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नरेंद्र भाई भूल गए थे कि बड़ा तो बड़ा ही होता है

अटलजी तो अटलजी थे। जुगाड़ू सरकार का मुखिया बनाने के लिए उन की पालकी लोग अपने कंधों पर ख़ुशी-ख़ुशी लाद कर रायसीना पहाड़ी तक ले गए थे। नरेंद्र भाई तो लोगों के कंधों पर जबरन लद कर रायसीना पहाड़ी पहुंचे हैं। एक प्रचारक और दूसरे प्रचारक का यह फ़र्क़ सबसे बड़ा फ़र्क़ है।यदि अब नरेंद्र भाई की चुनावी मुसीबत के वक़्त संघ ने भी चिकने घड़े का ज़ामा ओढ़ लिया है तो कुसूर किस का है? नरेंद्र भाई उम्र में मोहन जी 6 दिन छोटे हैं। और उन्हें मालूम होना चाहिए कि बड़ा-तो-बड़ा ही होता है।

नरेंद्र भाई मोदी हमेशा कहते हैं कि वे सब से पहले संघ के स्वयंसेवक हैं, बाद में कुछ और। मैं भी संघ के प्रचारक से भारत के प्रधानमंत्री बनने की उनकी उपलब्धि को बड़ा नहीं, बहुत बड़ा मानता हूं। प्रचारक से प्रधानमंत्री तो अटल बिहारी वाजपेयी भी बने थे, मगर हर मायने में नरेंद्र भाई ने जो हासिल किया, वह अटलजी से भी बहुत ज़्यादा बड़ा है। इसलिए कि अटलजी तो अटलजी थे। जुगाड़ू सरकार का मुखिया बनाने के लिए उन की पालकी लोग अपने कंधों पर ख़ुशी-ख़ुशी लाद कर रायसीना पहाड़ी तक ले गए थे। नरेंद्र भाई तो लोगों के कंधों पर जबरन लद कर रायसीना पहाड़ी पहुंचे हैं। एक प्रचारक और दूसरे प्रचारक का यह फ़र्क़ सबसे बड़ा फ़र्क़ है।

इसलिए आज के चुनावी दौर में आप के लिए यह जानना ज़रूरी है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और नरेंद्र भाई मोदी के बीच के रिश्तों की मधुरता, ऊपर-ऊपर से नहीं, भीतर-भीतर से कैसी है? 2014 में जब नरेंद्र भाई अपने आसपास के तमाम सहयोगियों को कुचलते हुए, दनदनाते हुए, रायसीना की पहाड़ी पर चढ़े थे और यह माहौल बन गया था कि जो हैं, वे ही हैं; तब, याद कीजिए कि, चुनाव नतीजों के दो महीने के भीतर ही भागवत जी ने सार्वजनिक तौर पर क्या बयान दिया था? भागवत जी ने कहा था कि भाजपा को जीत किसी एक व्यक्ति की वज़ह से नहीं मिली है। इसे किसी व्यक्ति-विशेष की विजय मानना ठीक नहीं है।

इस के बाद ऐसे कई मौक़े आए, जब भागवत जी और नरेंद्र भाई के बीच तनातनी खुल कर सामने आई। आरएसएस के राजनीतिक मंच भारतीय जनता पार्टी की नहीं, नरेंद्र भाई और अकेले नरेंद्र भाई की सरकार, के पहले कार्यकाल का पहला बरस पूरा हुआ तो भागवत जी ने प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्रियों को प्रगति रिपोर्ट के साथ हाज़िर होने को कहा। नरेंद्र भाई बहुत कुनमुनाए। कोशिश की कि भागवत जी अपना ऐसा प्रभुत्व स्थापित न कर पाएं, ग़ोया वे सर्वेसर्वा हैं और नरेंद्र भाई उन का खड़ाऊं-राज चला रहे हैं। मगर सितंबर 2015 के पहले सप्ताह में आरएसएस ने दिल्ली में मध्यपदेश सरकार के राजकीय भवन मध्यांचल में तीन दिनों तक मोदी-सरकार के मंत्रियों को एक-एक कर तलब किया और उन से अपने-अपने मंत्रालयों की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट ली। आख़िरी दिन आखि़कार नरेंद्र भाई को भी मन मार कर भागवत जी के सामने अपनी फ़ाइलें ले कर पेशी देने पहुंचना पड़ा। आरएसएस के 15 सहयोगी संगठनों के प्रमुखों ने उन से कई मसलों पर जवाब तलब किए।

नरेंद्र भाई को इस में अपनी ऐसी हेठी लगी कि लगता है कि उन्होंने तभी ठान लिया कि वे आरएसएस की प्रभुता में काटछांट करेंगे और ख़ुद उस के मातहत काम करने के बजाय आरएसएस को अपनी उंगलियों के इशारे पर नचाएंगे। उन्होंने अगले ही दिन से इस योजना पर अमल शुरू कर दिया। नतीजा, जो निकलना था, निकला। वह दिन है और आज का दिन, फिर कभी आरएसएस प्रमुख ने नरेंद्र भाई और उन के मंत्रियों को प्रगति रिपोर्ट के साथ पेश होने को कहने की हिम्मत नहीं जुटाई। इस सालाना आयोजन के अंकुरों की भू्रणहत्या 2015 के फ़ौरन बाद ही हो गई। तब से अब तक नरेंद्र भाई आरएसएस की उच्च-मध्यम और मध्यम कतार को भागवत जी के साए से बाहर खींचने की सफल बिसात बिछाने में लगे रहे और भागवत जी अपने भरोसेमंद हमजोलियों के साथ उसकी असफल काट करने में पसीना बहाते रहे।

