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जनतंत्र को पलीता लगाने में क्या केजरीवाल पीछे थे?

लप्पड़ खाने के बाद रुआंसे घूम रहे केजरीवाल से भी तो यह पूछा जाना चाहिए कि पिछले साढ़े तेरह बरस से वे भारत के लोकतंत्र का नमक अदा करने के लिए काम कर रहे थे या जनतंत्र की तेरहवीं के आयोजन में एक निष्ठावान गुपचुप सहयोगी बने बैठे हैं?… छद्म संघर्ष से आगे आए केजरीवाल द्वारा अपने कर्मठ सहयोगियों को परे कर धनपशुओं को तरज़ीह देने के उन के इस मूल चरित्र पर आप क्या कहेंगे?

आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्य अरविंद केजरीवाल का पल्लू झटक कर भारतीय जनता पार्टी में चले गए तो अपने दफ़्तर से महात्मा गांधी की तस्वीर हटा कर एक तरफ़ कर देने वाले केजरीवाल तपस्वी की मुद्रा में राजघाट जा कर बैठ गए। सातों चालबाज़ों ने जो किया, वह सियासत में वैचारिक पतन का चरम है। उन्हें नमकहराम वग़ैरह कहने से ज़्यादा नरमबयानी क्या हो सकती है? मगर यह लप्पड़ खाने के बाद रुआंसे घूम रहे केजरीवाल से भी तो यह पूछा जाना चाहिए कि पिछले साढ़े तेरह बरस से वे भारत के लोकतंत्र का नमक अदा करने के लिए काम कर रहे थे या जनतंत्र की तेरहवीं के आयोजन में एक निष्ठावान गुपचुप सहयोगी बने बैठे हैं?

केजरीवाल और उन की आम आदमी पार्टी की जन्म-नाल क्या नागपुर के रेशमबाग में नहीं गड़ी हुई है? क्या केजरीवाल और उन की आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा कूटरचित फ़र्ज़ी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज नहीं है? क्या केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने 2012 में अपनी स्थापना के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नायब-सूबेदार की भूमिका निभाने के अलावा कुछ और किया है? क़दम-क़दम पर प्रतिपक्षी सियासत की चूलें हिलाने का अपकर्म करने वाले केजरीवाल आज अगर अपने ही बोए बबूलों के रवैए पर रुदन कर रहे हैं तो उन्हें करने दीजिए। उन्हें छोड़ कर गईं सात शक़्लें जितनी घिनौनी हैं, केजरीवाल ख़ुद भी उन से कम अधम नहीं हैं।

आम आदमी पार्टी ने देश के तकरीबन हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभाओं के चुनाव लड़े हैं। हर जगह अपने उम्मीदवारों को उतारनेके सांचे की डिज़ाइन ऐसी रही है कि कांग्रेस और दूसरे सेकुलर राजनीतिक दलों के वोट स्पष्टतौर पर कटें और भाजपा को फ़ायदा हो। आम आदमी पार्टी ने 2012 से अप्रैल 2026 तक विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में 2585 उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें से 299 उम्मीदवार जीते। 2286 हार गए।

केजरीवाल ने दिल्ली के 2013, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में 278 उम्मीदवार उतारे। चार चुनावों में उन में से 179 जीते। 2013 में 28, 2015 में 67, 2020 में 62, और 2025 में आम आदमी पार्टी के 22 प्रत्याशी जीते। पंजाब में केजरीवाल ने 2017 और 2022 में कुल 229 उम्मीदवार उतारे। इन में से 112 जीते। 2017 में 20 और 2022 में 92। गोवा में 2017 और 2022 में 78 उम्मीदवार उतारे। उन में से सिर्फ़ 2 जीते। गुजरात में 2017 और 2022 में 209 उम्मीदवार उतारे।  उन में से महज़ 5 जीते। 2024 के चुनाव में जम्मू-कश्मीर में केजरीवाल के 7 उम्मीदवार उतरे और 1 जीता।

जीत की शून्य संभावना होते हुए भी अन्य राज्यों में केजरीवाल ने भाजपा की राह समतल बनाने के लिए अपने उम्मीदवारों की झड़ी लगाने में कभी कसर बाकी नहीं रखी। 2022 में आम आदमी पार्टी के उत्तर प्रदेश में 349, मध्य प्रदेश में 277, राजस्थान में 227 और कर्नाटक में 237 प्रत्याशी उतारे गए। 2015 में बिहार में 121, छत्तीसगढ़ में 142 और हरियाणा में 134 उम्मीदवार केजरीवाल ने उतारे। इन डेढ़ हज़ार उम्मीदवारों में से एक भी नहीं जीता।

अभी आम आदमी पार्टी के पास कुल 121 विधायक हैं। दिल्ली में 22, पंजाब में 94 और छिटपुट कुछ और बाकी प्रदेशों में। ज़्यादातर राज्यों में ‘आप’ को सिर्फ़ 1 से 3 प्रतिशत के बीच वोट मिले हैं। इन राज्यों में उस के सभी गैर-विजेता उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। गोवा में 39 में से 38 की, गुजरात में 181 में से 128 की, कर्नाटक में सभी 209 की, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सभी 205 उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं।

