शंकर शरण All Article

मुस्लिम सोचे-2ः धर्म की आलोचना

अभी तसलीमा नसरीन ने कहा कि “जब गैर-मुस्लिम अपने धर्म की आलोचना करते हैं तो उन्हें बुद्धिजीवी कहा जाता है। जब मुस्लिम अपने धर्म की आलोचना करते हैं तो उन्हें इस्लाम का दुश्मन, यहूदी, रॉ का एजेंट सहित जाने क्या-क्या कहा जाता है।” क्या इस पर मुसलमानों को सोचना नहीं चाहिए? बात तो सही है। हिन्दू समाज के मणिशंकर अय्यर, रोमिला थापर जैसे अनेक महानुभावों ने हिन्दू धर्म की खूब आलोचनाएं की है। मगर उन्हें बड़े और पढ़ें....

मुस्लिम सोचे-1 – स्त्रियों का संघर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक व हलाला की वैधानिकता पर सुनवाई शुरू कर दी है। कुछ इस्लामी नेता इस बहाने मुसलमानों को हिन्दू राष्ट्र के भूत से बरगला रहे हैं। जबकि तीन तलाक जैसे रिवाज के रहने या जाने से हिन्दू हितों का कोई लेना-देना नहीं है। ये रिवाज केवल मुस्लिम स्त्रियों के हित से जुड़े हैं। इसीलिए वे ही इस की लड़ाई लड़ रही हैं। इसलिए, मुसलमानों को इस की स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए। बहुत और पढ़ें....

हिंदू-मुस्लिम फर्क पर टैगोर

पिछले बीस वर्षों में भारतीय राजनीति में कुछ परिवर्तन आया है। उस से कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक सीख का स्मरण होता है। टैगोर राजनीति से दूर थे, इसीलिए ऐसी सच्चाइयों को व्यक्त करने में समर्थ थे जो राजनीतिज्ञ नहीं करते। 1920-21 के खलीफत आंदोलन के समय महात्मा गाँधी ने एक वर्ष में स्वराज्य पाने का दावा किया था। दावा बुरी तरह विफल हुआ, तो सफाई आई कि कारण हिन्दू-मुस्लिम एकता का अभाव था। उस की और पढ़ें....

बात-चीत से अयोध्या समाधान?

1990 की गर्मियों की घटना है। दिल्ली के हिमाचल भवन में दो पुस्तकों का विमोचन थाः ‘रामजन्म-भूमि वर्सेस बाबरी मस्जिदः ए केस स्टडी ऑफ हिन्दू-मुस्लिम कन्फ्लिक्ट’ (कोएनराड एल्स्ट) तथा ‘हिन्दू टेम्पल्सः ह्वाट हैपेन्ड टु देम’(सीताराम गोयल)। इस विषय पर हिन्दू पक्ष की यह पहली व्यवस्थित प्रस्तुति थी। तब तक मार्क्सवादी इतिहासकार पूरे विवाद को हिन्दू सांप्रदायिकता की शरारत बता चुके थे। उस सरगर्म वातावरण में कार्यक्रम हुआ, जिस की अध्यक्षता ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के संपादक और पढ़ें....

जिम्मीवाद से रुका अयोध्या समाधान

सुप्रीम कोर्ट ने फिर अयोध्या मामले को टाल दिया। उस ने जो कहा, उस के लिए छः साल बैठे रहने की क्या जरूरत थी? सुब्रह्मण्यम स्वामी को टका सा जबाव देते कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया कि उसे इस की सुनवाई करने का समय नहीं है। अजीब यह कि कोर्ट ने विभिन्न लोगों को विभिन्न बात कही। किसी को यह कि अयोध्या विवाद धर्म-आस्था का मामला है, इसलिए इसे बात-चीत से आपस में सुलझाएं। और पढ़ें....

मसीहा का क्या इलाज!