21 अक्टूबर 1951 को श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित की गई भारतीय जनसंघ तो तक़रीबन आरएसएस ही थी। लेकिन 1980 में जब जनसंघ भाजपा बनी तो पहली बार उस की भूमिका एक तरह से आरएसएस के राजनीतिक विशेष कर्तव्यस्थ प्रकोष्ठ की हो गई। तब से 34 साल, तक यानी 2014 तक, आरएसएस का बुनियादी दम-ख़म क्या था? सिर्फ़ यह कि वह भाजपा का पितामह है और भाजपा उस से पूछे, उस के कहे, बिना कुछ नहीं करती है। नरेंद्र भाई ने प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद इस अहसास का सुख आरएसएस से छीन लिया। उन्होंने भले ही संघ के बुनियादी एजेंडे को बहुत आक्रामक तरीके से लागू करने का काम किया। लेकिन यह संदेश एकदम साफ़ रखा कि जो कर रहे हैं, वे ख़ुद कर रहे हैं, किसी आरएसएस या किसी मोहन जी के डंडे के डर से नहीं कर रहे। नरेंद्र भाई इस बीच आरएसएस कॉडर के एक बड़े वर्ग को तरह-तरह की विधियां अपना कर सीधे अपनी तरफ़ खींच चुके थे। संघ के कुछ महत्वपूर्ण पदों पर अपने अविचल समर्थकों की नियुक्ति कराने में भी वे कामयाब हो गए थे। बाकी सब को तो ठीक, मगर आरएसएस तक को अपनी मुट्ठी में भींच लेने का उनका यह रवैया संघ के कई पुराने जीवनदानियों को रास नहीं आ रहा था। नरेंद्र भाई के ‘मैंमैंवाद’ ने संघ के एक बड़े तबके को मन-ही-मन धीरे-धीरे उन से दूर कर दिया।

आज यही दूरी, यही अनमनापन, 2024 के चुनाव में नरेंद्र भाई की सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है। पिछले दो-तीन महीनों में मैं ने संघ के जितने पुराने, ठोस और पारंपरिक स्वयंसेवकों को कांग्रेस की उम्मीदवारी के लिए कोशिश करते देखा, मैं अवाक था। उन में ऐसे लोग थे, जो भाजपा के सांस्कारिक दौर में  उस के सांसद रह चुके थे। वे अपने-अपने इलाकों के बेहद आदरणीय लोग थे। उनकी व्यथा मुझ से देखी नहीं जाती थी।

संघ-प्रमुख मोहन भागवत बीच-बीच में नरेंद्र भाई की कार्यशैली से अपनी ठोस असहमति के संकेत काफी पहले से दे रहे थे। 2018 की फरवरी में प्रधानमंत्री जी ने संसद में कहा कि मैं कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना पूरा करने की दिशा में बढ़ रहा हूं। चंद हफ़्तों बाद ही, अप्रैल की शुरुआत में, संघ-प्रमुख ने पुणे में आयोजित एक पुस्तक के विमोचन समारोह में कह दिया कि कांग्रेस-मुक्त भारत जैसे नारे राजनीतिक जुमले हैं और यह संघ की भाषा नहीं है। हम किसी को छांटने की भाषा इस्तेमाल नहीं करते हैं।

दो साल पहले 2022 के जून के पहले हफ़्ते में नागपुर में आरएसएस के अधिकारियों का प्रशिक्षण शिविर हुआ। तब ज्ञानवापी मस्जिद का मामला देश भर में, जानबूझ कर, ज़ोरों पर था और प्रधानमंत्री समेत भाजपा के बड़े-छोटे नेता उसे गरम बनाए हुए थे। लेकिन भागवत जी ने प्रशिक्षण शिविर में खुल कर कहा कि ज्ञानवापी का एक इतिहास है। ज्ञानवापी विवाद में आस्था के कुछ मुद्दे शामिल हैं और इस पर अदालत के फ़ैसला सब को स्वीकार करना चाहिए। भागवत जी आगे बोले कि रोज़ एक नया मामला क्यों निकालना? उस हम को झगड़ा नहीं बढ़ाना। हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना?

इस के ढाई-पौने तीन महीने बाद, सितंबर 2022 में, संघ-प्रमुख ख़ुद चल कर दिल्ली में कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित मस्जिद पहुंच गए और ऑल इंडिया इमाम संगठन के अध्यक्ष उमर अहमद इलियासी से मिले। खान-पान और पहनावे के आधार पर राष्ट्र-विरोधियों और राष्ट्रवादियों की पहचान करने के उस दुराग्रही दौर में 22 सितंबर की इस मुलाकात ने आरएसएस और भाजपा के बीच के समीकरणों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। मगर भागवत जी के इन संकेतों को ले कर नरेंद्र भाई चिकने घड़े बने रहे। सो, अगर अब नरेंद्र भाई की चुनावी मुसीबत के वक़्त संघ ने भी चिकने घड़े का ज़ामा ओढ़ लिया है तो कुसूर किस का है? नरेंद्र भाई उम्र में मोहन जी 6 दिन छोटे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि बड़ा-तो-बड़ा ही होता है।

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