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पश्चिम बंगाल भी केसरिया रंग में

सम्मिलित निष्कर्ष है कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है और बंगाल के मतदाताओं ने परिवर्तन के लिए मतदान किया है। आजादी के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व की सोच वाली सरकार बनने की वास्तविक संभावनाएं सामने हैं। साथ ही 50 साल के बाद पहली बार केंद्र की विरोधी नहीं, बल्कि केंद्र के साथ समन्वय वाली सरकार बंगाल में बनती दिखाई दे रही है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा का मतदान संपन्न होने के बाद आए एक्जिट पोल के आंकड़े भारतीय जनता पार्टी के चुनाव जीतने का अनुमान जाहिर कर रहे हैं। एक्जिट पोल के अनुमान बिल्कुल सटीक हों, ऐसा नहीं होता है। उनके आंकड़ों में और वास्तविक आंकड़ों में अंतर हो सकता है। लेकिन आमतौर पर इससे परिणाम की दिशा स्पष्ट होती है। इसका प्रयोग दिशा की स्पष्टता के लिए निश्चित रूप से किया जा सकता है। एकाध अपवादों को छोड़ कर आज तक हमेशा एक्जिट पोल की दिशा सही साबित हुई है। परंतु नतीजों का अनुमान लगाने के लिए यह एकमात्र आधार नहीं है। मतदान का प्रतिशत भी एक आधार है। मतदान के दौरान लोगों की मुखरता भी एक संकेत देती है। मतदान के बाद सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली चर्चाओं और पार्टियों के नेताओं की भाव भंगिमा भी परिणामों का संकेत देती है।

इन सबका सम्मिलित निष्कर्ष यह है कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है और बंगाल के मतदाताओं ने परिवर्तन के लिए मतदान किया है। आजादी के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व की सोच वाली सरकार बनने की वास्तविक संभावनाएं सामने हैं। साथ ही 50 साल के बाद पहली बार केंद्र की विरोधी नहीं, बल्कि केंद्र के साथ समन्वय वाली सरकार बंगाल में बनती दिखाई दे रही है। इससे न सिर्फ देश की एकता व अखंडता सुरक्षित रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं समाप्त होंगी और विकास के नए द्वार खुलेंगे।

प्रश्न है कि परिवर्तन के लिए मतदान के लिए बंगाल के लोगों को किस बात ने प्रेरित किया? इसके कई कारण हैं। परंतु यह समझने की आवश्यकता है कि हर चुनाव में एक केंद्रीय मुद्दा होता है और उसके साथ कई सहायक मुद्दे होते हैं। जहां भी परिवर्तन के लिए मतदान होता है वहां वह केंद्रीय मुद्दा सामान्य से ज्यादा मुखर और परिलक्षित होता है। उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल में 2011 में जब परिवर्तन के लिए मतदान हुआ तो केंद्रीय मुद्दा जमीन का था। तृणमूल कांग्रेस को सिंगुर और नंदीग्राम में नया टाउनशिप बनाने और औद्योगिक केंद्र बनाने की वाम सरकार की योजना से मौका मिला था। इस केंद्रीय मुद्दे के साथ 34 साल की सत्ता विरोधी लहर, सत्ता के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था आदि के मुद्दे जुड़ गए तो तृणमूल कांग्रेस को जीत मिल गई।

