“चलते रहो, चलते रहो” भारतीय पर्यटन दर्शन का मूल आधार है। सच्चा यायावर वही है, जो जहां भी जाए, वहां की संस्कृति को सम्मान दे, उसमें आत्मीयता के साथ घुल-मिल जाए और पूरे विश्व को एक परिवार की तरह अनुभव करे। “चरैवेति” का यही संदेश आज भी वैश्विक शांति, सतत विकास और मानवीय सौहार्द का सबसे बड़ा मार्ग है।मानव सभ्यता का इतिहास मूलतः गतिशीलता का इतिहास है। जहां जड़ता मृत्यु का संकेत है, वहीं गतिशीलता जीवन का स्पंदन है। भारतीय सनातन परंपरा में पर्यटन केवल सैर या मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक साधना, ज्ञान प्राप्त करने और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को जीवन में उतारने का माध्यम रहा है। वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र पर्यटन संगठन ने इस वर्ष का विषय “डिजिटल एजेंडा एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टू रीडिजाइन टूरिज्म” रखा है। ऐसे समय में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि तकनीकी प्रगति के इस दौर में हम पर्यटन की उस शाश्वत आत्मा को फिर से समझें, जिसका संदेश हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले दिया था।
भारतीय मनीषा ने मनुष्य को कभी एक ही स्थान पर पड़े रहने वाला कूपमंडूक नहीं माना। ऋग्वेद से लेकर ऐतरेय ब्राह्मण तक हर जगह गति की महिमा का वर्णन मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण (7/15) का प्रसिद्ध मंत्र “चरैवेति, चरैवेति” अर्थात “चलते रहो, चलते रहो” भारतीय पर्यटन दर्शन का मूल आधार है— पुष्पिण्यौ चरतो जंघे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः। शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः।।चरैवेति, चरैवेति।।
इस श्लोक का अर्थ है कि जो व्यक्ति निरंतर यात्रा करता है, उसकी जंघाएं मजबूत होती हैं, उसकी आत्मा विकसित होती है और उसे ज्ञान रूपी फल मिलता है। यात्रा में किया गया श्रम उसकी जड़ता और उसके दोषों को भी दूर कर देता है। वेद स्पष्ट कहते हैं— “सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्।” अर्थात उस सूर्य को देखो, जो कभी थकता नहीं और निरंतर गतिमान रहता है। वैदिक ऋषियों के लिए यात्रा संसार को जानने और ईश्वर की अनंत सृष्टि का साक्षात्कार करने का माध्यम थी। जब कोई व्यक्ति अपने सीमित परिवेश से निकलकर दूर-दूर तक यात्रा करता है, तो उसकी सोच का दायरा अपने आप व्यापक हो जाता है और उसकी संकीर्णता समाप्त होने लगती है।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में यात्रा को केवल एक ही रूप में नहीं देखा गया। इसके पीछे गहरी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सोच थी। यात्राओं को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बांटा गया—तीर्थाटन (आध्यात्मिक और आधिभौतिक खोज), देशाटन (ज्ञान प्राप्त करना) और विजयाटन (सांस्कृतिक प्रसार)। महाभारत के वनपर्व के तीर्थयात्रा पर्व में युधिष्ठिर की तीर्थयात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। महर्षि धौम्य उन्हें भारत के पवित्र स्थलों का भौगोलिक और आध्यात्मिक महत्व बताते हैं। तीर्थाटन का उद्देश्य केवल नदी में स्नान करना नहीं था, बल्कि महान संतों, विचारकों और विभिन्न संस्कृतियों के संपर्क में आकर आत्मबोध प्राप्त करना था।
