कबीर भारतीय दर्शन के मौलिक प्रवर्तक नहीं, बल्कि उसके अद्वितीय व्याख्याकार और लोकभाषा के महान संवाहक हैं। उन्होंने उपनिषदों के अद्वैत, हठयोग की अंतर्यात्रा और गीता के अनासक्ति योग को एक सूत्र में पिरोकर ऐसा जीवनदर्शन दिया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना छह सौ वर्ष पहले था।
29 जून : कबीर जयंती विशेष
भारतीय चिंतन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने सत्य को किसी एक मत, संप्रदाय या व्यक्ति तक सीमित नहीं माना। ऋग्वेद का उद्घोष—“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”—यानी सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में व्यक्त करते हैं, इसी सनातन दृष्टि का आधार है। संत कबीर इसी अखंड भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने उपनिषदों, वेदांत, योग और भक्ति के गूढ़ तत्वों को लोकभाषा में सरल और सहज रूप देकर जन-जन तक पहुंचाया। वे कोई नया धर्म या दर्शन लेकर नहीं आए, बल्कि भारतीय मनीषा के शाश्वत सत्य को जीवन और व्यवहार में उतारने वाले संत थे।
कबीर के दर्शन का मूल आधार अद्वैत है। उपनिषद जिस निराकार, निर्गुण और सर्वव्यापी ब्रह्म की चर्चा करते हैं, कबीर उसी सत्य को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त करते हैं—
जाके मुंह माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप। पुहुप बास ते पातरा, ऐसा तत्व अनूप।।
यह वही तत्व है जिसे उपनिषद “नेति-नेति” कहकर व्यक्त करते हैं—जो किसी रूप, आकार या सीमा में बंधा नहीं है। वह पुष्प की सुगंध से भी अधिक सूक्ष्म है। कठोपनिषद आत्मा को “अशब्द, अस्पर्श, अरूप और अविनाशी” बताता है। कबीर भी उसी परम तत्व की अनुभूति कराने का प्रयास करते हैं। उनके लिए ईश्वर बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर है। इसलिए वे कहते हैं—
ज्यों नैनन में पुतली, त्यों खालिक घट माहिं। मूरख लोग न जानहीं, बाहर ढूँढन जाहिं।।
यह दोहा छान्दोग्य उपनिषद के “तत्त्वमसि” और बृहदारण्यक उपनिषद के “अहं ब्रह्मास्मि” जैसे महावाक्यों का लोकभाषा में रूपांतरण है। योगशिखोपनिषद भी कहता है कि यह शरीर ही देवालय है और इसके भीतर स्थित जीव ही सनातन देव है। इसलिए ईश्वर की खोज बाहर नहीं, अपने भीतर करनी चाहिए।
कबीर ने केवल अद्वैत का प्रतिपादन ही नहीं किया, बल्कि माया के रहस्य को भी अत्यंत व्यावहारिक रूप में समझाया। उपनिषद और गीता जिस माया को मनुष्य के बंधन का कारण बताते हैं, कबीर उसे “महा ठगिनी” कहते हैं—
माया महा ठगिनी हम जानी। तिरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।।
यह माया केवल धन या वैभव नहीं है। यह वह मानसिक अवस्था है, जो नश्वर को शाश्वत और असत्य को सत्य मानने का भ्रम पैदा करती है। गीता कहती है—“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।” कबीर इसी त्रिगुणात्मक माया से सावधान करते हैं। उनका संघर्ष केवल सामाजिक कुरीतियों से नहीं था, बल्कि मनुष्य के भीतर बैठे अज्ञान, अहंकार और मोह से था।
भारतीय संस्कृति में गुरु को परमात्मा तक पहुंचाने वाला सेतु माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्मज्ञान के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण आवश्यक है। कबीर ने इसी सत्य को अपने प्रसिद्ध दोहे में अमर कर दिया—
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
कबीर की दृष्टि में गुरु ईश्वर से बड़ा नहीं है, लेकिन ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग वही दिखाता है। इसलिए गुरु का स्थान सर्वोच्च है। यह भारतीय गुरु-परंपरा की ही पुनर्पुष्टि है।
कबीर की सबसे रहस्यपूर्ण रचनाएं उनकी उलटबांसियां हैं। सामान्य पाठक उन्हें विरोधाभासी या असंगत मान लेते हैं, जबकि उनका आधार भारतीय योग, वेदांत और तंत्र की सांकेतिक भाषा है। कबीर कहते हैं—
एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई। पहले पूत पीछे भई माई, चेला के गुरु लागै पाई।।
यह कोई निरर्थक कथन नहीं है। यहां सिंह जाग्रत आत्मा का प्रतीक है और गाय चंचल इंद्रियों का। जब आत्मा इंद्रियों पर शासन करती है, तभी साधना सफल होती है। इसी प्रकार “पहले पुत्र, पीछे माता” का अर्थ है कि ज्ञान जागने पर वही बुद्धि माया के वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है, जिससे उसका जन्म हुआ था।
कबीर की उलटबांसियां हमें यह बताती हैं कि आध्यात्मिक सत्य को केवल तर्क से नहीं समझा जा सकता। उसके लिए साधना, अनुभव और अंतर्मुखी चेतना आवश्यक है। यही कारण है कि उनकी भाषा पहली दृष्टि में रहस्यमय लगती है, लेकिन भारतीय दर्शन और योग की पृष्ठभूमि में उसका गहरा अर्थ खुलता है।
