शंकर शरण All Article

मोदी की जीत, पेशगी है पुरस्कार नहीं!

पिछले लेख में हमारा निष्कर्ष था कि विधान सभा चुनाव परिणाम कुछ भी हों, ‘राष्ट्रवादियों या हिन्दू सज्जनों के पास आशा करने के लिए फिलहाल कुछ नहीं है।’ क्योंकि कई बार दिखा कि चुनाव जीतने को भाजपा हिन्दू चिंताएं उठाती है, पर जीत कर उन्हें अपने हाल छोड़ अन्य कामों में लग जाती है। ये अन्य काम अच्छे भी हों, तब भी हिन्दू हितों की हानि की भरपाई नहीं करते। इस पर कुछ पाठकों ने और पढ़ें....

चुनावी जीत-हार से परे…

चुनाव आने पर ‘राम मंदिर’, ‘कैराना’ और ‘श्मशान-कब्रिस्तान’ जैसे बयान और सत्ता में आने के बाद ‘राम मंदिर भुनाया जा चुका चेक’, ‘संविधान हमारा धर्मग्रंथ है’ तथा ‘विकास सभी समस्याओं का समाधान’ के दम भरना – यह पैटर्न कई बार दिख चुका। अतः इसे भाजपा की सुविचारित नीति मानना ही ठीक है। इस सूरतेहाल में विधान सभाओं के चुनाव-परिणाम कुछ भी क्यों न हो, राष्ट्रीय या हिन्दू हितों की पूर्ति की दृष्टि से कोई आशा और पढ़ें....

दरगाहों पर हमले क्यों?

इधर पाकिस्तान में एक दरगाह पर हमला कर सौ लोगों को मार डाला गया। इस की जिम्मेदारी इस्लामी स्टेट ने ली। ऐसी घटना पहली नहीं थी। वहाँ गत वर्षों में 25 से अधिक दरगाहों पर हमले हुए हैं। सभी विभिन्न इस्लामी संगठनों ने ही किए। इस पर कभी अंतर्राष्ट्रीय हाय-तौबा क्यों नहीं होती। क्योंकि ऐसे कांड इस्लाम उसूलों के लिए होते हैं। इसीलिए मरने वाले मुस्लिम भी हों, तो आक्रोश का विषय नहीं बनता। यही और पढ़ें....

भाजपा का चुनाव-दर्शन

कहावत हैः सफलता के कई दावेदार पिता होते हैं जबकि विफलता अनाथ होती है। पहले जो कांग्रेस में होता था, वह अब भाजपा में चरितार्थ हो रहा है। हरियाणा, असम में विधान सभा की जीत का सेहरा आला-कमान को मिला, जबकि दिल्ली, बिहार में हार के जिम्मेदार की चर्चा तक न हुई। इसलिए उत्तर प्रदेश का परिणाम जो हो, उस का श्रेय पहले से तय है। यानी, जीतने पर। हारने पर दोष जनता को ही और पढ़ें....

संघ के वेलिंगकर के विद्रोह का महत्व

गोवा के सब से बड़े और प्रतिष्ठित आर.एस.एस. नेता सुभाष वेलिंगकर द्वारा आर.एस.एस. की स्वतंत्र राज्य ईकाई बनाकर विधान सभा चुनाव में भाजपा को हराने की खुली लड़ाई लड़ना कई महत्वपूर्ण मुद्दे रेखांकित करता है। ये जितने गंभीर हैं, उतनी ही उन की उपेक्षा होती रही है। इसीलिए वेलिंगकर विद्रोह राष्ट्रीय महत्व का है। पहला मुद्दा हैः सार्वजनिक शिक्षा में भाषा का स्थान। दुनिया के सारे चिंतक, शिक्षा-शास्त्री और शिक्षक एकमत हैं कि बच्चों की शिक्षा और पढ़ें....