इसी प्रकार इस बार के चुनाव का केंद्रीय मुद्दा हिंदुत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा का था। ये दोनों बहुत शक्तिशाली भावनात्मक मुद्दे हैं, जिन पर पश्चिम बंगाल की जनता परिवर्तन के लिए मतदान करने को प्रेरित हुई। चुनाव की तारीखों की घोषणा से एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जनसभा में कहा था कि अगर भाजपा नहीं जीतती है तो हिंदू इस राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएंगे। इसके बाद समूचे चुनाव प्रचार के दौरान बहुत बारीक तरीके से भाजपा की ओर से यह बात राज्य के आम हिंदू मतदाताओं तक पहुंचाई गई। इसके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ा, जिसने हिंदुत्व की राजनीति को और मजबूती प्रदान की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित भारतीय जनता पार्टी के हर नेता ने घुसपैठ और तुष्टिकरण को बड़ा मुद्दा बनाया। यह बात लोगों के दिल दिमाग में स्थापित हुई कि अगर बांग्लादेश की तरफ से घुसपैठ नहीं रूक रही है तो कहीं न कहीं उसका एक कारण यह है कि पश्चिम बंगाल की सरकार सीमा पर जमीन नहीं उपलब्ध करा रही है ताकि बाड़ेबंदी की जा सके। तभी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वादा किया कि राज्य में भाजपा की नई सरकार के गठन के बाद कैबिनेट की पहली बैठक में सीमावर्ती इलाके में जमीन उपलब्ध कराई जाएगी और पांच सौ किलोमीटर से ज्यादा के इलाके में जहां अभी तक बाड़ नहीं लगाई है वहां बाड़ लगा कर घुसपैठ रोकी जाएगी। यह कितना बड़ा वादा है और इसका कितना बडा प्रभाव हो सकता है उसको सीमावर्ती इलाकों के साथ साथ लगभग पूरे बंगाल के लोग ज्यादा बेहतर ढंग से समझते हैं। उनको लगा कि अगर भाजपा की सरकार बनती है तो पश्चिम बंगाल, जो घुसपैठ का गेटवे बना हुआ है वह गेटवे बंद हो जाएगा।

परंतु इतना बड़ा वादा करके या घुसपैठ रोकने का रोडमैप प्रस्तुत कर देने से भाजपा चुनाव नहीं जीत सकती थी। इसके लिए उसे पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को दो और बातों का भरोसा दिलाने की आवश्यकता थी। पहली बात तो यह कि भाजपा की सरकार बन रही है और दूसरी बात यह कि चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद कोई हिंसा नहीं होगी। अगर हिंदू मतदाताओं को यह भरोसा नहीं होता कि भाजपा चुनाव जीत रही है तो वे परिवर्तन की बात करने तक का जोखिम नहीं लेते। इसी तरह अगर उनको हिंसा नहीं होने का भरोसा नहीं दिलाया जाता तो वे मतदान के लिए नहीं निकलते और निकलते तो तृणमूल कांग्रेस को ही वोट देकर आते क्योंकि पुराने इतिहास की वजह से उनको ऐसा लगता है कि उन्होंने किसको वोट दिया इसका पता लगने के बाद उनके और उनके परिवार के साथ बहुत बुरा हो सकता है।

एक तरफ भारतीय जनता पार्टी ने अपने आक्रामक चुनाव प्रचार से बंगाल के मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि इस बार पार्टी चुनाव जीत रही है तो दूसरी ओर चुनाव आयोग ने केंद्रीय सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व तैनाती से सुरक्षा का भरोसा दिलाया। चुनाव आयोग ने बंगाल में ढाई लाख केंद्रीय बलों की तैनाती की। इसके अलावा देश के कई राज्यों से लाकर बड़ी संख्या में ऑब्जर्वर तैनात किए गए। साथ ही माइक्रो ऑब्जर्वर्स की नियुक्ति भी की गई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी सभाओं में यकीन दिलाया कि मतदान खत्म होने के बाद भी 60 दिन यानी दो महीने तक केंद्रीय बल राज्य में तैनात रहेंगे ताकि चुनाव बाद होने वाली हिंसा की आशंका को समाप्त किया जा सके। सो, कह सकते हैं कि जीत की धारणा बनाने और सुरक्षा का भरोसा दिलाने की वजह से भाजपा को लाभ हुआ।

जहां तक जीत की धारणा बनाने की बात है तो वह भी सिर्फ नेताओं के भाषण या प्रचार से नहीं हुआ, बल्कि उसके पीछे भी कई फैक्टर काम कर रहे थे। पहला फैक्टर तो मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का था। एसआईआर के जरिए पहले 58 लाख और फिर पांच लाख लोगों के नाम कटे। यह ‘एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट’ यानी एएसडीडी श्रेणी है। इस श्रेणी में नाम कटने को लेकर ज्यादा आपत्ति नहीं हुई। लेकिन इससे यह धारणा बनी कि ऐसे लाखों लोगों के नाम पर जो ‘छापा वोट’ पड़ता था, जिसका लाभ हमेशा सत्तारूढ़ दल को होता था वह रूकेगा। इसके बाद 60 लाख नाम तार्किक विसंगति के आधार पर रोके गए, जिसमें से बाद में 33 लाख को मंजूरी दी गई। इस तरह 27 लाख से ज्यादा लोगों के नाम इस श्रेणी में कट गए। इससे भी यह धारणा बनी कि तृणमूल कांग्रेस को नुकसान हो रहा है। यानी भाजपा को फायदा हो रहा है। एक बार ऐसी धारणा बनने के बाद सब कुछ आसान होता गया। तभी रिकॉर्ड संख्या में लोग मतदान के लिए निकले। पश्चिम बंगाल में 93 प्रतिशत के करीब मतदान होना परिवर्तन के प्रति लोगों की प्रतिबद्धता का भी संकेत है।

