Wednesday

30-04-2025 Vol 19

2 मई को खुलेंगे भगवान शिव के विश्व के सबसे ऊँचे तुंगनाथ मंदिर के कपाट

निश्चित ही श्रद्धालुओं के लिए यह समय अत्यंत उल्लास और आस्था से परिपूर्ण है। बस कुछ ही दिन और शेष हैं, फिर देवभूमि उत्तराखंड में चारधाम यात्रा का शुभारंभ होने जा रहा है। तुंगनाथ मंदिर वह पावन यात्रा है जिसे हर श्रद्धालु अपने जीवन में एक बार अवश्य करना चाहता है।

30 अप्रैल से गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ ही इस वर्ष की चारधाम यात्रा विधिवत प्रारंभ हो जाएगी। हिमालय की गोद में बसे इन दिव्य धामों की यात्रा न केवल धार्मिक, बल्कि आत्मिक और आध्यात्मिक अनुभव का अद्वितीय संगम होती है।

चारधाम यात्रा का हिस्सा होने के नाते, भगवान शिव के भक्तों को सबसे अधिक प्रतीक्षा रहती है पवित्र तुंगनाथ मंदिर और केदारनाथ धाम की यात्रा की।

तुंगनाथ मंदिर पंचकेदारों में से एक है और तुंगनाथ समुद्रतल से 3,680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है।

तुंगनाथ मंदिर पावन स्थल के कपाट इस वर्ष 2 मई को मिथुन लग्न में प्रातः 10:15 बजे विधिवत पूजा-अर्चना और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ खोले जाएंगे। कपाट खुलने की यह शुभ तिथि तुंगनाथ मंदिर के पुजारी विजय भारत मैठाणी द्वारा घोषित की गई है।

शीतकालीन प्रवास के समय बाबा तुंगनाथ मंदिर की पूजा मक्कूमठ स्थित मर्केटेश्वर मंदिर में की जाती है, जहां भक्त सर्दियों में भी भगवान शिव के दर्शन कर सकते हैं।

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इतना ही नहीं, पंचकेदारों में द्वितीय केदार के रूप में विख्यात भगवान मदमहेश्वर धाम के कपाट भी 21 मई को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाएंगे। यह धाम भी अपने दिव्य वातावरण, प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महत्ता के लिए श्रद्धालुओं के हृदय में विशेष स्थान रखता है।

चारधाम यात्रा केवल यात्रा नहीं, एक जीवन दर्शन है। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की वह कड़ी है जिसमें आस्था, विश्वास, प्रकृति और परम शक्ति का अद्भुत समावेश होता है। (तुंगनाथ मंदिर) हर वर्ष लाखों श्रद्धालु कठिन से कठिन रास्तों को पार कर इन धामों तक पहुँचते हैं, और अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

तो आइए, इस वर्ष भी आस्था की इस अनुपम यात्रा का हिस्सा बनें और भगवान शिव सहित सभी देवताओं की कृपा से अपने जीवन को पावन करें। चारधाम की यह यात्रा न केवल धर्म और संस्कारों की प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा भी है।

30 अप्रैल को रवाना होगी तुंगनाथ मंदिर की विग्रह डोली

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी उत्तराखंड की पुण्यभूमि में स्थित पंचकेदारों में से एक भगवान तुंगनाथ जी की चल विग्रह डोली का शुभ आगमन पूरे विधि-विधान एवं भक्तिभाव के साथ होने जा रहा है।

इस दिव्य यात्रा की शुरुआत 30 अप्रैल को श्री मर्करेटेश्वर मंदिर, मक्कूमठ से होगी, जहाँ से भगवान तुंगनाथ मंदिर जी की पवित्र डोली भूतनाथ मंदिर में प्रवास के लिए प्रस्थान करेगी। यही दिन डोली के पहले पड़ाव का प्रतीक होगा, जहाँ रात्रि विश्राम के साथ पूजा-अर्चना और श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु आयोजन होगा।

