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मातृभाषा का हक और लोकतंत्र की कसौटी

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राजस्थानी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वही बात भोजपुरी पर और भी अधिक तीव्रता से लागू होती है। अगर बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार है, तो भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों बच्चों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या वे कम भारतीय हैं? क्या उनकी भाषा कम समृद्ध है?… सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक अवसर है, नीति-निर्माताओं के लिए, शिक्षाविदों के लिए …

सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय (राजस्थान के स्कूलों में राजस्थानी भाषा को पढ़ाने और उसे आगे चल कर शिक्षा का माध्यम बनाने का निर्देश) सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है। यह याद दिलाता है कि संविधान की आत्मा कागज़ पर लिखे अनुच्छेदों में नहीं, बल्कि उन लोगों की बोली-बानी में बसती है, जिनके लिए यह संविधान बना है। भारत को समझना है तो उसकी ‘लोकभाषाओं-बोलियों’ को सुनना सीखिए। हिंदी, अंग्रेज़ी या किसी भी राजकीय भाषा के ऊपर जो एक विराट लोक-संसार है, वही असली भारत है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उसी लोक-संसार की ओर लौटने का संकेत है।

राजस्थान के संदर्भ में यह सवाल उठता है कि जब चार करोड़ से अधिक लोग राजस्थानी बोलते हैं, जब उसकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा है, जब वह विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है, तब स्कूलों में उसे जगह देने में इतनी देर क्यों? क्या यह केवल प्रशासनिक जड़ता है या भाषा के प्रति हमारी मानसिकता में कोई गहरी समस्या है? दरअसल, समस्या यह है कि हमने भाषा को ‘शक्ति’ और ‘प्रतिष्ठा’ के पैमाने से मापना शुरू कर दिया है। अंग्रेज़ी को रोजगार की भाषा, हिंदी को राष्ट्र की भाषा और बाकी भाषाओं को ‘क्षेत्रीय’ कह कर हम उन्हें एक तरह से दूसरे दर्जे का नागरिक बना देते हैं। यही मानसिकता भोजपुरी, राजस्थानी, मगही, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बघेली जैसी भाषाओं के साथ हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक महत्वपूर्ण बात कही। शिक्षा केवल आठवीं अनुसूची की भाषाओं में ही सीमित नहीं है। यह बात साधारण लग सकती है, लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं। इसका अर्थ यह है कि संविधान की आठवीं अनुसूची कोई ‘सीमा-रेखा’ नहीं है, बल्कि एक ‘प्रक्रिया’ है, जो समय के साथ विस्तृत होनी चाहिए।

राजस्थानी की तरह सवाल भोजपुरी का भी है। करीब सात दशकों से संवैधानिक मान्यता की बाट जोह रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि भोजपुरी, एक भाषा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक भूगोल है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार से लेकर मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और त्रिनिदाद तक फैला हुआ। 20 करोड़ से अधिक लोग इसे बोलते हैं। नेपाल और मॉरीशस में इसे आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला है। मॉरीशस के ढाई सौ से अधिक स्कूलों में इसकी पढ़ाई होती है। इसकी गीत-गवई को यूनेस्को ने अमूर्त विश्व विरासत का दर्जा दिया है। इसके गीतों में लोकजीवन की धड़कन है। इसके साहित्य में संघर्ष और संवेदना का इतिहास है, और इसके सिनेमा में जन-जीवन की आकांक्षाएं हैं। फिर भी, यह संविधान की आठवीं अनुसूची से बाहर है। यह विडंबना नहीं तो क्या है?

राजस्थानी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वही बात भोजपुरी पर और भी अधिक तीव्रता से लागू होती है। अगर बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार है, तो भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों बच्चों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या वे कम भारतीय हैं? क्या उनकी भाषा कम समृद्ध है? यहां एक बुनियादी सवाल उठता है। भाषा की मान्यता का आधार क्या होना चाहिए? क्या वह केवल राजनीतिक सहमति का परिणाम होगा? या फिर जनसंख्या, साहित्य, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक उपयोगिता भी इसके मानदंड होंगे?

अगर पंडित विद्यानिवास आज होते, तो इस पर शायद कहते, ‘जिस भाषा में लोग रोते हैं, हंसते हैं, प्रेम करते हैं, विरोध करते हैं, वही भाषा उनकी असली पहचान है’। अगर यह मान लें, तो भोजपुरी और राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। यह केवल शैक्षणिक सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक विकास का भी प्रश्न है। बच्चा अपनी भाषा में सबसे सहज होता है, वही उसकी सोच की पहली जमीन होती है। जब हम उसे किसी दूसरी भाषा में शिक्षा देते हैं, तो हम उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति को बाधित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को रेखांकित किया है। उसने कहा कि छात्रों को अपनी मातृभाषा में सीखने का अधिकार है। यह अधिकार केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पूरे भारत की भाषाई विविधता पर लागू होना चाहिए। यहां यह तर्क दिया जाता है कि अगर हर भाषा को मान्यता दी जाएगी, तो प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ जाएंगी। यह तर्क सुनने में व्यावहारिक लगता है, लेकिन यह मूलतः केंद्रीकरण की मानसिकता से उपजा है।

भारत का स्वभाव केंद्रीकृत नहीं, बल्कि बहुलतावादी है। यहां एकरूपता नहीं, विविधता ही शक्ति है। संविधान की आठवीं अनुसूची में आज 22 भाषाएं हैं। यह संख्या स्थिर नहीं है। समय-समय पर इसमें भाषाएं जोड़ी गई हैं। फिर भोजपुरी और राजस्थानी को जोड़ने में हिचक क्यों? यह केवल भाषायी प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है। जब किसी भाषा को मान्यता नहीं मिलती, तो उस भाषा के बोलने वालों को भी एक तरह से हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उनकी संस्कृति, उनका साहित्य, उनकी पहचान, सब कुछ ‘कमतर’ मान लिया जाता है। राजस्थान विधानसभा ने दो दशक पहले ही राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देने का प्रस्ताव पारित किया था। यह लोकतांत्रिक इच्छा का स्पष्ट संकेत है। उसी तरह, भोजपुरी के लिए भी लंबे समय से मांग उठती रही है। संसद में प्रस्ताव आए, समितियां बनीं, लेकिन निर्णय टलता रहा। अब समय आ गया है कि इस टालमटोल को समाप्त किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक अवसर है, नीति-निर्माताओं के लिए, शिक्षाविदों के लिए, और समाज के लिए। यह अवसर है यह समझने का कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। अगर हम सचमुच एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषायी विविधता को सम्मान देना होगा। राजस्थानी को शिक्षा में स्थान देना एक शुरुआत है, लेकिन यह यात्रा भोजपुरी और अन्य भाषाओं तक भी पहुंचनी चाहिए।

याद रखिए भारत की असली ताकत उसकी भाषाओं में है, और जब तक हम उन्हें उनका अधिकार नहीं देंगे, तब तक हमारा लोकतंत्र अधूरा रहेगा। सवाल अब यह नहीं है कि भोजपुरी और राजस्थानी को मान्यता दी जानी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि हम इसमें और कितनी देर करेंगे? क्योंकि भाषा इंतज़ार नहीं करती, वह या तो फलती-फूलती है, या फिर धीरे-धीरे स्मृति में बदल जाती है। और किसी भी समाज के लिए इससे बड़ा नुकसान क्या हो सकता है कि उसकी अपनी आवाज़ ही उससे छिन जाए।

(लेखक मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार के पूर्व उपाध्यक्ष और विश्व भोजपुरी सम्मलेन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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