इन में से ज़्यादातर को ‘नोटा’ से भी कम वोट मिले। पंजाब तक में जब केजरीवाल के 20 विधायक बने थे, तब भी 25 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी। तो जिस पार्टी के पिछले साढ़े 13 साल से पूरे देश में साढ़े 88 फ़ीसदी उम्मीदवार प्रदेशों की विधानसभाओं में बुरी तरह हार रहे हों, वह वोट काट कर किन्हें नुकसान पहुंचाने और किसे फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव लड़ने का धंधा कर रही है – यह तो साफ है।

अब आइए लोकसभा पर। आम आदमी पार्टी ने 2012 से अब तक लोकसभा चुनावों में 2014, 2019 और 2024 में कुल 489 उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें से केवल 8 उम्मीदवार जीते। 2014 में 4, 2019 में 1 और 2024 में 3। इन तीनों चुनावों में उतरे 489 उम्मीदवारों में से 446 की जमानत जब्त हो गई। अपने जन्म के महज़ डेढ़ साल बाद, 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 432 उम्मीदवार मैदान में उतार डाले। 543 के सदन की 90 फ़ीसदी सीटों पर प्रत्याशी देने की हिम्मत उन में किस के इशारों से आई होगी? जिन्हें अब भी यह समझ में नहीं आ रहा, उन की बुद्धि को मैं प्रणाम करता हूं।

2014 में उतरे 489 प्रत्साशियों में से सिर्फ़ 4 जीते। 414 की जमानत जब्त हो गई। आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 2.1 प्रतिशत था। 2019 में केजरीवाल ने 35 उम्मीदवार उतारे। 1 जीता पंजाब के संगरूर में। 30 की जमानत जब्त हो गई। 0.4 प्रतिशत वोट मिले। 2024 में 22 उम्मीदवार उतारे। 3 जीते। तीनों पंजाब में। 2 की जमानत जब्त हुई। 1.11 प्रतिशत वोट मिला।

तो जो पार्टी लोकसभा के चुनाव में अपने 98 प्रतिशत उम्मीदवार हारने के लिए उतारती हो, चुनाव लड़ने के पीछे उस की असली मंशा क्या है – इतना तो कोई भी समझ ही सकता है। अगर आम आदमी पार्टी साढ़े तेरह बरस से भाजपा की बी-टीम नहीं है तो क्या है?। उस का बुनियादी लक्ष्य देश में सेकुलर शक्तियों को कमजोर करना है। इसीलिए इंडिया समूह की एकजुटता को भंग करने की पहलक़दमी के लिए केजरीवाल ने सटीक समय चुना था।

केजरीवाल के अपकर्मों और आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों को मजबूर कर अपने पाले में लपकने के भाजपाई दुष्कर्मों का लेखाजोखा बुरी तरह सड़ांध भरा है। बावजूद इस के कि पंजाब में 2022 के चुनाव में भाजपा को सिर्फ़ 6.6 प्रतिशत वोट मिले थे और 117 सदस्यों वाली विधानसभा में उस के सिर्फ़ 2 विधायक जीत कर पहुंचे थे, ‘मोशा’-मंडली ने ऐसा जालबट्टा बिछाने में कोई गुरेज़ नहीं किया कि पंजाब से राज्यसभा की 85.7 प्रतिशत हिस्सेदारी, तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों और परंपराओं को ठेंगा दिखाते हुए, रातोंरात उन की गोद में टपक पड़ी।

एक और अहम बात, जिस की तरफ़ देश का ध्यान कांग्रेस के, सांगठनिक तौर पर चैथे और व्यावहारिक तौर पर पांचवे क्रम के, सब से महत्वपूर्ण नेता अजय माकन ने दिलाया है। उन्होंने संवाददाता सम्मेलन कर यह बेहद दिलचस्प और आधारभूत मुद्दा उठाया कि आम आदमी पार्टी के सात दग़ाबाज़ सांसदों की कुल संपत्ति 8 अरब 18 करोड़ 50 लाख 35 हज़ार 420 रुपए की है। उन्होंने इस आंकड़े के अंतिम तीन अंक – 420 – को रेखांकित किया। सांसदों के चुनावी हलफ़नामों के आधार पर माकन ने बताया कि एक भगोड़े सांसद की औसत संपत्ति 1 अरब 16 करोड़ 92 लाख 90 हज़ार 774 रुपए की है।

छद्म संघर्ष से आगे आए केजरीवाल द्वारा अपने कर्मठ सहयोगियों को परे कर धनपशुओं को तरज़ीह देने के उन के इस मूल चरित्र पर आप क्या कहेंगे? ‘मोशा’ और किसन बाबूराव हजारे के वंशज की सियासी जुगलबंदी के इस अमृतकाल पर हम थू-थू करें या नाचें-गाएं!

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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