स्कंद पुराण के काशी खंड और अवंतिका खंड भारत के भूगोल के अद्भुत भंडार हैं। इनमें नदियों, पर्वतों, वनों और अनेक क्षेत्रों का विस्तृत परिचय मिलता है, जिससे यात्रियों को पूरे भारत की भौगोलिक संरचना का ज्ञान होता था। ज्ञान प्राप्त करने के लिए की जाने वाली यात्राएं देशाटन कहलाती थीं। उपनिषदों में राजा जनक की सभा में दूर-दूर से आने वाले विद्वानों और दार्शनिकों का उल्लेख मिलता है। आदि शंकराचार्य का संपूर्ण भारत भ्रमण और चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना देशाटन का सबसे श्रेष्ठ सांस्कृतिक उदाहरण है। उन्होंने केरल से केदारनाथ और पुरी से द्वारका तक यात्रा करके अखंड भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता को एक सूत्र में बांध दिया।
विजयाटन अर्थात दिग्विजय और सांस्कृतिक आदान-प्रदान केवल सैन्य अभियान नहीं थे। कालिदास के रघुवंशम् में वर्णित राजा रघु की दिग्विजय का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि उसका उद्देश्य केवल साम्राज्य का विस्तार नहीं था, बल्कि विभिन्न प्रदेशों की कला, संस्कृति और जीवनशैली का सम्मान करना तथा उनके बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ाना भी था।
सम्राट अशोक, जिन्हें उनके शिलालेखों में देवानांप्रिय प्रियदर्शी कहा गया है, ने पर्यटन की अवधारणा को ही बदल दिया। उनके पहले राजा मृगया विहार अर्थात शिकार के लिए यात्राएं करते थे, जिनका उद्देश्य मनोरंजन था और जिनमें जीवों की हिंसा भी होती थी। अशोक ने अपने आठवें शिलालेख में घोषणा की कि उन्होंने मृगया विहार बंद कर उन्हें धम्म यात्राओं में बदल दिया। ये यात्राएं धार्मिक, सांस्कृतिक और लोककल्याण की भावना से प्रेरित थीं। इन धम्म यात्राओं के दौरान वे स्वयं, उनके आमात्य और भिक्षु पूरे भारत, लंका, यवन प्रदेश (ग्रीस) और मध्य एशिया तक गए। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत ने पर्यटन को सांस्कृतिक कूटनीति और विश्व शांति का माध्यम बनाया था।
अशोक के समय बने विश्रामगृह, सड़कों के किनारे लगाए गए छायादार वृक्ष और खुदवाए गए कुएं प्राचीन पर्यटन अवसंरचना के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। जैन और बौद्ध धर्म ने यात्रा को एक संस्थागत स्वरूप दिया। परिव्राजक या श्रमण वही माना जाता था, जो निरंतर भ्रमण करता रहे। चातुर्मास अर्थात वर्षा ऋतु के चार महीनों को छोड़कर बौद्ध भिक्षुओं और जैन मुनियों के लिए एक स्थान पर लंबे समय तक ठहरना वर्जित था।
भगवान बुद्ध का प्रसिद्ध संदेश था— चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय…। अर्थात—हे भिक्षुओं! भ्रमण करो, बहुजन के हित के लिए, बहुजन के सुख के लिए और संसार पर करुणा बरसाने के लिए।
इसी यायावरी चेतना ने भारत के ज्ञान को तिब्बत, चीन, जापान, श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों, जैसे इंडोनेशिया और कंबोडिया तक पहुंचाया। कंबोडिया का अंगकोर वाट और इंडोनेशिया का बोरोबुदुर जैसे विश्व प्रसिद्ध धरोहर स्थल इसी प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक यात्रा और ज्ञान प्रसार के साक्षी हैं। आधुनिक पर्यटन के आर्थिक और सुरक्षा संबंधी पक्षों को समझने के लिए आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें विदेशी यात्रियों, जिन्हें अभ्यागत कहा गया है, उनकी सुरक्षा, ठहरने की व्यवस्था और आज की पासपोर्ट व्यवस्था जैसी अनुमति प्रणाली का विस्तृत वर्णन मिलता है। उस समय व्यापारियों और यात्रियों के समूहों को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाने वाले मार्गदर्शक को सार्थवाह कहा जाता था। उन्हें मार्गों, जंगलों, हिंसक पशुओं के क्षेत्रों और दस्युओं से प्रभावित इलाकों का पूरा भौगोलिक ज्ञान होता था।
