर महान बनाया जाएगा। दूसरे में सभ्यतागत आत्मविश्वास लौटाने का वादा है। दोनों नारों में सत्य का एक हिस्सा है। दोनों अपने समाज की वास्तविक बेचैनियों को छूते हैं। लेकिन दोनों का उपयोग सत्ता के केंद्रीकरण और संस्थागत संतुलनों को कमजोर करने के औचित्य के रूप में भी किया गया है।

अमेरिका इसलिए अधिक चौंकाता है क्योंकि वहां की संस्थाओं को लंबे समय तक लगभग अभेद्य माना गया। भारत इसलिए कम चौंकाता है क्योंकि उपनिवेशोत्तर दुनिया में यह कहानी कई बार दोहराई जा चुकी है। जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि बनकर आया नेता धीरे धीरे राज्य का स्वामी बनने लगता है।

आधुनिक तकनीक ने इस प्रक्रिया को और सरल बना दिया है। निगरानी पहले से कहीं व्यापक है। सूचना का नियंत्रण पहले से अधिक संगठित है। वित्तीय नेटवर्क पहले से कहीं अधिक जटिल हैं। अब संविधान समाप्त करने की भी आवश्यकता नहीं। चुनाव रोकने की भी जरूरत नहीं। अदालतें चलती रह सकती हैं। संसद बैठती रह सकती है। समाचार चैनलों पर हर रात बहसें होती रह सकती हैं। इतना पर्याप्त है कि वास्तविक निर्णय धीरे धीरे कुछ वफादार लोगों के छोटे से घेरे में सिमट जाएं।

गणतंत्र हमेशा धमाके के साथ नहीं मरता। कई बार वह जीवित दिखाई देता है जबकि भीतर उसकी भाषा बदल चुकी होती है। अदालतें मौजूद रहती हैं। नौकरशाही आदेश जारी करती रहती है। मीडिया बहस करता रहता है। लेकिन यदि लोगों का यह विश्वास समाप्त हो जाए कि ये संस्थाएं सत्ता को सीमित भी कर सकती हैं, उससे जवाब भी मांग सकती हैं और लोकप्रिय नेता को भी नियमों के भीतर रहने के लिए बाध्य कर सकती हैं, तब लोकतंत्र का सबसे मूल्यवान तत्व खो जाता है।

उसके बाद सुरक्षा कानून से नहीं मिलती। सुरक्षा सत्ता के निकट होने से मिलती है। नागरिक अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण संबंध हो जाता है। नियम से अधिक प्रभावशाली पहुंच हो जाती है। गणतंत्र का नागरिक फिर से दरबार का याचक बन जाता है।

तभी गणतंत्र, नाम से तो गणतंत्र बना रहता है, लेकिन व्यवहार में एक जागीर बन जाता है, केवल बेहतर ब्रांडिंग के साथ।

असल विरासत कभी किसी एक नेता की निजी संपत्ति नहीं थी। उसे अनेक पीढ़ियों ने मिलकर बनाया था ताकि राज्य किसी व्यक्ति की इच्छा का विस्तार न बन सके। जब उसी विरासत को दक्षता, निर्णायक नेतृत्व या राष्ट्रीय पुनर्जागरण के नाम पर धीरे धीरे कमजोर किया जाता है, तब राष्ट्र बड़ा नहीं होता। वह भीतर से छोटा होने लगता है।

नेता अंततः चला जाता है। अपने सम्मान, अपनी शिकायतें और अपनी महत्वाकांक्षाएं साथ लेकर। लेकिन राष्ट्र वहीं रह जाता है। उसकी संस्थाओं पर भरोसा पहले से कम होता है। नागरिकों का आत्मविश्वास पहले से कमजोर होता है। लोकतंत्र का भविष्य पहले से अधिक व्यक्तियों पर निर्भर दिखाई देने लगता है।

अमेरिका की ढाई सौवीं वर्षगांठ की रात वॉशिंगटन के आकाश में रिकॉर्ड बनाने वाली आतिशबाजियां चमक रही थीं। उसी समय एक और हिसाब भी लिखा जा रहा था। वह किसी एक राष्ट्रपति या एक प्रधानमंत्री का हिसाब नहीं था। वह उस विरासत का हिसाब था जिसे लोकतंत्र कहते हैं। उसे बनाने में पीढ़ियां लगती हैं। उसे गंवाने में कभी कभी केवल एक पीढ़ी ही पर्याप्त होती है।

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