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सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युगपुरुष आद्य शंकराचार्य

भारतीय वाङ्मय के आकाश में आद्य गुरु शंकराचार्य एक ऐसे उज्ज्वल सूर्य हैं, जिन्होंने अल्पायु में ही अपनी प्रतिभा से चारों दिशाओं को आलोकित किया। वैशाख शुक्ल चतुर्थी को उनका जन्म केवल एक घटना नहीं, बल्कि क्षीण होते सनातन धर्म के पुनरुत्थान का एक दिव्य अभियान था। शंकराचार्य का आध्यात्मिक दर्शन “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः” के सूत्र में समाया है। उन्होंने उपनिषदों की जटिल व्याख्याओं को प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखकर स्पष्ट और तार्किक रूप दिया। पौराणिक मान्यता के अनुसार वे भगवान शंकर के अंशावतार माने जाते हैं, जिन्होंने षण्मत की स्थापना कर विभक्त शैव, वैष्णव और शाक्त परंपराओं को एक अद्वैत आधार पर स्थापित किया।

21 अप्रैल-आद्यगुरु शंकराचार्य जयंती

उनका दर्शन केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आत्मानुभूति का वह शिखर है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है। शंकराचार्य ने भारत की भौगोलिक सीमाओं को आध्यात्मिक सूत्र में बाँधने के लिए चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की—शृंगेरी, पुरी, द्वारका और ज्योतिर्मठ। ये केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता के मजबूत आधार थे। उन्होंने दशनामी संन्यास परंपरा का संगठन कर बिखरे साधु-संतों को एक अनुशासित व्यवस्था में जोड़ा, जिससे धर्म की रक्षा के लिए एक विचारशील शक्ति तैयार हुई।

हालांकि शंकराचार्य महान विद्वान थे, उनके सामाजिक विचार अत्यंत उदार और समतावादी थे। काशी के मणिकर्णिका घाट पर चांडाल के रूप में शिव से संवाद कर उन्होंने यह दिखाया कि ब्रह्मज्ञान जाति और वर्ण से परे है। मनीषा पंचकम् इसका सजीव प्रमाण है। उन्होंने शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित कर हिंसा के स्थान पर संवाद और तर्क को सत्य की खोज का माध्यम बनाया।

आधुनिक इतिहास में उनके कालखंड को लेकर शोध अभी भी जारी हैं। केदारनाथ में उनकी समाधि का पुनर्निर्माण और देश भर के प्राचीन मंदिरों, जैसे बदरीनाथ, कामाख्या और कांची में उनके द्वारा स्थापित श्रीचक्र एवं प्रतिमाएँ, उनके ऐतिहासिक अस्तित्व और प्रभाव की पुष्टि करती हैं। उनके द्वारा पुनर्जीवित तीर्थ आज भी भारत की एकता के जीवंत प्रमाण हैं।

शंकराचार्य का जीवन “चरैवेति-चरैवेति” का सजीव उदाहरण है। उन्होंने विभाजित समाज को एक सूत्र में बाँधा और ज्ञान के सूखे वातावरण में भक्ति और अद्वैत की धारा प्रवाहित की। उनकी जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि उनके अद्वैत भाव को अपने जीवन में उतारा जाए। आचार्य शंकर ने केवल दार्शनिक और संगठनात्मक सिद्धांत नहीं दिए, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने के लिए मजबूत संरचना भी बनाई। उन्होंने संन्यास की बिखरी परंपराओं को दशनामी (गिरि, पुरी, भारती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ, आश्रम और सरस्वती) के अंतर्गत व्यवस्थित किया। यह केवल नामों का विभाजन नहीं था, बल्कि इसके पीछे निरंतर भ्रमण करने वाले संन्यासी की अवधारणा थी, जिससे ज्ञान केवल मठों तक सीमित न रहकर जन-सामान्य तक पहुँचे।

इन नामों के माध्यम से उन्होंने भारत की भौगोलिक विविधता को अध्यात्म से जोड़ा। यह संभवतः विश्व का पहला संगठित प्रयास था, जिसमें संन्यास को व्यक्तिगत मुक्ति के साथ-साथ समाज कल्याण का दायित्व दिया गया। भारतीय दर्शन में किसी मत की स्थापना के लिए उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता (प्रस्थानत्रयी) पर भाष्य आवश्यक माना जाता है। शंकराचार्य के भाष्य केवल व्याख्या नहीं, बल्कि गहन वैचारिक क्रांति थे। उन्होंने उपनिषद भाष्य के माध्यम से अविद्या को हटाकर जीव और ब्रह्म की एकता को स्पष्ट किया और यह स्थापित किया कि ज्ञान कर्म का भाग नहीं, बल्कि स्वतंत्र फल देने वाला है। ब्रह्मसूत्र भाष्य में उन्होंने तर्क के आधार पर द्वैतवाद का खंडन किया और सूक्ष्म विचारों को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया।