थोपे गए राजनीतिक ब्रांड

भारत में गाँधी-नेहरू के राजकीय प्रचार में सालाना करोड़ों रूपए खर्च होते रहे। अब अटल-दीनदयाल पर वही हो रहा है। दिवंगत जनसंघ नेता के नाम से इधर विश्वविद्यालयो में विद्वत-कुर्सियाँ घोषित की गईं। उन के नाम दर्जनों सड़कें, भवन, योजनाएं, अस्पताल, विश्वविद्यालय, आदि पहले ही बनाए जा चुके हैं। यह सब क्या है? एक तो राज-कोष से पार्टी नेताओं का प्रचार अनुचित है। दूसरे, यदि चिंतन और शिक्षा के क्षेत्र में भी पार्टी पुरुषों को और पढ़ें....

अरुण शौरी और भाजपा

प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक अरुण शौरी ने भाजपा नेतृत्व को दिशाहीन बताते हुए, देश में एक ‘विकेन्द्रित आपातकाल’ और ‘पिरामिड शक्ल का माफिया राज’ होने का आरोप लगाया है। उन्होंने भाजपा नेता को मनोविज्ञान के ‘डार्क ट्रायड’ सा व्यक्तित्व बताया, जिस का अर्थ है – आत्म-मुग्धता, मैकियावेली सी धूर्तता और मनोरोग की तीन बुराइयाँ लिए होना। शौरी मानते हैं कि अपने साथ भाजपा द्वारा किए गए व्यवहार से क्षुब्ध हैं, मगर कहते हैं कि इस और पढ़ें....

मर्यादा-पुरुषोत्तम या मंदिर-स्थापित?

दो समाचार साथ-साथ आए। एक, जयपुर साहित्य सम्मेलन में तसलीमा नसरीन की उपस्थिति पर इस्लामी उग्रवादियों के विरोध के बाद शासन और आयोजकों ने वादा किया कि अब वे तसलीमा को कभी नहीं बुलाएंगे। दूसरा, उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा ने राम-मंदिर बनाने का वादा किया है। सीधे-सीधे दोनों समाचारों में कोई मेल नहीं, परन्तु राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से मार्मिक सम्बन्ध है। चाहे अधिकांश नेता और बौद्धिक अपने अज्ञान, आलस्य या कायरतावश इसे नहीं और पढ़ें....

ओबामा और इस्लाम, खुदा खैर करे!

आठ वर्ष पहले जब बराक हुसैन ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तब कुछ समय तक दुनिया भर के मुस्लिम नेता ओबामा को उन के नाम के दूसरे शब्द से संबोधित करना पसंद करते थे। हमारे एक बड़े पत्रकार भी, जो अभी केंद्रीय मंत्री हैं, उन्हें ‘ब्रदर हुसैन’ कहते थे। लेकिन धीरे-धीरे यह शब्द चलन से लुप्त हो गया, क्योंकि ओबामा ने अपना कोई मुस्लिम रूप नहीं दिखाया। बल्कि पाकिस्तान में घुस कर ओसामा बिन लादेन को और पढ़ें....

फर्जी हिन्दुत्व की हानियाँ

भारत में चलता ‘सेक्यूलरिज्म’ यूरोप में इस शब्द के अर्थ से ठीक उलटा है। वहाँ बिना किसी धार्मिक भेद सभी नागरिकों के लिए समान नीति को सेक्यूलर समझा जाता है। जबकि भारत में सेक्यूलरिज्म आरंभ से ही इस्लाम-परस्ती का छद्म-नाम रहा। हमारे पिछले प्रधान मंत्री ने साफ कहा भी कि यहाँ नीति हैः ‘मुस्लिम फर्स्ट’। ऐसी स्थिति में दूसरे दर्जे के लोगों, यानी हिन्दुओं की राजनीति क्या है, किस हाल में है? इस का सही उत्तर और पढ़ें....

शंकर शरण

शंकर शरण

shankarsharan@gmail.com

राजनीति शास्त्र के एसोसियेट प्रोफेसर। कम्युनिज्म, सेक्यूलरिज्म, आतंकवाद, साहित्य तथा शिक्षा संबंधी विषयों पर अब तक 18 पुस्तकें प्रकाशित। विगत छब्बीस वर्ष से राष्ट्रीय अखबारों में स्तंभ-लेखन। श्रेष्ठ लेखन के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित। इसमें जो नीचे ईमेल address शंकर का दिया है वह डम्मी है या बनाया है ?

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