भारतीय जनता पार्टी ने इस बार चुनाव का प्रबंधन भी पहले के मुकाबले अलग और ज्यादा प्रभावी तरीके से किया। तृणमूल कांग्रेस को बाहरी और भीतरी का चुनाव बनाने का कोई मौका नहीं दिया गया। बांग्ला अस्मिता का मुद्दा तृणमूल कांग्रेस इसलिए नहीं बना पाई क्योंकि भाजपा ने कह दिया कि बंगाल में जन्मा, बांग्ला माध्यम से पढ़ा कोई बंगाली ही मुख्यमंत्री बनेगा। पार्टी ने संगठन का काम संभाल रहे दूसरे राज्यों के नेताओं को परदे के पीछे रखा। प्रचार सामग्री सिर्फ बांग्ला भाषा में बनी। सारे पैम्फलेट और पोस्टर, होर्डिंग्स आदि बांग्ला में लिखे गए। मांसाहार रोके जाने के तृणमूल कांग्रेस के नैरेटिव का जवाब भी भाजपा ने रियल टाइम में दिया। इसका प्रभाव यह हुआ कि बांग्ला बोलने वाला हिंदू, जो भाजपा को लेकर थोड़ा आशंकित रहता था वह आश्वस्त हुआ। उसको लगा कि भाजपा के आने से उसकी भाषा, संस्कृति, खान पान आदि पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। इसके पहले से वह इस बात को लेकर आशंकित था कि बढ़ती हुई मुस्लिम आबादी अंततः उसके और उसके बच्चों के भविष्य के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।

चुनाव आयोग के प्रयासों से बनी सुरक्षा की भावना, भाजपा के प्रयासों से बनी जीत की धारणा और राज्य में मौजूद वास्तविक समस्याओं ने बंगाली मतदाताओं को परिवर्तन के लिए वोट करने को प्रेरित किया। हिंदुत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्रीय मुद्दे के साथ साथ 15 साल की सरकार के प्रति सत्ता विरोध की भावना, रोजगार और कामकाज के अवसर की अनुपस्थिति, युवाओं के पलायन, कानून व्यवस्था की समस्या खास कर महिलाओं की सुरक्षा की चिंता आदि ने भी करोड़ों लोगों के मतदान व्यवहार को प्रभावित किया। मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार का भी बड़ा असर हिंदुओं के ऊपर पड़ा। चुनाव से कुछ समय पहले ऐसा लग रहा था कि हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी को भी मुस्लिम समर्थन कर सकता है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी से उनके तालमेल की वजह से यह संभावना दिख रही थी। परंतु अचानक आए एक स्टिंग ऑपरेशन से पूरी तस्वीर बदल गई। मुस्लिम मतदाता सबको छोड़ कर तृणमूल के साथ खड़े हो गए। बंगाल में इस बार अरसे बाद कांग्रेस अकेले लड़ रही थी और वाम मोर्चा भी लड़ रहा था। इतने विकल्प के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल कांग्रेस को चुना। इसकी प्रतिक्रिया में हिंदू समुदाय में रिवर्स पोलराइजेशन हुआ। मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार ने बांग्ला भद्रलोक को प्रभावित किया तो शुभेंदु अधिकारी के अघोषित रूप से मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनने से ग्रामीण इलाकों में जाति के आधार पर भी निश्चित रूप से एक ध्रुवीकरण हुआ, जिसका लाभ भाजपा को मिला। इन तमाम पहलुओं को एक्जिट पोल के अनुमानों के साथ मिल कर देखने पर लगता है कि बंगाल में भाजपा आ रही है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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