सवाल है कि पैरोल का सिलसिला कानून है या विशेषाधिकार? हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स एक्ट के तहत कैदियों को पैरोल और फरलो का प्रावधान है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। राम रहीम को 2020 से 2026 तक 16 बार से ज्यादा पैरोल/फरलो मिल चुकी है। कुल मिलाकर 430 से अधिक दिन वे जेल से बाहर रहे।
भारत में कानून की समानता का सिद्धांत संविधान का मूल आधार है। अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के समक्ष सब समान हैं। लेकिन वास्तविकता अक्सर इसके उलट दिखती है। बलात्कार और हत्या के मामलों में सज़ा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह का मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है। रोहतक की सुनारिया जेल, जहां वे बंद हैं, उनके लिए लगभग होटल जैसी सुविधाओं का केंद्र बन गई है, जबकि आम कैदी कठिन परिस्थितियों में सजा काटते हैं।
उल्लेखनीय है कि 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में 20 वर्ष की सजा पाने के बाद राम रहीम रोहतक जेल में बंद हैं। बाद में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और रंजीत सिंह हत्याकांड में आजीवन कारावास भी मिला। जेल में उनके लिए विशेष सेल, बोतलबंद पानी, सहायक कर्मी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। एक पूर्व कैदी ने आरोप लगाया था कि राम रहीम को अन्य कैदियों से ज्यादा समय मुलाकात के लिए मिलता है। जबकि सामान्य कैदियों को मात्र 20 मिनट मिलते हैं, वहीं राम रहीम को घंटों की छूट दी जाती रही।
जेल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया, लेकिन राम रहीम को बार-बार मिलने वाली पैरोल और फरलो ने संदेह बढ़ाया है। रोहतक जेल में उनका रहना आम कैदियों के लिए कठिनाइयों के बीच विपरीत तस्वीर पेश करता है। जहां सामान्य कैदी भीड़भाड़, सीमित संसाधनों और सख्त नियमों में रहते हैं, वहीं राम रहीम को लगातार रिहाई और आरामदायक व्यवस्था मिलती रही।
ऐसे में सवाल उठता है कि पैरोल का सिलसिला कानून है या विशेषाधिकार? हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स एक्ट के तहत कैदियों को पैरोल और फरलो का प्रावधान है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। फरलो को कैदी का अधिकार माना जाता है, जो सामाजिक और पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए दी जाती है, जबकि पैरोल के लिए विशिष्ट कारणों की आवश्यकता होती है। लेकिन राम रहीम के मामले में इसका दुरुपयोग स्पष्ट दिखता है। 2020 से 2026 तक उन्हें 16 बार से ज्यादा पैरोल/फरलो मिल चुकी है। कुल मिलाकर 430 से अधिक दिन वे जेल से बाहर रहे। मई 2026 में मिली 30 दिन की पैरोल पर वे जेल से बाहर निकले और सिरसा डेरे पहुंचे। यह उनकी 2026 की दूसरी पैरोल थी। कथित तौर पर ये रिहाइयां अक्सर बिना किसी ठोस कारण के दी गई हैं। क्योंकि ये रिहाइयां अक्सर चुनावों, धार्मिक कार्यक्रमों या त्योहारों के आसपास दी गईं। 2022 पंजाब, 2023 राजस्थान, 2024 हरियाणा चुनावों से पहले भी ऐसी छूट मिली। डेरे के लाखों अनुयायी एक बड़ा वोट बैंक हैं, जिसका राजनीतिक फायदा उठाने के आरोप लगते रहे।
बलात्कार और हत्या के अपराधी राम रहीम की बार-बार रिहाई पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक है। 2017 में सजा के बाद हुए दंगे में 40 लोगों की मौत हुई थी। गवाहों पर दबाव पड़ने की आशंका बनी रहती है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति समेत कई संगठन इन पैरोलों की निंदा करते हैं। पत्रकार अंशुल छत्रपति ने इसे “कानून का मजाक” बताया। आम कैदियों के लिए पैरोल मिलना मुश्किल होता है। हरियाणा के आंकड़ों के अनुसार, जेलों में हजारों कैदी हैं, लेकिन सीमित संख्या को ही ऐसी छूट मिलती है। ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा कि राम रहीम को मिलने वाली लगातार रिहाइयां अन्य कैदियों में असंतोष पैदा करती हैं।
गौरतलब है कि रोहतक की सुनारिया जेल सामान्य रूप से क्षमता से अधिक भरी रहती है। कैदियों को बुनियादी सुविधाएं भी मुश्किल से मिलती हैं। लेकिन राम रहीम के लिए यहां विशेष इंतजाम किए जाते रहे। आरामदायक रहन-सहन, बेहतर भोजन और लगातार बाहर जाने की छूट। यह जेल उनके लिए सजा की जगह आरामगाह बन गई है। एक तरफ़ तो जेल सुधार की बातें होती रहती हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर उच्च प्रभाव वाले कैदियों को मिलने वाली सुविधाएं व्यवस्था की कमजोरी उजागर करती हैं। जहां गरीब या सामान्य अपराधी सालों जेल में सड़ते हैं, वहीं प्रभावशाली व्यक्ति यहाँ एक लक्ज़री होटल जैसी जिंदगी जीते दिखते हैं।
सवाल उठता है कि इस का क्या समाधान संभव है? पैरोल और फरलो जैसे प्रावधानों का उद्देश्य पुनर्वास है, न कि दुरुपयोग। इसलिए पुलिस प्रशासन व सरकार को इनमें पारदर्शिता लानी चाहिए। जैसे कि, रिहाई के फैसले स्वतंत्र समिति से करवाए जाएं। चुनाव के समय पैरोल पर रोक लगे। सभी कैदियों के लिए समान नियम लागू हों। जेलों में सीसीटीवी और मैन्युअल निगरानी की सख्ती बढ़े।
गुरमीत राम रहिम के मामले में हरियाणा सरकार को ख़ुद पर लगे आरोपों का जवाब देना चाहिए। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति और अन्य संगठनों की आलोचना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
गुरमीत राम रहीम जैसे प्रभावशाली अपराधियों को मिलने वाले ऐशो-आराम का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल है। रोहतक जेल अगर एक कैदी के लिए होटल बन जाती है, तो कानून की गरिमा कहां रह जाती है? पैरोल का प्रावधान सभी के लिए समान होना चाहिए, न कि चुनिंदा प्रभावशालियों के लिए विशेषाधिकार। समाज को इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी होगी। ताकि कानून वाकई सबके लिए समान हो। राम रहीम की लगातार रिहाइयां न केवल पीड़ितों का अपमान हैं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र पर सवालिया निशान लगाती हैं। जेल सजा की जगह होनी चाहिए, न कि आराम की।