शंकराचार्य ने गीता भाष्य में निष्काम कर्म को मन की शुद्धि का साधन बताया और उसे ज्ञान प्राप्ति का मार्ग माना। सामान्यतः उन्हें केवल निषेधात्मक दार्शनिक माना जाता है, किंतु उनके विचारों का गहराई से अध्ययन बताता है कि वे समावेश के पक्षधर थे। उन्होंने बौद्ध शून्यवाद की तार्किकता को स्वीकार किया, पर उसे उपनिषदों के ब्रह्म से जोड़ा। उनका संन्यास संप्रदाय सुरक्षा कवच था और भाष्य ज्ञान का प्रकाश। इसने संस्कृति की रक्षा भी की और भ्रम भी दूर किए। उनके विचार आज भी आधुनिक विज्ञान की कई अवधारणाओं को चुनौती देते प्रतीत होते हैं।

आद्य गुरु द्वारा स्थापित चारों पीठ केवल मठ नहीं, बल्कि चेतना के केंद्र हैं। प्रत्येक पीठ को एक वेद, एक महावाक्य और एक विशेष उत्तरदायित्व दिया गया, जो उनकी गहरी दृष्टि को दर्शाता है। पुरी में ऋग्वेद और “प्रज्ञानं ब्रह्म”, द्वारका में सामवेद और “तत्त्वमसि”, ज्योतिर्मठ में अथर्ववेद और “अयमात्मा ब्रह्म”, तथा शृंगेरी में यजुर्वेद और “अहं ब्रह्मास्मि” का आधार रखा गया। इनसे यह सुनिश्चित हुआ कि देश का कोई भी भाग ज्ञान से वंचित न रहे। आज का विज्ञान जिस एकीकृत सत्य की खोज में है, अद्वैत वेदान्त उस विचार को बहुत पहले ही प्रस्तुत कर चुका है। शंकर के अनुसार विविधता केवल नाम और रूप की है, मूल तत्व एक ही है।

शंकराचार्य का दर्शन केवल अतीत का नहीं, भविष्य का भी मार्गदर्शक है। उनके कार्यों ने भारत को भौगोलिक रूप से जोड़ा और उनके अद्वैत ने विचारों को एक आधार दिया, जहाँ धर्म और विज्ञान में विरोध नहीं रहता। उनके स्तोत्रों में जहाँ गहरी भक्ति है, वहीं भाष्यों में कठोर तर्क दिखाई देता है। “शिवः शक्त्या युक्तः…” जैसे सूत्रों में उन्होंने स्पष्ट किया कि शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं। यहाँ वेदान्त और तंत्र का मेल दिखाई देता है। उनके अनुसार माया केवल बंधन नहीं, बल्कि सृजन की शक्ति भी है। उनके विचार बताते हैं कि आध्यात्मिक अनुभव केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन में अनुभव की जाने वाली शक्ति है।

आज का विश्व विभाजन और पहचान के संकट से जूझ रहा है। ऐसे समय में अद्वैत दर्शन एक वैश्विक नैतिक दृष्टि देता है। जब कहा जाता है “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, तो प्रकृति और मानव का भेद मिट जाता है। यही विचार उपभोक्तावाद और पर्यावरण संकट का समाधान भी देता है। आधुनिक मनुष्य स्वयं को अलग मानकर अकेलापन अनुभव करता है, जबकि “अहं ब्रह्मास्मि” उसे व्यापकता का बोध कराता है। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सिद्धांत सामाजिक संघर्षों को समाप्त करने की क्षमता रखता है।

आचार्य शंकर ने अपने स्तोत्रों से हृदय और भाष्यों से बुद्धि को संतुलित किया। उनका अद्वैत उस भविष्य का आधार है, जहाँ मनुष्य तकनीकी रूप से सक्षम और आध्यात्मिक रूप से संतुलित होगा। उनकी यात्राओं ने भारत की एकता को सुरक्षित रखा और उनके विचारों ने उसकी आत्मा को। उन्होंने सिद्ध किया कि अद्वैत पलायन नहीं, बल्कि हर व्यक्ति में एक ही सत्य को देखना है। यही विचार आज के मानवाधिकार और वैश्विक एकता के लिए गहरी आधारशिला प्रदान करता है।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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