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तमिलनाडु में विजय क्या सफल होंगे?

मुख्यमंत्री विजय ने अपने व्यवहार से एक शुभ संकेत दिया है। मुख्यमंत्री का पद संभालते ही वे विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं के घर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने गए थे। इसे तमिलनाडु की राजनीति में एक अनूठी पहल माना गया है। शपथ ग्रहण करते ही तीन अहम आदेशों पर हस्ताक्षर किए। जिनमें दो प्रमुख थे। एक, नशीली दवाओं की रोकथाम के कड़े कदम उठाना और दूसरा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन को मुस्तैद करना।… विजय ने सख़्त आदेश दिए हैं कि नागरिकों की ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं का हल 24 घंटों के भीतर हो जाना चाहिए।

तमिलनाडु के नए युवा लोकप्रिय मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजयने शपथ ग्रहण करते ही तीन अहम आदेशों पर हस्ताक्षर किए। जिनमें दो प्रमुख थे। एक, नशीली दवाओं की रोकथाम के कड़े कदम उठाना और दूसरा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन को मुस्तैद करना। पर जिन कारणों से विजय की ओर सबका ध्यान गया है, वो है उनकी सादगी, सहृदयता और धर्म निरपेक्षता। विजय के पिता ईसाई हैं और माँ सनातनी हिंदू। इसलिए विजय दोनों धर्मों में आस्था रखते हैं और दोनों के धार्मिक कृत्यों में श्रद्धा से भाग लेते हैं। उनका यही रवैया अन्य धर्मों के प्रति भी है। आज जब देश में धर्म के नाम पर उन्माद बढ़ता जा रहा है तब श्री विजय की इस पहल ने तमिलनाडु के लोगों को बहुत राहत प्रदान की है।

प्रायः राजनीति में जो लोग आते रहे, वे होते हैं जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि मज़बूत नहीं होती थी। इसीलिए वे राजनीति को कमाई का ज़रिया बना कर अकूत धन संपत्ति जमा करने में जुट जाते थे। कमोबेश यह इतिहास हर राजनेता का रहा है।

विजय तमिलनाडु के सुपर स्टार हैं और 600 करोड़ से अधिक की अर्जित संपत्ति के मालिक हैं। वे अपने राज्य में एक कलाकार के रूप में लोकप्रियता के शिखर पर रहे हैं। इसलिए माना जा सकता है कि राजनीति में उनका प्रवेश धन या यश कमाने के लिए नहीं हुआ।

वे कुछ नया कर गुज़रना चाहते हैं। उन्होंने तमिलनाडु में नेताओं के कटआउट और पोस्टर लगाने को प्रतिबंधित कर दिया है। जबकि हर दल के नेता अपने फ़ोटो के विज्ञापनों और कटआउटों पर देश की ग़रीब जनता का अरबों रुपया बर्बाद करते हैं। जिन पाठकों ने तमिलनाडु का दौरा किया है उन्होंने यह आश्चर्यजनक संस्कृति वहाँ देखा होगी कि राजनेताओं के 100-100 फुट ऊँचे कटआउट जगह-जगह लगे होते हैं।

विजय राजनीति से वीआईपी संस्कृति समाप्त करना चाहते हैं और इस दिशा में भी उन्होंने कई पहल की हैं जिसका अच्छा संदेश गया है। इतने सम्पन्न और सुप्रसिद्ध व्यक्ति होते हुए विजय एक कर्मचारी की तरह समय पर दफ़्तर आते हैं और अपना लंच बॉक्स साथ लाते हैं। दोपहर को वे अपनी मेज़ पर डिब्बा खोल कर अकेले लंच करते हैं, कोई तामझाम नहीं। ऐसी छोटी-छोटी बातों का जनता पर बहुत अच्छा असर पड़ रहा है। दरअसल आम जनता की सरकार से अपेक्षाएँ बहुत सीमित होती हैं।

मसलन बिजली-पानी की आपूर्ति गड्ढा-मुक्त सड़कें, नागरिक सुविधाएं प्रदान करने वाली एजेंसियों में आम जनता के प्रति ज़िम्मेदारी और सम्मान का भाव आदि। विजय ने सख़्त आदेश दिए हैं कि नागरिकों की ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं का हल 24 घंटों के भीतर हो जाना चाहिए। देश की जो कार्य संस्कृति रही है उसमें ऐसा हो पाना आसान नहीं है। पर नेतृत्व में अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो असंभव कुछ भी नहीं है।

