हमारा देश आजकल संविधान, क़ानून, नियम और स्थापित परंपराओं से नहीं, एक व्यक्ति के मन की बात और एक व्यक्ति के मस्तिष्क में कौंधने वाली तरंग के आधार पर चल रहा है। पिछले पौने बारह बरस में हम ने ऊलजुलूल फ़ैसलों की ऐसी अनगनित मिसालें देखी हैं, जिन का सिर-पैर न तो आज तक किसी समझदार की समझ में आया और न कभी आएगा। 1 अरब 47 करोड़ 50 लाख भारतवासियों के पास अपने पर थोपे जा रहे तरह-तरह के निर्णयों को बेबस मुद्रा में मन मसोस कर स्वीकार करते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। असहमति का हर स्वर देशद्रोह है। विरोध का हर प्रदर्शन नक्सल-गतिविधि है। हक़ की हर लड़ाई विदेशी ताक़तों द्वारा प्रायोजित है।
सनकसनंदनी फ़ैसलों की अनंत श्रंखला में ताज़ा उदाहरण है महिला आरक्षण विधेयक की आड़ में लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन करने के लिए बिछाई जा रही बहेलिया-बिसात। नरेंद्र भाई मोदी और उन की संपूर्ण ताबेदारी-हुकूमत ने इस मामले में ख़ुद को भले ही सात पर्दों के पीछे छुपाने की हरचंद कोशिशें कीं, मगर नज़रबाज़ों की नज़र से वे छुप न सके और पूरा देश यह अच्छी तरह जान गया है कि स्थगित की जा चुकी संसद की बैठक 14वें दिन ही, राज्य-विधानसभाओं के चुनावों के बीच, दोबारा क्यों बुला ली गई? यह बात भी दर-पर्दा नहीं रह सकी कि संसद की बैठक संसद की यह बैठक बुलाने के लिए आख़िर 14 दिनों का और इंतज़ार क्यों नहीं किया गया? विधानसभा चुनावों का अंतिम मतदान 29 अप्रैल को हो जाने के बाद भी तो विशेष सत्र बुलाया जा सकता था।
लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्रों को बढ़ा कर 850 करने की संख्या तय करने का आधार जानने का पुरज़ोर प्रयास विधेयक पर बोलने वाले हर विपक्षी सांसद ने किया। मगर सरकार की तरफ़ से इस का कोई जवाब देते नहीं बना कि आख़िर वह इस आंकड़े पर पहुंची किस फॉर्मूले के तहत है? परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ने की गुत्थी के हर आयाम पर दो दिन संसद में बहुत तफ़सील से बहस हुई। परिसीमन के लिए 15 बरस पुरानी 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधारभूमि बनाने के औचित्य पर भी प्रतिपक्षी सांसदों ने पूरे विस्तार से अपने शक़-शुबहे ज़ाहिर किए। लेकिन न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई ने अपने भाषण में उन का कोई स्पष्टीकरण दिया और न गृह मंत्री अमित भाई शाह ने उस पर कोई संतोषजनक सफाई दी।
पारदर्शिता अगर मौजूदा सरकार के स्वभाव में होती तो वह संसद में चर्चा के दौरान सामने आए सारे बिंदुओं पर अपनी बात कहती। लेकिन तीन विधेयकों को एक साथ नत्थी कर के उन्हें पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने के पीछे सरकार की नीयत संजीदा होने के बजाय सियासी सयानेपन की थी। ‘मोशा’-जोड़ी को शुरू से मालूम था कि विधेयक पारित होंगे ही नहीं, क्योंकि सत्तासीन-समूह के पास दो तिहाई सांसदों का बहुमत है ही नहीं। सो, संसदीय-मंचन तो सिर्फ़ यह माहौल बनाने के लिए किया गया था कि विपक्षी राजनीतिक दल लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने के ख़िलाफ़ हैं। मगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार के फैंके पांसे उलटे पड़ गए। समूचा देश समझ गया कि भाजपा की मंशा बतंगड़ खड़ा करने की है।
