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पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।
भाजपा के लिए चुनाव है मुश्किल

वैसे तो चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में पंजाब छोड़ कर बाकी चार राज्यों में भाजपा की बढ़त बताई जा रही है और आसानी से उसकी सरकार बन जाने की भविष्यवाणी है।

राज्यों के खजाने में केंद्र की सेंध

राज्यों में इस समय या तो डबल इंजन की सरकार है या केंद्र और राज्य के बीच टकराव है।

अखिलेश क्यों आत्मघात कर रहे हैं?

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भगवान परशुराम का फरसा उठा रहे हैं और भगवान श्रीकृष्ण रोज उनके सपने में आ रहे हैं!

नीतियों की राजनीति के खतरे

क्या ऐसा हो सकता है कि राजनीति और शासन यानी पॉलिटिक्स और गवर्नेंस को अलग अलग  रखा जाए?

मायावती का मैसेज कितना काम आएगा?

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अपने मतदाताओं को एक मैसेज किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक टिप्पणी का जवाब देते हुए मायावती ने कहा कि सत्तारूढ़ पार्टी के पास सरकारी पैसा है

विकास और चुनावी विकास का फर्क

एक विकास होता है और एक चुनाव के समय दिखने वाला विकास होता है। दोनों में जमीन आसमान का फर्क होता है।

कोई उम्मीद बर नहीं आती..

अभी मिर्जा गालिब की जयंती बीती है। उन्होंने लिखा था ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती। पहले आती थी हाले दिल पे हंसी अब किसी बात पर नहीं आती’।

बीमार व्यवस्था पर कोरोना की मार

जिस तरह से कोरोना वायरस का असर उन लोगों पर बहुत घातक हुआ, जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित थे उसी तरह भारत के ऊपर भी इसका असर हुआ।

आधार से जीवन नहीं चलता

सोशल मीडिया में कई बरसों से लोग मजाक में लिख रहे हैं कि गोस्वामी तुलसीदास आधार की महिमा पहले से जानते थे तभी उन्होंने लिखा था- कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।

वायरस और वैक्सीन का दुष्चक्र

भारत में भी अंततः किशोरों को वैक्सीन लगाने का फैसला हुआ और प्री-कॉशन डोज के रूप में बूस्टर डोज लगाने का भी ऐलान हो गया।

धर्म की रक्षा कायर नहीं करते!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अभिनेता और उनकी पार्टी के पूर्व सांसद परेश रावल का एक फिल्म में संवाद था कि ‘धर्म इंसान को कायर बनाता है या फिर आतंकवादी’!

कोरोना काल की किताबें

एक शानदार अपवाद अंशुमान तिवारी और अनिंद्य सेनगुप्ता की किताब ‘उलटी गिनती’ हैं।

संसद चलाना किसकी जिम्मेदारी है?

संसद के शीतकालीन सत्र के समापन के बाद यह बहस फिर से शुरू हो गई है कि संसद चलाना बुनियादी रूप से किसकी जिम्मेदारी है?

शादी की उम्र बढ़ाने से क्या होगा?

धारणा बनवाने के लिए की जाने वाली प्रतीकात्मक राजनीति की यह बेहतरीन मिसाल है, जो केंद्र सरकार शादी के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के बिल को महिला सशक्तिकरण का रामबाण मंत्र बता कर पेश कर रही है।

चुनाव सुधार से 2024 का खेला!

केंद्र सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग दोनों ने अपनी अपनी तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। आयोग सिफारिशें कर रहा है और सरकार धड़ाधड़ कानून बना रही है।

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