आज के राजनैतिक माहौल में जब अपने विपक्षी दलों के नेताओं को अपमानित करना, उनके प्रति अपशब्द बोलना और उनके परिवार पर छींटाकशी करना आम बात हो गई है, वहाँ विजय ने अपने व्यवहार से एक शुभ संकेत दिया है। मुख्यमंत्री का पद संभालते ही वे विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं के घर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने गए थे। इसे तमिलनाडु की राजनीति में एक अनूठी पहल माना गया है। छोटे दलों के कुछ नेताओं का तो ये कहना था, कि उनके जीवन में पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके आवास पर इस तरह शिष्टाचार प्रदर्शित करने आया। जाहिर है कि विपक्ष के नेता भी विजय की इस विनम्रता से अभिभूत हैं।

आज के दौर में जब धर्मांध लोग एक दूसरे के धर्मस्थलों को अपमानित या ध्वस्त करना अपनी उपलब्धि मानते हैं, उस दौर में विजय ने एक नई पहल की है। उन्होंने सभी धर्मों के उपेक्षित पड़े धर्मस्थलों का सरकारी प्रयास से जीर्णोद्धार कराए जाने की इच्छा व्यक्त की है। इस दिशा में वे कितने सफल हो पायेंगे, ये तो आनेवाला समय ही बताएगा। पर भारत के लोकतंत्र के लिए ये एक शुभ संकेत है।

कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने बहुत आशा जगाई थी। लंबे-चौड़े दावे किए थे। अनेक क्रांतिकारी कदमों का ऐलान किया था। पर क्रमशः वह सब काफूर हो गया। आम आदमी पार्टी ने जनहित में कुछ अच्छे कार्य भी किए पर वो उन दावों की तुलना में बहुत कम थे, जो शुरू में किए गए थे। अब इसे देश का दुर्भाग्य कहें या राजनीति का यथार्थ कि सत्ता पाकर हर व्यक्ति बदल जाता है या हालात उसे बदलने के लिए मजबूर कर देते हैं।

मेरा मानना है कि जिनमें आध्यात्मिक चेतना और नैतिक बल होता है वही राजनीति की दलदल कमल की तरह खिल पाते हैं। पर ऐसा यदा-कदा ही होता है। मुझे याद है किस तरह वाजपेयी जी की सरकार में जगमोहन जी के मंत्रालय तीन बार बदल दिए गए। वे कर्मठ व्यक्ति थे और पारदर्शिता के साथ सुधार करना चाहते थे। पर जिस मंत्रालय में भी वे सुधार के प्रयास करते थे, उन्हें वहाँ से हटा दिया जाता था। यही रवैया अन्य दलों के सत्ता में आने बाद देखा जाता है कि योग्य और भले लोगों को दरकिनार कर दिया जाता है, क्योंकि वे अपने राजनैतिक आकाओं की अनैतिक आकांशाओं को पूरा करने में सहयोग नहीं करते।

विजय की एक और सीमा है कि उनका दल पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सका है। ऐसे में उन्हें अन्य दलों का सहारा लेना पड़ा है। अब ये दल कब तक उनका साथ दे पायेंगे इस पर सबकी नज़र रहेगी। उनकी एक और सीमा यह भी है कि वे उस आर्थिक-राजनैतिक गठजोड़ की संस्कृति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते हैं जो गठजोड़ इतना सशक्त होता है कि जो इसकी नहीं सुनता ये उसे विफल करने में ये कोई कसर नहीं छोड़ता। इसलिए श्री विजय की राह आसान नहीं होगी।

पर सिंगापुर जैसे गाँव को अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विकसित देश बनाने वाले ली क्वान का उदाहरण आशा की किरण दिखाता है। जो नगरपालिका के क्लर्क से उठ कर राष्ट्रपति बने और अपने ईमानदारी, सादगी और फौलादी इरादों से सिंगापुर को अग्रणी राष्ट्र बना दिया।

By विनीत नारायण

वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी। जनसत्ता में रिपोर्टिंग अनुभव के बाद संस्थापक-संपादक, कालचक्र न्यूज। न्यूज चैनलों पूर्व वीडियों पत्रकारिता में विनीत नारायण की भ्रष्टाचार विरोधी पत्रकारिता में वह हवाला कांड उद्घाटित हुआ जिसकी संसद से सुप्रीम कोर्ट सभी तरफ चर्चा हुई। नया इंडिया में नियमित लेखन। साथ ही ब्रज फाउंडेशन से ब्रज क्षेत्र के संरक्षण-संवर्द्धन के विभिन्न समाज सेवी कार्यक्रमों को चलाते हुए। के संरक्षक करता हैं।

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