‘इक्कीसवीं सदी भारत और भारतीय खिलाड़ियों के नाम रहेगी’, पिछली सदी के समापन पर देश के राजनेता और खेल आका इस प्रकार के दावे करते हुए नई सदी में दाखिल हुए थे। लेकिन फुटबॉल, हॉकी, एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक, टेनिस, बैडमिंटन और तमाम खेलों में भारतीय आधिपत्य की हुंकार भरने वाले फिलहाल मौन है। साल दर साल और प्रतियोगिता दर प्रतियोगिता हमारे खिलाड़ी अपने श्रेष्ठ को भी नहीं छू पा रहे हैं।
तारीफ की बात यह है कि खराब प्रदर्शन और शर्मनाक रिकॉर्ड के लिए अब मीडिया को भी दोषी माना जा रहा है। खासकर, प्रिंट मीडिया अर्थात समाचार पत्र-पत्रिकाओं पर खिलाड़ियों और खेल आकाओं का गुस्सा फूट रहा है। सवाल यह पैदा होता है कि खिलाड़ियों के लचर प्रदर्शन के लिए मीडिया कैसे जिम्मेदार हो सकता है? लेकिन इस दोषारोपण में तर्क है।
खासकर, समाचार पत्रों की भूमिका के बारे में जो कुछ कहा जा रहा है उसमें दम है और आरोपों के यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए, क्योंकि दो दशक पहले तक देश के विभिन्न राज्यों के स्थानीय खेलों को प्रिंट मीडिया में भरपूर स्थान दिया जाता था।
फिर चाहे खबर दिल्ली या कोलकाता की फुटबॉल लीग की हो, पंजाब का सुरजीत मेमोरियल हॉकी टूर्नामेंट हो, नेहरू हॉकी, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, तैराकी, राष्ट्रीय एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, गांव-देहात के दंगल, बॉडीबिल्डिंग, पावर लिफ्टिंग, मैराथन आदि खेल बड़े-छोटे समाचार पत्रों की सुर्खियों में जगह पाते थे। लेकिन आज सब कुछ बदल गया है।
देश के मीडिया के लिए क्रिकेट ही एकमात्र खेल रह गया है। एक बड़ा बदलाव यह आया है कि लगभग दो-ढाई दशक पहले मीडियाकर्मी स्टेडियमों और खेल स्थलों में जाकर खबरें जुटाते थे लेकिन अब खेल आयोजक स्वयं अखबार के दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं। फिर भी उनकी खबर नहीं छप पाती क्योंकि समाचार पत्रों में खेलों की सिर्फ ‘वजनदार’ खबरों को जगह दी जाती है।
क्योंकि खेल प्रेमियों तक विभिन्न खेल आयोजनों की जानकारी नहीं पहुंच पाती इसलिए तमाम मैच स्थल और स्टेडियम खाली पड़े रहते हैं। स्थानीय खबरों की अनदेखी और उपेक्षा का नतीजा सामने है। देश के खेल महज खानापूरी रह गए हैं। खेलों के परिणाम तो पूरा देश जानता ही है। फिर भी अकड़ यह है कि ओलम्पिक आयोजित करना है और दावा विश्व गुरु और खेल गुरु बनने का है।