राजाओं का यह महत्वपूर्ण दायित्व माना जाता था कि वे उत्तरापथ और दक्षिणापथ जैसे प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों पर धर्मशालाएं और सत्र बनवाएं, जहां यात्रियों को निःशुल्क भोजन और आश्रय मिल सके। आज पर्यटन उद्योग विश्व की अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा बन चुका है। लेकिन इसके साथ ही अत्यधिक पर्यटन, सांस्कृतिक प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आई हैं। ऐसे समय में ईशावास्योपनिषद का यह मंत्र हमारा मार्गदर्शन करता है— तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
अर्थात—प्रकृति का उपयोग संयम और त्याग की भावना से करो, उसका शोषण मत करो। जब हम किसी प्राकृतिक या ऐतिहासिक स्थल पर जाते हैं, तब हम उसके उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके संरक्षक और साक्षी होते हैं। भारत की “अतिथि देवो भव” की परंपरा केवल अतिथि का सम्मान करना नहीं सिखाती, बल्कि आगंतुक को भी उस भूमि के प्रति उत्तरदायी बनाती है।
वर्ष 2026 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के माध्यम से यात्राओं को पहले से अधिक सरल और सुविधाजनक बनाया जा रहा है। लेकिन मशीनें कभी भी अनुभव का स्थान नहीं ले सकतीं। ऋग्वेद का ऋषि कहता है कि आंखों से देखना और पैरों से चलना ही सत्य को जानने का मार्ग है। हम वर्चुअल रियलिटी के माध्यम से केदारनाथ या अमेज़न के जंगलों को देख तो सकते हैं, लेकिन वहां की हवा का स्पर्श, नदियों का संगीत और मिट्टी की सोंधी गंध का अनुभव तभी होगा, जब हम स्वयं वहां पहुंचेंगे और सच्चे अर्थों में यायावर बनेंगे।
भारत के पास भूगोल का कितना व्यापक ज्ञान था, इसका अनुमान पुराणों में वर्णित भुवनकोश से लगाया जा सकता है। इसके अलावा ह्वेनसांग, फाहियान और अलबरूनी जैसे विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांत भी प्रमाण हैं कि प्राचीन काल में भारत विश्व पर्यटन का प्रमुख केंद्र था। लोग यहां विलासिता के लिए नहीं, बल्कि नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे। यह वास्तव में ज्ञान पर्यटन का सर्वोत्तम उदाहरण था।
ऐसे में हमें यह समझना होगा कि पर्यटन केवल शरीर का एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना नहीं है, बल्कि चेतना का विस्तार है। जब तक हमारी यात्राओं में खोज की भावना, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और मानवता के प्रति आत्मीयता नहीं होगी, तब तक पर्यटन केवल कार्बन फुटप्रिंट बढ़ाने का साधन बनकर रह जाएगा।
आइए, हम अपने प्राचीन ऋषियों के उस शाश्वत संदेश को आत्मसात करें, जो पूरी पृथ्वी को अपना परिवार मानते थे—अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।अर्थात संकीर्ण सोच वाले लोग अपना और पराया मानते हैं, जबकि उदार हृदय वाले लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार होती है। सच्चा यायावर वही है, जो जहां भी जाए, वहां की संस्कृति को सम्मान दे, उसमें आत्मीयता के साथ घुल-मिल जाए और पूरे विश्व को एक परिवार की तरह अनुभव करे। “चरैवेति” का यही संदेश आज भी वैश्विक शांति, सतत विकास और मानवीय सौहार्द का सबसे बड़ा मार्ग है।


