यह मुद्दा सिर्फ मीडिया का नहीं है। अगर खोजी पत्रकारिता कमजोर हुई तो नागरिकों का जानने का अधिकार प्रभावित होगा। लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही तभी संभव है जब मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष हो। आनेवाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस संतुलन को तय करेगा। उम्मीद की जा सकती है कि अदालत निजता की रक्षा के साथ ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर नहीं होने देगी।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट:
हाल ही में डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 और उसके नियमों 2025 के खिलाफ याचिका दायर की है। देश के 21 प्रमुख मीडिया संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून पत्रकारीय गतिविधियों के लिए कोई स्पष्ट छूट नहीं देता, जिससे खोजी पत्रकारिता बाधित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है और 17 नवंबर को सुनवाई तय की है। अदालत ने इस पर किसी भी तरह की अंतरिम रोक नहीं लगाई, लेकिन निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया।
उल्लेखनीय है कि इस याचिका में याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि कानून पत्रकारों, संपादकों और समाचार संगठनों को ‘डेटा फिड्यूशियरी’ मानकर नोटिस, सहमति और डेटा मिटाने जैसी बाध्यताएं लागू करता है। इस क़ानून की धारा 7 (वैध उपयोग) और धारा 17 (छूट) में पत्रकारिता का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि पहले के मसौदों (2018, 2019, 2021) में ऐसी छूट थी। इसकी अनुपस्थिति का मतलब है कि किसी व्यक्ति पर रिपोर्ट लिखते समय उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है। ऐसी खोजी रिपोर्टों में यदि संदिग्ध को पहले से सूचित किया जाए तो वह सबूत नष्ट करने, गवाहों को धमकाने या कहानी रोकने का प्रयास कर सकता है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दिवान ने अदालत में कहा कि इससे “न्यूज़रूम बंद हो जाएंगे” और यह खबरों पर ‘प्री-सेंसरशिप’ जैसा है।
इसके अलावा, धारा 36 और नियम 23 के तहत सरकार बिना न्यायिक निगरानी के किसी भी डेटा फिड्यूशियरी से जानकारी मांग सकती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह पत्रकारीय स्रोतों को उजागर कर सकता है। धारा 44(3) ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) में संशोधन कर ‘व्यक्तिगत सूचना’ को व्यापक रूप से छूट दे दी है। पहले सार्वजनिक हित का प्रावधान था, अब वह हटा दिया गया है। इससे आरटीआई के जरिए सार्वजनिक पदाधिकारियों की जानकारी हासिल करना और कठिन हो सकता है।
वहीं सरकार का आधिकारिक रुख निजता की रक्षा है। 2017 के पुट्टस्वामी फैसले के बाद निजता मौलिक अधिकार बन चुकी है। सरकार का तर्क है कि आज के डिजिटल युग में विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म और कंपनियों द्वारा डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए यह कानून जरूरी माना गया। विभिन्न मीडिया संगठनों और उनके प्रतिनिधियों के साथ हुई कुछ बैठकों में मीडिया संगठनों को आश्वासन भी दिए गए कि इस क़ानून से प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होगी। लेकिन लिखित छूट न होने और पहले के मसौदों से हटाए जाने पर सवाल उठते हैं। आलोचक कहते हैं कि राज्य को कई छूटें हैं, जबकि सार्वजनिक हित की पत्रकारिता को नहीं। करोड़ों रुपये तक के बड़े जुर्मानों का डर स्व-सेंसरशिप बढ़ा सकता है।
सरकार का इरादा भले ही शुद्ध रूप से निजता संरक्षण हो, लेकिन कानून के प्रावधानों में अस्पष्ट भाषा और असमान छूटें इसे सत्ता के खिलाफ आवाजों को नियंत्रित करने का औजार बना सकती हैं। गौरतलब है कि इतिहास में भी प्रेस पर अंकुश लगाने के कई उदाहरण रहे हैं। लेकिन अंकुश ज़्यादा दिनों तक चल नहीं पाए।
यदि दुनिया भर के उदाहरण लिए जाएँ तो यूरोपीय संघ के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) के अनुच्छेद 85 में स्पष्ट कहा गया है कि सदस्य देश डेटा संरक्षण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (पत्रकारिता सहित) के बीच सामंजस्य बिठाएं। ब्राजील के सामान्य डेटा संरक्षण कानून (LGPD) और कई अन्य देशों में भी पत्रकारीय उद्देश्य के लिए छूट या संतुलित प्रावधान हैं। ये कानून निजता की रक्षा करते हैं, लेकिन सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग को रोकते नहीं। भारत में ऐसी स्पष्ट छूट का न होना वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से हटकर माना जा सकता है।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। खोजी पत्रकारिता भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और सार्वजनिक मुद्दों को उजागर करती है। अगर हर रिपोर्ट के लिए सहमति जरूरी हो जाए, तो कई कहानियां छप ही नहीं पाएंगी। स्रोत गोपनीयता खतरे में पड़ने से व्हिसलब्लोअर और आम नागरिक भी जानकारी साझा करने से हिचकिचाएंगे। विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग पहले से ही चिंताजनक बनी हुई है। ऐसे कड़े क़ानून के प्रावधान इसे और खराब कर सकते हैं।
निजता और सूचना का अधिकार दोनों मौलिक हैं और इसमें संतुलन भी जरूरी है। समाधान यह हो सकता है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट दी जाए, जो प्रेस काउंसिल या स्व-नियामक संहिताओं से जुड़ी हो। सार्वजनिक हित का परीक्षण, आनुपातिकता और न्यायिक निगरानी जैसी सुरक्षाएं भी रखी जाएं। डेटा मिटाने के अधिकार को प्रकाशित खबरों पर लागू न किया जाए, खासकर जब वे सार्वजनिक रिकॉर्ड बन चुकी हों।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यह मुद्दा सिर्फ मीडिया का नहीं है। अगर खोजी पत्रकारिता कमजोर हुई तो नागरिकों का जानने का अधिकार प्रभावित होगा। लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही तभी संभव है जब मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष हो। आनेवाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस संतुलन को तय करेगा। उम्मीद की जा सकती है कि अदालत निजता की रक्षा करे, लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर न होने दे। अन्यथा यह स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है, जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए खतरनाक होगा।
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