मुसलमानों का हाल सैयद शहाबुद्दीन ने यह लिखा था, ‘इस्लामी दुनिया राजनीतिक रूप से अस्थिर, सैन्य रूप से रीढ़-विहीन, आर्थिक रूप से ठहरी, तकनीकी रूप से बाबा आदम जमाने की, सामाजिक रूप से अंधविश्वासी और पतनशील है। विद्वता में मुसलमान शायद ही कहीं दिखते हैं और विज्ञान में तो वे कहीं नहीं हैं। ... दूसरी ओर मुस्लिम मानस इस्लामी अतीत की समृद्धि व ताकत के गीत गाता रहता है।’ इस का कारण कूटनीतिज्ञ एम. आर. ए. और पढ़ें....

राम नाम की औषधि

भारत में ‘राम धुन’ आयोजन लोकप्रिय है। नाम-जप और मंत्र-जाप यहाँ की प्राचीन ज्ञान पंरपरा का अंग है। डाकू रत्नाकर का ‘मरा-मरा’ से ‘राम-राम’ कहते हुए महान ऋषि में बदल जाने की कथा कोई पौराणिक कल्पना नहीं। उस का मर्म ही राम नाम की महिमा है, जिसे कोई जिज्ञासु आज भी प्राप्त कर सकता है। इस के लिए हिन्दू होना जरूरी नहीं। मुसलमान भी इस से वही लाभ उठा सकते हैं। एक बार कलकत्ता हाई कोर्ट और पढ़ें....

विकास और हिन्दू चिन्ता

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही दो बड़े अंग्रेजी संपादकों ने उन से जो पहला सवाल पूछा, वह था ‘आप पहले हिन्दू हैं या भारतीय?’। अन्य सवाल भी ऐसे ही थेः राष्ट्रवाद प्रमुख है या विकास? क्या हिन्दू हुए बिना भारतीय हुआ जा सकता है? आदि। ऐसे प्रश्न स्वतंत्र भारत में शिक्षा-संस्कृति की घोर अवनति दिखाते हैं। सत्तर वर्ष पहले यहाँ ऐसे प्रश्नों पर हैरत होती। विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, तिलक और महात्मा गाँधी तक ऐसे प्रश्न अनर्गल और पढ़ें....

इस्लामियत या इन्सानियत?

असमी गायिका नाहिद आफरीन के खिलाफ 46 मुस्लिम संगठनों, मौलवियों ने फतवा दिया है। उन के शब्द विचारणीय हैं, ‘‘नृत्य, नाटक, थियेटर, आदि शरीयत कानून के खिलाफ हैं। संगीत भी शरीयत के खिलाफ है। इस से नई पीढ़ी भ्रष्ट हो जाएगी।’’ यानी, इस्लामी नजरिए से संगीत, नाटक, नृत्य, पेंटिंग, आदि संपूर्ण कला हराम है। फतवेदार सही हैं। उन्हें इस्लाम की समझ नहीं, ऐसा कहना मूढ़ता या धूर्तता भर है। इसीलिए, इस फतवे की आलोचना में मुख्यतः और पढ़ें....

मोदी की जीत, पेशगी है पुरस्कार नहीं!

पिछले लेख में हमारा निष्कर्ष था कि विधान सभा चुनाव परिणाम कुछ भी हों, ‘राष्ट्रवादियों या हिन्दू सज्जनों के पास आशा करने के लिए फिलहाल कुछ नहीं है।’ क्योंकि कई बार दिखा कि चुनाव जीतने को भाजपा हिन्दू चिंताएं उठाती है, पर जीत कर उन्हें अपने हाल छोड़ अन्य कामों में लग जाती है। ये अन्य काम अच्छे भी हों, तब भी हिन्दू हितों की हानि की भरपाई नहीं करते। इस पर कुछ पाठकों ने और पढ़ें....

शंकर शरण

शंकर शरण

shankarsharan@gmail.com

राजनीति शास्त्र के एसोसियेट प्रोफेसर। कम्युनिज्म, सेक्यूलरिज्म, आतंकवाद, साहित्य तथा शिक्षा संबंधी विषयों पर अब तक 18 पुस्तकें प्रकाशित। विगत छब्बीस वर्ष से राष्ट्रीय अखबारों में स्तंभ-लेखन। श्रेष्ठ लेखन के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित। इसमें जो नीचे ईमेल address शंकर का दिया है वह डम्मी है या बनाया है ?

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