इसके पश्चात 1 मई को डोली चोपता की ओर अग्रसर होगी, जोकि भगवान तुंगनाथ मंदिर जी की यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहाँ पर भक्तों द्वारा डोली का भव्य स्वागत किया जाएगा और मार्ग में जगह-जगह भक्तजन पुष्प वर्षा व भजन-कीर्तन के माध्यम से डोली का अभिनंदन करेंगे।

2 मई की सुबह, भोर के शुभ मुहूर्त में चोपता से तुंगनाथ मंदिर की ओर पवित्र विग्रह डोली प्रस्थान करेगी। कठिन हिमालयी मार्गों से होकर जब यह डोली श्री तुंगनाथ मंदिर धाम पहुंचेगी, तो पूरे वातावरण में भक्ति, आस्था और उत्साह का भावमय संगम देखने को मिलेगा।

यात्रा का सबसे पावन क्षण 2 मई को प्रातः 10:15 बजे आएगा, जब श्री तुंगनाथ मंदिर के कपाट विधिवत रूप से श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाएंगे। इस अलौकिक अवसर पर हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहेंगे, जो प्रथम दर्शन का पुण्य प्राप्त करने हेतु दूर-दूर से यात्रा कर यहां पहुंचे होंगे।

यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, संस्कृति और आस्था की जीवंत झलक है, जहाँ देव और भक्त का अद्वितीय मिलन होता है। तुंगनाथ धाम की यह यात्रा आत्मिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से परिपूर्ण होती है, जो जीवन में एक बार अवश्य अनुभव करनी चाहिए।

21 मई को खुलेंगे मद्महेश्वर के कपाट

उत्तराखंड की देवभूमि में स्थित पंचकेदारों में से एक पवित्र मद्महेश्वर धाम के कपाट इस वर्ष 21 मई को श्रद्धालुओं के लिए विधिवत रूप से खोले जाएंगे। यह शुभ अवसर न केवल आस्था का प्रतीक होगा, बल्कि हिमालयी संस्कृति और परंपराओं के गूढ़ रहस्यों से भी साक्षात्कार कराएगा।

इसके पूर्व, 18 मई को भगवान मद्महेश्वर की चल विग्रह उत्सव मूर्तियों को ओंकारेश्वर मंदिर, उखीमठ से निकालकर पूजा-अर्चना के पश्चात सभा मंडप में विराजमान किया जाएगा। यह परंपरा शास्त्र सम्मत विधियों से संपन्न होती है, जिसमें स्थानीय पुजारी, तीर्थ पुरोहित, हक-हकूकधारी और सैकड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

19 मई को, भगवान मद्महेश्वर की चल विग्रह उत्सव डोली को विधिवत पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चार के बीच, शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर से उनके ग्रीष्मकालीन निवास मद्महेश्वर धाम के लिए रवाना किया जाएगा। यह यात्रा एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव होती है, जिसमें डोली विभिन्न पड़ावों से होते हुए, प्रकृति की गोद में बसे मद्महेश्वर धाम की ओर अग्रसर होती है।

तीर्थयात्रियों और भक्तों की भक्ति, जयकारों की गूंज, और ढोल-नगाड़ों की ध्वनि के बीच, यह पावन डोली 21 मई को मद्महेश्वर धाम पहुंचेगी। उसी दिन, वेद मंत्रों के उच्चारण और धार्मिक विधानों के साथ, मद्महेश्वर मंदिर के कपाट ग्रीष्मकाल हेतु खोल दिए जाएंगे। इसके पश्चात भक्तगण भगवान के दर्शन कर सकेंगे और आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे।

यह संपूर्ण प्रक्रिया लोक आस्था, परंपरा और संस्कृति की जीवंत मिसाल है, जो हजारों वर्षों से अक्षुण्ण रूप से चली आ रही है। भगवान मद्महेश्वर के दर्शन करना न केवल धार्मिक पुण्य प्राप्ति है, बल्कि आत्मिक शांति का अनुपम अनुभव भी है।

Naya India

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