कबीर के दर्शन में “शब्द” का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय व्याकरण परंपरा, विशेषकर भर्तृहरि के वाक्यपदीयम् में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों में भी नाद और शब्द को साधना का माध्यम माना गया है। कबीर इसी शाश्वत परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं—
शब्द शब्द बहुंतरे, शब्द के हाथ न पांव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।।
यहां शब्द केवल बोलचाल की भाषा नहीं है, बल्कि वह आंतरिक अनहद नाद है, जिसकी चर्चा नादबिंदू उपनिषद में मिलती है। योग साधना के अनुसार जब मन बाहरी विषयों से हटकर भीतर स्थिर होता है, तब साधक उस अनाहत ध्वनि का अनुभव करता है। कबीर का “शब्द” उसी आध्यात्मिक अनुभव का संकेत है।
इसी कारण कबीर को केवल समाज सुधारक मानना उनके दर्शन को सीमित करना होगा। उनका सामाजिक संदेश भी आध्यात्मिक आधार पर टिका है। जब वे कहते हैं—
अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बन्दे।
एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मन्दे।।
तो वे किसी नई सामाजिक विचारधारा की स्थापना नहीं कर रहे होते। वे ईशावास्योपनिषद के उस सत्य को लोकभाषा में दोहरा रहे होते हैं कि समस्त जगत उसी एक परम तत्व से व्याप्त है। जब सबमें एक ही चेतना है, तब जाति, संप्रदाय और ऊंच-नीच का कोई आध्यात्मिक आधार नहीं रह जाता।
कबीर की उलटबांसियों का दूसरा आधार हठयोग है। नाथ परंपरा और योग साधना से उनका गहरा संबंध था। इसलिए वे साधना के अनुभवों को प्रतीकों में व्यक्त करते हैं। उनका प्रसिद्ध पद है—
उलटा कूंवा गगन में, तिसमें जरै चिराग।
बिन तेलै बिन बातिया, बरै अहोदिन रात।।
यह उलटा कुआं सहस्रार चक्र का प्रतीक है। योगशास्त्र के अनुसार जब कुंडलिनी शक्ति सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठती है, तब साधक भीतर उस अखंड ज्योति का अनुभव करता है, जिसे किसी तेल या बाती की आवश्यकता नहीं होती। कबीर ने कठिन योगशास्त्र को लोकभाषा के सरल रूपकों में व्यक्त किया है।
इसी प्रकार वे कहते हैं—
तरवर एक मूल बिन ठाढ़ा, पत्र विहीन फूल फल लागा।
उवा सुआ न बैठै डाली, कबीरदास यहु पद निहोरी।।
यह रूपक श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में वर्णित ऊर्ध्वमूल अश्वत्थ वृक्ष की याद दिलाता है। यहां बिना जड़ का वृक्ष उस परम सत्य का प्रतीक है, जो स्वयं किसी आधार पर नहीं टिका, बल्कि समस्त सृष्टि का आधार है। “सुआ” जीवात्मा का प्रतीक है, जो संसार के बंधनों से मुक्त होकर उसी परम तत्व में लीन हो जाता है।
कबीर के दर्शन का तीसरा महत्वपूर्ण आधार श्रीमद्भगवद्गीता का अनासक्ति योग है। गीता का संदेश है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थात कर्म करो, लेकिन फल में आसक्ति मत रखो। कबीर ने इसी सत्य को अपनी प्रसिद्ध “चदरिया” के रूपक में व्यक्त किया—
दास कबीर जतन सो ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।।
यह चदरिया मनुष्य के जीवन और शरीर का प्रतीक है। संसार में रहते हुए, कर्म करते हुए और परिवार का निर्वाह करते हुए भी यदि मनुष्य भीतर से निर्मल बना रहे, तो वही सच्चा अनासक्ति योग है। कबीर स्वयं जुलाहे थे। उन्होंने गृहस्थ जीवन जिया, श्रम किया, समाज में रहे, पर भीतर से निर्लिप्त रहे। यही गीता के स्थितप्रज्ञ पुरुष की पहचान है।
इसीलिए कबीर को केवल ज्ञानी, केवल भक्त या केवल समाज सुधारक कहना उचित नहीं होगा। उनके भीतर ज्ञान, भक्ति और कर्म—तीनों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वे कहते हैं—
भगति दुहेली प्रेम की, नहिं कायर का काम।
सीस उतारे हाथि करि, सो लेसी राम नाम।।
यहां सिर काटने का अर्थ शरीर का विनाश नहीं, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। जब तक “मैं” जीवित है, तब तक परम सत्य का अनुभव नहीं हो सकता। यही गीता के भक्ति योग और पुरुषोत्तम योग का भी मूल संदेश है।
स्पष्ट है कि कबीर भारतीय दर्शन के मौलिक प्रवर्तक नहीं, बल्कि उसके अद्वितीय व्याख्याकार और लोकभाषा के महान संवाहक हैं। उन्होंने उपनिषदों के अद्वैत, हठयोग की अंतर्यात्रा और गीता के अनासक्ति योग को एक सूत्र में पिरोकर ऐसा जीवनदर्शन दिया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना छह सौ वर्ष पहले था। विभाजन, संकीर्णता और बाहरी आडंबरों से घिरे आज के समय में कबीर हमें भीतर लौटने, स्वयं को पहचानने और समस्त मानवता में उसी एक चेतना को देखने की प्रेरणा देते हैं। यही कबीर जयंती पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।


