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खिलखिलाना तो चाहिए!

कईयों ने मुझसे पूछा आपने अमित शाह को खिलखिलाते देखा? पर मैं क्योंकि टीवी देखता नहीं हूं तो मैंने कल्पना कर सोचा और माना कि अमित शाह का बम-बम होना या खिलखिलाना गलत नहीं है! मोहन भागवत एंड पार्टी अड़ी हुई थी। अध्यक्ष के लिए हमें नाम बताओ, तीन विकल्प दो। मतलब संगठन पुराने कायदे से चले। वाजपेयी, आडवाणी, गडकरी, राजनाथ सिंह के समय जो तरीका था, उसी अनुसार फैसला होगा। इसी चक्कर में मोदी-शाह ने जेपी नड्डा का कार्यकाल बढ़ाते हुए फैसला अटकाए रखा। निश्चित ही मोहन भागवत, संघ की आला टोली का रूख था कि सरकार जैसे चलाना है चलाएं मगर संगठन तो कायदे से चले। मतलब संघ का वह अनुशासित संगठन रहे।

मगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हों तब भला ऐसा कैसे संभव? इसके ठोस अनुभव होते हुए भी मोहन भागवत एंड पार्टी मुगालते में रही। जबकि जेपी नड्डा ने भी सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि भाजपा अब बड़ी हो गई है वह अपने आप में समर्थ है। संघ की जरूरत नहीं है।

यही एप्रोच गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी की थी। मगर वाजपेयी, आडवाणी, सुदर्शन, भागवत सभी के आगे यह हकीकत ओझल रही कि मोदी वहा सरकार के साथ संगठन को भी लगातार अधीन रखे हुए हैं। वे सत्ता से ही मनमाफिक संगठन बनाए हुए हैं। तभी जैसे 2014 से 2025 का रिकॉर्ड है वैसे ही 2000 से 2014 का भी मोदी रिकॉर्ड है। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के साथ गुजरात में जितने बड़े नेता या जनाधार वाले चेहरे थे वे एक-एक कर वैसे ही निपटे, जैसे 2014 के बाद आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार आदि हाशिए में गए। याद है गुजरात के केशुभाई पटेल, शंकरसिंह वाघेला, एके पटेल, हरेन पांड्या, कांशीराम राणा, जसपाल सिंह आदि भाजपाई चेहरे? ऐसे ही संगठन में भी नरेंद्र मोदी ने तब संघ के सुदर्शन व मोहन भागवत को हैंडल किया था। संघ के संगठन मंत्री संजय जोशी के साथ क्या हुआ यह संघ का हर पुराना प्रचारक जानता है। वही राजनीति नरेंद्र मोदी से अमित शाह ने भी सीखी हुई है। मतलब राजनीति में शिखर तभी है जब बाकी सभी बौने रहें। और चाल, चेहरा, चरित्र नहीं, बल्कि पॉवर, जुमला (प्रोपेगेंडा) और धन है हिंदुओं का वशीकरण करने का मंत्र!

तभी 14 वर्षों में गुजरात में एक भी जमीनी भाजपा नेता नहीं उभरा। पुराने खत्म और नया एक नहीं। अमित शाह भी नहीं क्योंकि वे तब भी मोदी की छाया में थे और अब भी हैं। इसलिए 1947 से अब तक की दिल्ली सत्ता में यदि कोई बिरली बात है तो वह मोदीजी का यह कमाल है जो सरकार-पार्टी-संगठन-संघ सभी को ऐसा हवाहवाई बना दे रहे हैं ताकि बाद में हिंदू आइडिया की जैविक राजनीति बचे ही नहीं।

इसी सोच के क्रम में मोदी सरकार के राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, मंत्री बने हैं, जिसका पूरा सिस्टम गांधीनगर के मोदीकालीन कैबिनेट, मुख्यमंत्री दफ्तर की लगभग प्रतिलिपि है। ऐसे ही मुख्यमंत्री बैठाए गए या बैठाए जा रहे हैं। और नोट रखें, जिस आसानी से मोदी-शाह ने नितिन नबीन को भाजपा अध्यक्ष बनाया व बाकी निपटे वैसे ही अगले चुनाव बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ निपटेंगे। आखिर एक भी क्यों रहे जो भविष्य में धुरी बने।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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