इसलिए जब विपक्ष ने कहा कि नारी शक्ति वंदन विधेयक तो दो बरस पहले सर्वसम्मति से पारित पारित हो चुका है तो सत्तापक्ष के पास इस का कोई जवाब नहीं था। जब विपक्ष ने पूछा कि महिला आरक्षण देने के मुद्दे को निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से क्यों संबद्ध किया जा रहा है तो सरकार चुप्पी साधे रही। जब विपक्ष ने सवाल उठाया कि महिलाओं को आरक्षण देने के लिए लोकसभा की सीटें बढ़ाने का इंतज़ार क्यों किया जा रहा है और मौजूदा 543 सीटों में से ही एक तिहाई – 181 सीटें – वह महिलाओं के लिए फ़ौरन आरक्षित करने के क़दम में साथ देने को तैयार है तो सत्तापक्ष ने रणनीतिक ख़ामोशी ओढ़ ली। प्रधानमंत्री ने विपक्ष को महिला विरोधी घोषित करने के लिए जितने भी तीर तरकश से निकाल कर अपने भाषण के धनुष पर चढ़ाए, वे सब ओंधे मुंह गिर गए।
रही-सही कसर प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने भाषण में बचपन में एक जादूगर के दिखाए जादू के किस्से सुना-सुना कर पूरी कर दी। उन की इस किस्सागोई से छलांग लगा कर बाहर आ रहे बिंबों ने सत्तापक्ष के सांसदों के चेहरों पर हवाइयां उड़ा दीं। सरकारी पक्ष की खिसियाहट ने सदन के भीतर का माहौल बेहद दिलचस्प बना दिया। स्पीकर ओम बिरला की कसमसाहट, बेचारगी और विवशता के मिलेजुले भाव संसद की दीवारों को न रोने दे रहे थे, न हंसने। राहुल के प्रतीकात्मक शब्द-तीर सीधे हुक्मरान-मंडली के दिलों में छेद कर रहे थे। जब राहुल ने कहा कि मैं जानता हूं कि हमारे प्रधानमंत्री जो कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं और मैं इतना जानता हूं कि उस सब का ज़िक्र अभी सदन में कर नहीं रहा हूं तो सत्तापक्ष के सांसदों की शक़्लें फक्क-सी पड़ गई थीं।
राहुल ने कहा कि जब जादूगर का एक करतब उस की ग़लती से नाकाम हो जाता है तो उस के बाद दर्शक उस के हर करतब को हंसी में उड़ाने लगते हैं। हमारा जादूगर भी अपने भीतर के तनाव के कारण, अपने भीतर की हताशा के कारण, आज हड़बड़ी में एक ग़लती कर फंस गया है। इसलिए उस के करतब देख कर तालियां बजाने वाले अब से उस के हर किए-धरे पर सिर्फ़ हंसा करेंगे। स्पीकर और सत्तापक्ष के सदस्य बार-बार इस बात पर एतराज़ कर रहे थे कि राहुल संकेतों में प्रधानमंत्री पर शाब्दिक हमले कर के सदन की गरिमा गिरा रहे हैं, मगर अपने तीर सीधे निशाने पर लगते देख राहुल घुमा-फिरा कर बार-बार जादूगर की जादूगरी पर पहुंचते रहे।
जिसे नरेंद्र भाई ने अपना ब्रह्मास्त्र समझा था, वह भग्नमनोरथी साबित हो गया। वे प्रतिपक्ष को नारी विरोधी और स्वयं को नारी अर्चक की तरह पेश करने में असफल रहे। उन पर बीच चुनावों में जबरदस्ती संसद का विशेष सत्र बुलाने की तोहमत लग गई। सियासी मक़सद पूरे करने के लिए सारे हथकंडों का इस्तेमाल करने का उन का रवैया एक बार और पुष्ट हो गया। उन्होंने विपक्ष के राजनीतिक दलों को जबरदस्त एकजुटता की फुहारों से फिर भिगो दिया। मुझे तो नहीं आया, क्या आप को समझ में आया कि इस पूरे घनचक्कर में नरेंद्र भाई के पल्ले आख़िर पड़ा क्या?
लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।


